30/10/09

भक्ति की लिमिट हम तोड़ें!

हिंदुस्तान में कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनके पीछे वजह का पता लगाना काफी मुश्किल है। ऐसी ही एक चीज है देवी जागरण। जो हिंदू जागरण न कराए वह अधर्मी है। देवी का आशीर्वाद सिर्फ मंदिर जाने से हासिल नहीं होता। इसके लिए जप-तप से ज्यादा जरूरी है सामाजिक उद्घोष और यह उद्घोष तभी हो सकता है जब आप इसके लिए कुछ जतन करें। इसीलिए मां के भक्तों ने एक व्यवस्था निकाली है जिसे कहते हैं- जागरण।
जागरण के लिए जरूरी है पूरी रात जागना और जो इस दौरान सोते हैं उनके साथ देवी का सुलूक अच्छा नहीं होता। जागरण के जरिए नींद से दूर रहकर आशीर्वाद पाने के लिए खास व्यवस्था की गई है। अकेले कीर्तन और भजन से काम नहीं चलेगा। सिर्फ मंत्रपाठ तो आपको नींद की आगोश में ले जाएगा। इसलिए कीर्तनिए बुलाकर उनके प्रोफेशनल तरीके से भजन और गीत बजवाए जाते हैं। लेकिन अब सिर्फ ढोलक और हार्मोनियम पर भजन गले नहीं उतरते। उन्हें सुनने का माद्दा सबमें नहीं है। भजनियों ने इसका एक तोड़ निकाला और मुंबइया फिल्मी गानों की धुनों पर चढ़ा दी भक्ति के शब्दों की चादर। जाहिर है, जो निकलकर सामने आया, उसमें काफी संभावना थी।
पुराने गाने चलत मुसाफिर... की तर्ज पर बना भजन छोटी सी कन्या बनके आ गई रे शेरोवाली माता। मेरा बाबू छैल छबीला... की तर्ज पर सामने आया मां मुरादें पूरी कर दे मेरी हलवा बांटूंगी, दर पे तेरे आके जोत जलाके मैं तो नाचूंगी, या फिर अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो कि दर पे सुदामा गरीब आ गया है। फिल्म नागिन का गाना मन डोले, मेरा तन डोले... की तर्ज पर बना गीत सुन मैया रे, मेरी अर्जी रे, तू कर दे कुछ कमाल रे। ये तो कुछ हिंदी फिल्मी गीतों की बानगी है, जो यक ब यक याद आ गए हैं, लेकिन ऐसे सैकड़ों गीत हैं जिनकी धुनों पर भक्तिगीतों के बोल चढ़ाकर उनकी सीडी बाजार में आ चुकी हैं और लगातार ऐसे गीत इनमें जुड़ रहे हैं। (भक्ति बढ़ रही है और जागरण भी)
लेकिन एक सवाल है कि जब पुराने गाने खत्म हो जाएंगे तो कीर्तनिए क्या करेंगे। क्या वो सिर्फ एक ही माला के धागे (धुन) में बारंबार नए मोती (शब्द) पिरोते रहेंगे। मगर कब तक? आखिर बार-बार एक ही गीत की धुन लोग कब तक सुनें... वो ऊब गए हैं। जागरण भक्ति तालाब की काई की तरह हो गई है, उसमें नदी जैसा बहाव नहीं दिख रहा। ताज़गी का अहसास नहीं। ऐसे में नए गानों में संभावनाएं खोजी जा रही हैं। और कोशिश है कि देवी जागरण से नई पीढ़ी को जोड़ा जाए। लेकिन नई पीढ़ी को कोई पुराना गाना फूटी आंख नहीं सुहाता। इसलिए उनके लिए कुछ नए तजुर्बे किए गए हैं... मसलन... मैया-मैया चरणों को न छोड़ें, भक्ति-भक्ति की लिमिट हम तोड़ें... टैं टैणेन, टैंण, टैंण..... जय माता की... या फिर...मैया का हटा जो थोड़ा ध्यान, साला तू तो काम से गया....
इन भक्तिगीतों को सुनने के दौरान भक्त इतने रसमग्न हो जाते हैं...कि उन्हें खुद अपनी होश-खबर तक नहीं रहती। इनमें बात ही कुछ ऐसी है... (पढ़ें-इनकी धुन ही कुछ ऐसी है)... ग्रुप चाहे जो हो...अगले दिन के अखबार में खबर यही छपेगी... फलाने बैनर तले हुए भगवती जागरण में खूबसूरत गीतों पर सुबह तक श्रोता झूमते रहे। महिलाओं ने मैया-मैया चरणों को न छोड़ें गीत पर जमकर डांस किया...

29/10/09

हिंदी का खैरख्वाह..कहां है, कहां है, कहां है!!!

सितंबर चला गया और इसी के साथ थम गई हिंदी के बाग में चहचहाहट। फिज़ां में अंग्रेजी का वसंत कुलाचें भर रहा है। हिंदी के बाग में सिर्फ एक दिन बहार आती है, हर साल १४ सितंबर को। पतझड़ अब इस बाग का स्थायी भाव है, बहार है। शायद हिंदी बाग के पेड़ सूख रहे हैं या शायद उनकी जड़ों में मट्ठा डाल दिया गया है। पत्तियां गिरकर सूख चुकी, फूल अब ठूंठ पेड़ों के फुनगों पर लगा करते हैं।
हालांकि रायबहादुरों की राय में हिंदी तो तेजी से फल-फूल रही है, मीडिया की बदौलत। जो काम हिंदी के साहित्यकार और अखबार न कर सके वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कर रहा है। कई की राय में हिंदी जल्द ही अंग्रेजी के बाद दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा होगी। कसर है तो हिंदी के बोलने वालों में। हिंदी चिंतकों का कहना है कि हिंदी बेल्ट ही अपनी भाषा को लेकर बहुत उत्साही नहीं हैं। इनका कहना है हिंदी लेखकों से लेने वाला कोई नहीं। पहले हिंदीवाले मांगकर किताबें पढ़ते थे तो आज पढ़ने के लिए मांगते भी नहीं। हां, एक बात जरूर है हिंदी बाग में आई बहार पर चर्चा साल में एक बार जरूर होती है अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में। हिंदी के हमवतन ही नहीं, बेवतन भी पहुंचते हैं, लेकिन क्या ये हिंदीप्रेमी इन सवालों पर भी सोचते हैं।
पहला, क्या हिंदीभाषियों को पता है कि हिंदी अब पढ़ने-लिखने की भाषा नहीं है, चाहे राजभाषा क्यों न हो। (स्कूली पाठ्यपुस्तकों की बात न करें)
दूसरा, हिंदी लेखक अब मौलिक लेखन नहीं करते क्योंकि उनके पास अपनी भाषा में मौलिक देने को कुछ नहीं बचा है, क्योंकि उनमें से ज्यादातर हिंदी के सिवाय कुछ नहीं पढ़ते, क्योंकि उन्हें दुनिया में कहां क्या चल रहा है इससे कोई सरोकार नहीं, क्योंकि वह अब अनुवाद के आसरे हैं, क्योंकि अब (उनकी नजर में) हिंदी के पाठक की मृत्यु हो चुकी है।
तीसरा, हिंदी भाषी दरअसल अवसरवादी और ढकोसलापसंद है क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि सियासत से लेकर ग़रीबी तक और विकास से लेकर तकनीकी तक सब कुछ सिर्फ अंग्रेजी में बिकता है और ऐसे में उसे हिंदी के गर्त में धकेलकर साज़िशन उसे रास्ते से हटाया जा रहा है, ताकि वह समझ न सके, सवाल न उठा सके जिसे अंग्रेजी के बलबूते खड़ा किया गया था।
चौथा, हिंदी बेल्ट ग़ुलामी को ओढ़ती-बिछाती है, उसे जीती है, उसमें रस लेती है, उसे भौतिक रूप से इस्तेमाल करती है और बदला चुकाना चाहती है अंग्रेजी साहबियत को जीकर। उसकी ग़ुलामी की इबारत लिखी है खुद उसकी मानसिकता ने। उसकी मानसिकता है खुद को समेटने की, विकास के आगे पीठ करके खड़े होने की।
पांचवां, हिंदीभाषी का साहित्य से कोई सरोकार नहीं। उसे सरोकार है सिर्फ उपयोगिता से। मौलिकता का उसके लिए उपयोगितावादी मतलब है और वह ये कि पूर्वजों की लेखनी पर कलम चलाकर काबिलियत भी साबित कर ली जाए और एक अदद डिग्री भी बटोर ली जाए। मीन-मेख निकालना उसका शग़ल है। इसलिए आलोचना के विकास में बहुत दिमाग खर्च किया गया है, मूल अनुभवपरक लेखन में नहीं। यह आलोचना भी सिर्फ समकालीनों तक ही केंद्रित रहती है। अगर पूर्वजों पर उंगली उठाई भी जाती है तो इस तरह कि आत्मश्लाघा की आग ठंडी भी हो जाए और बाकी हिंदीप्रेमी की नाराज़गी का ठीकरा भी सिर पर फूटे।
छठा, हिंदीभाषी (और हिंदी दिवस पर चहचहाने वाली चिड़ियां भीं) अपने बच्चों को हिंदी नहीं पढ़ाना चाहता। उसे पता है कि यह भाषा उनके किसी काम की नहीं। उसे पता है कि सरकारी ढकोसला उनके बच्चों को नाकारा बनाने पर आमादा है।
सातवां, हिंदी अब वोट की भाषा है। मत वसूलने का हथियार है। मतों के बदले शराब का लालच देने के लिए इससे बेहतर जुमले किसी और भाषा में शायद ही मिलें, जिनका असर तुरंत होता है। अगर किसी राजनीतिज्ञ को हिंदी में भाषण देकर वोट बटोरना नहीं आता तो वह नाकाबिल माना जाता है।
आठवां, हिंदी अब गंदे चुटकुलों की भाषा है। मोबाइल फोन पर रोमन हिंदी में भेजे गए चुटकुलों की, जिन्हें हिंदी से अंग्रेजी में खुद को स्थानांतरित करने वाले अंग्रेजीभाषी भी उतना ही पसंद करते हैं क्योंकि यह उनकी उन जुगुप्साओं को शांत करती है, जो कहीं मन में दबी हैं।
नवां, हिंदी उस तबके की भाषा है जिसे इसी हिंदी में झोपड़पट्टी (और अंग्रेजी में स्लम) समुदाय कहते हैं।
दसवां, हिंदी के हत्यारे मौजूद हैं हिंदीप्रेमियों के भेस में, विश्वविद्यालय, उनमें कार्यरत तथाकथित विद्वान और हिंदी ढोल को जोर-जोर से पीटने वाले सरकारी दफ्तर। (न, न, बाजार को दोष न दीजिएगा क्योंकि वह तो हर समयकाल में मौजूद रहता है)
क्या इस बार हिंदी के पहरुओं ने इन बिंदुओं पर भी विचार किया था? पता नहीं।

17/6/09

'काश मैं कुछ और जिंदगियां खरीद सकता'

छाया-प्रतिच्छाया, ब्लैक एंड व्हाइट और अंधेरे-उजाले की कहानी शिंडलर्स लिस्ट...एक ऐसी फिल्म जिसने महज दो रंगों में इतिहास के सबसे धारदार और कड़वे सच को बयान किया है.. हालांकि फिल्म इस सोच के साथ मेल खाती है कि शुरुआत और अंत हमेशा रंगीन होते हैं..अंधेरा तो कहीं बीच में है..यही नहीं, पूरी फिल्म में रंग सिर्फ दो जगहों पर काले-सफेद और ग्रे के साथ खिलवाड़ करते नजर आते हैं..नाजियों के 'कीड़ों' के खून का काला रंग भी मन में अजीबोगरीब अहसास छोड़ जाता है..मगर आपको उबकाई नहीं आएगी..अगर आप नाजी नहीं हैं तो सिर्फ एक ही भाव उठेगा...करुणा..

काले-सफेद के विरोधाभास और रंगों के साथ यथार्थ का इस्तेमाल स्पीलबर्ग का अपना चुनाव था..रोशनी और छाया के बीच बुनी गई शिंडलर्स लिस्ट सिनेमाई सच की एक अभूतपूर्व परिभाषा की तरह बुनी गई..जिसे जब भी आप देखेंगे बेहद ताज्जुब में पड़ जाएंगे... 

शिंडलर्स लिस्ट तीन बड़ी समानांतर ऐतिहासिक सच्चाइयां बयान करती चलती है..साथ ही नाजी इतिहास के बेहद मामूली पर अहम चरित्रों को उजागर भी करती है.. पहली कहानी है होलोकास्ट की.. जो बाद में नाजी आतंक की यूएसपी बनकर उभरा.. अपने पूरे नंगेपन, घातक असर और कटु असलियत के साथ.. 60 लाख से ज्यादा यहूदियों की पूरी नस्ल को खत्म करने की इस कोशिश की तुलना नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए बमों से ज्यादा ताकतवर मानी जा सकती है.. क्योंकि ये मशीन का नहीं इंसान का कहर था..स्पीलबर्ग ने कहीं भी ये कोशिश नहीं की कि उनका दर्शक हालात के किसी भी कोण से वंचित रहे..या उनका दर्शक निर्ममता को कम करके आंके.. इसलिए फिल्म में जहां भी आप फव्वारे की तरह किसी लाचार यहूदी की गर्दन या खोपड़ी से निकलता खून देखेंगे तो आपके हाथ एक पैमाना आ जाएगा..निर्ममता का पैमाना...बेशक इस खून का रंग काला है, मगर असल रंग से ज्यादा ताकतवर है.. 

दूसरी कहानी है ऑस्कर शिंडलर की, नाजी पार्टी का सदस्य और एक बिजनेसमैन जो इस काले वक्त में भी अकेले 1200 यहूदियों को उनकी आसन्न मौत से बचाने में कामयाब रहा.. एक बेहद आत्मकेंद्रित जर्मन उद्यमी, जिसे सिर्फ पैसे से मतलब था.. उसे यहूदी कामगार चाहिए थे क्योंकि वो पोलिश कामगार से ज्यादा सस्ते थे.. इसलिए नहीं कि वो यहूदियों को पसंद करता है.. या उन्हें नाजियों के हाथ पड़ने से बचाना चाहता था.. पर धीरे-धीरे उसका नजरिया बदला.. अब वह कुछ भी गंवाकर अपनी फैक्टरी के यहूदी कामगारों को बचाने की कोशिश में था.. उसने लालची नाजी अफसरों को खरीदा..उनके साथ समझौते किए..अपनी दौलत को लुटाया, ताकि वो जिंदा रहें.. और जब जर्मनी की जंग में हार हुई तो वो उनके सामने दिल को थमा देने वाली बातें कहता है..अपनी जिंदगी में पहली बार.. उसे इसका अफसोस रहा कि वो अपनी कार और अंगूठी से कुछ और यहूदियों की जिंदगी खरीद सकता था..मगर वो ऐसा कर न सका.. 

तीसरी कहानी है एक ऐसे नाजी अफसर की जो यहूदियों का शिकारी है..जिसे कीड़ों को मारने में मजा आता है, जिसे बहता हुआ खून देखने में मजा आता है..जिसने क्राकोव कस्बे में 600 साल से बसे यहूदियों को इसलिए मिटा देने की तमन्ना है क्योंकि वो सोचता है कि इसके बाद वो इतिहास में अमर हो जाएगा.. एमोन गोएथ नाम का ये नाजी अफसर यहूदियों से तमाम नफरत के बावजूद अपनी यहूदी नौकरानी हेलेन हर्श की तरफ आकर्षित है.. गोएथ में एक आत्महीन शैतान के तमाम गुण मौजूद हैं लेकिन स्पीलबर्ग ने उसके चरित्र के इंसानी पहलुओं को बारीकी से उभारकर सामने रखा है..

इनके साथ ही कुछ स्फुट बिखरे हुए सच भी शिंडलर्स लिस्ट बयान करती है.. ये हैं वो मामूली इंसान जिन्हें इतिहास ने इसलिए याद नहीं रखा क्योंकि उनका उसे बनाने में सीधे कोई योगदान नहीं था.. मगर ये स्पीलबर्ग की कारीगरी है कि वो उन चरित्रों की अहमियत और इतिहास के लिए उनकी जरूरत उजागर कर देते हैं.. जैसे एक प्रोफेसर और दार्शनिक जिसे शिंडलर के कारखाने का मैनेजर चतुराई से मरने से बचा लेता है.. ये कहकर कि वो बर्तनों का नायाब कारीगर है.. नाजी अफसर का प्रेम हेलेन हर्श, एक बच्चा डांका ड्रेसनेर और उसकी मां.. जो मौत से बचने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं.. एक यहूदी जोड़ा जो नाजियों के प्लाज़ो कैंप में शादी करता है.. और वो भी तब जब उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनके बचने के मौके बेहद कम हैं.. और एक रब्बी जो नाजियों की गोली का शिकार होने से बाल-बाल बचता है.. एक यहूदी ग्रेजुएट इंजीनियर लड़की जो इमारत ख़ड़ी करने का विरोध करती है और एमोन गोएथ के सिपाही की गोली का शिकार हो जाती है.. स्पीलबर्ग की फिल्म इतिहास लिखने वालों को एक नसीहत भी है.. केवल ओहदेदारों के किस्सों से ही इतिहास नहीं बनता..वो दरअसल बेहद मामूली लोगों के अनुभवों का जोड़-घटाव है.. 

यहूदियों के साथ हुए नाजी सुलूक की तस्वीरें अंदर तक हिलाने की ताकत रखती हैं.. सबसे अहम तस्वीर है मास ग्रेव्ज यानी इधर-उधर मारे गए यहूदियों की लाशों का एक साथ दाह संस्कार.. इसे नहीं भूलना चाहिए कि ये दाह ही था, संस्कार नहीं.. इस शॉट की शुरुआत फिल्म को पहली बार देख रहे इंसान को भी शायद समझ नहीं आएगी.. जब लाशों से निकली राख और धुआं इस कदर गिर रहा है मानो पूरे कस्बे पर बर्फबारी हो रही हो.. शिंडलर अपनी कार पर जमी इस राख को हाथ से उठाता है, तो उसे सारा माजरा समझ आ जाता है.. और इसके बाद वो सीन हैं जो शायद पूरी दुनिया के इतिहास के सबसे घृणास्पद हालात को उजागर करते हैं... 

जाहिर है हर अभिनय हीरोइक है.. शिंडलर के चरित्र, उसकी कमजोरियों और ताकत को उजागर करने में लियाम नीसन एकदम फिट साबित हुए हैं.. उन्होंने शिंडलर की शख्सियत को साकार कर दिया है.. कहीं भी दर्शन की बड़ी बड़ी बातें नहीं, सिर्फ आत्मावलोचन..जो किरदार को खोलता है..एक आत्मकेंद्रित बिजनेसमैन के मसीहा में रूपांतरण को नीसन ने बखूबी पेश किया है.. 

बेन किंग्सले शिंडलर के कारखाने का मैनेजर है...शायद उससे बेहतर ये रोल कोई नहीं निभा सकता था.. राल्फ फिएंस ने नाजी कमांडर गोएथ के अंदर मौजूद शैतान को स्क्रीन पर पूरी ताकत के साथ उतारा है..जिसे सत्ता और हत्या से बेहद प्यार है.. उसका किरदार इतना असरदार है कि अगर आपने राल्फ की कोई और फिल्म देखी भी होगी तो भी आपको गोएथ का किरदार ही याद आएगा.. 

नाजियों की क्रूरता और घृणित इच्छाओं को साकार करने के बावजूद शिंडलर्स लिस्ट एक उम्मीद जगा रही होती है.. अपने नैरेटिव में हर वक्त..जान बचाने के लिए बच्चों का भागकर छिपना.. ट्रेन के जरिए ऑशविज कैंप में मौत का सामना कर रही नंगी यहूदी औरतों की तस्वीरें..जानवरों की तरह ट्रेन में ठूंसे गए यहूदियों की पानी के लिए बाहर निकली बाहें ..हर तरफ संघर्ष की ललक झलकती है..इंसानी कमजोरियों की तल्खबयानी भी करती है ये फिल्म.. नफरत, लालच, प्यास, ईर्ष्या और गुस्से के साथ-साथ और सबसे ऊपर उसके मानवीय पक्षों की... 

सितंबर 1939 में पॉलेंड के क्राकोव कस्बे से फिल्म शुरू होती है जहां यहूदी समुदाय पर लगातार नाजी दबाव बढ़ा रहे हैं.. तभी एक बिजनेसमैन ऑस्कर शिंडलर यहूदी कामगारों की मदद से एक फैक्टरी चलाने का विचार कर रहा है...वो यहूदी एकाउंटेंट इजाक स्टर्न को इसके लिए मनाता है.. मार्च 1941 में क्राकोव के यहूदी समुदाय को नाजी एक घैटो में धकेल देते हैं..इसी दौरान कुछ यहूदी शिंडलर की फैक्टरी में पैसा लगाने को तैयार हो जाते हैं.. और तब जन्म लेती है डीईएफ यानी ड्यूश ईमेलवारेनफैब्रीक... एक कारखाना जहां बड़ी तादाद में यहूदी बर्तन बनाते हैं... इन बर्तनों की सबसे बड़ी खरीदार है जर्मन सेना.. मार्च 1943 में नाजी तय करते हैं कि अब इन यहूदी 'कीड़ों' को खत्म कर दिया जाए.. यहूदियों का घैटो खाली कराया गया और उन्हें जबरन प्लाजोव कैंप भेज दिया जाता है...कई सीधे गोली से उड़ा दिए जाते हैं और बाकी ट्रेनों के जरिए अनजान जगहों पर भेज दिए जाते हैं..इसके बाद शिंडलर शुरू करता है यहूदी कामगारों की जिंदगी की खरीदारी..

27/5/09

Love+Marriage= Divorce, Arrange+Marriage= Chaos!!

शादी इंसान को पूरी तरह बदलने का माद्दा रखती है.. उसकी दिनचर्या ही नहीं, उसकी किस्मत भी...एक का ख्वाब तो दूसरे का डर, तीसरे के लिए नफरत और चौथे के लिए कारोबार और किसी के लिए शायद बेड़ी... 

कुछ भी हो, जिंदगी का सबसे मुश्किल वक्त.. अगर आप सही शख्स को चुनते हैं तो भी आपकी कामयाबी का फीसद बहुत ज्यादा नहीं रहने वाला..क्योंकि मिस्टर और मिस परफेक्ट इस दुनिया में नहीं होते..परियों की कहानियों की बात अलग है.. सार्त्र का सूत्र Other is Evil.. हम इस मौके पर याद भी नहीं करना चाहते.. लेकिन कुछ साल बाद ही ये सच समझ आ जाता है क्योंकि गहराई के साथ इसे आप महसूस करना शुरू करते हैं जब आपकी जिंदगी में कोई आ जाता है.. प्यार में शादी और मां-बाप की मंजूरी के बाद शादी.. दो रास्ते हैं ईविल अदर को जिंदगी में लाने के.. 

इससे लोग इत्तिफाक रखें या नहीं मगर प्यार और शादी एक दूसरे के उल्टे लफ्ज हैं.. मगर फिर भी Love Marriage होती हैं..जाहिर है इन दोनों का अजीबोगरीब घालमेल करेंगे तो उम्मीदों का पहाड़ भी साथ आएगा.. और उम्मीदें पूरी नहीं होंगी तो कोर्ट के रास्ते खुले ही हैं.. ज्यादातर तलाक ऐसे ही जोड़ों के नाम हैं जिन्होंने फूल जैसे नाजुक शब्द को बाकायदा बेड़ी की तरह पहनने की कोशिश की..

Arranged और मां-बाप की सलाह पर की गई शादी में लड़के या लड़की की इच्छा का कोई महत्व नहीं.. ये परिवारों का सामंती और रूढ़िवादी नजरिया है.. ये नजरिया मानता है कि जिनकी शादी की जा रही है वो ढोर-डंगर हैं और उनका व्यक्तित्व तब तक विकसित नहीं होगा जब तक कि वो इस व्यवस्था के तहत नहीं आ जाते.. हमारे जैसे एक पुरुष प्रधान समाज में इसका बड़ा खमियाजा भुगतती हैं लड़कियां..Arranged Marriage के side effects उनकी जिंदगी पर साफ दिखते हैं.. सीता और सावित्री के इस देश में लड़की की इच्छा का मतलब ही है कि वो चरित्रहीन है...इसलिए न उनसे पूछा जाता है और न इसकी जरूरत ही समझी जाती है... इसमें भी लड़के और उसके घरवालों के सामने लड़की को इस तरह पेश किया जाता है.. मानो वो बिकाऊ माल हो.. बस फर्क इतना होता है कि एक बार में सिर्फ एक ही ग्राहक मौजूद होता है.. और उसे ही convince करना है...वीटो का बटन लड़के और उसके माता पिता के हाथ ही होता है..लड़की को पूरी तरह से निहार कर और नाप-तोल परखकर वो रद्द कर सकते हैं.. 

सदियों से हिंदुस्तानी समाज का ये दस्तूर बदस्तूर चल रहा है.. और चूंकि हम मानते हैं कि दोहराने से बुराई अच्छाई में बदल जाती है इसलिए हमने इसे स्वीकार कर लिया है.. जबकि इससे आपत्तिजनक कोई बात हो ही नहीं सकती कि माता-पिता शादी का फैसला कर सकते हैं.. चाहे फिर इसके जो परिणाम हों..समय और मूल्यों के अंतर के लिहाज से ही नहीं..व्यक्तिवादी सोच के लिहाज से भी...ये एकदम लचर सोच है.. मां-बाप का ऐसे फैसलों में पड़ने का मतलब है कि उनका चुनाव पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता...पूरी तरह से अनजान घर में अर्धांगिनी या अर्धनारीश्वर बनकर प्रवेश करना एक सजा से कम नहीं.. और ऐसी शादियां अपनी कीमत भी चुकवाती हैं...दहेज के लिए हत्या के रूप में, परिवार के सदस्यों की बुरी नीयत का शिकार बनाकर या घर से निकाले जाने में.. या बेवजह छोड़े जाने तक.. मगर व्यवस्थित शादियों के समर्थक कहेंगे कि सफलता का प्रतिशत बहुत ज्यादा है.. ठीक है..लेकिन जो बेमन से शादियां ढो रहे होते हैं, क्या इन समर्थकों ने उनसे पूछा है... 

हिंदुस्तानी मां-बाप लव मैरिज को जब तक अरेंज में न बदल लें, चैन नहीं लेते.. वो बेटे-बेटी के बीच थर्ड पार्टी जरूर बनना चाहते हैं..यानी ये शादियां भी arranged होकर खत्म होती हैं..ये लड़के-लड़की के बीच mutual understanding है, जो इसलिए मंजूर हो जाता है क्योंकि दोनों को एक-दूसरे का साथ मिल रहा होता है वो भी अपने-अपने मां-बाप के साथ, उनकी कीमत पर नहीं.. प्रेम विवाह में शादी दूसरी ऐसी गलती है.. जिसके शब्द ही आपस में मेल नहीं खाते.. एक रूहानी संवाद तो दूसरा बेहद जमीनी और समाजी व्यवस्था..ये वो शादी है जिसमें अहम ही अहमियत रखता है.. बाकी चीजें गौण होती हैं.. और निभ जाएं तो वो गर्मजोशी नहीं रह सकती जिसकी वो उम्मीद करते थे..प्यार नाम की खुशबू उड़ चुकी होती है.. और पीछे बचते हैं मैं और तुम.. जाहिर है वो टकराएंगे भी.. दोनों अहम एक दिन खुद को अदालत में पाते हैं..

तो क्या शादी खुद में ही बेवकूफाना व्यवस्था है.. शायद..लेकिन फिलहाल इसका विकल्प भी नहीं.. तजुर्बे चल रहे हैं..शायद कोई नुस्खा कामयाब हो..

13/5/09

जिंदगी का आखिरी इम्तिहान बनाम नेचुरल सेलेक्शन

पापा कहते थे बड़ा नाम करेगा.. लेकिन वही बेटा अब खामोश है.. बेटी खामोश हो गई है हमेशा के लिए.. और जानते हैं पापा की तमन्ना क्यों पूरी नहीं होगी.. उन लोगों की वजह से जिनको न तो पापा जानते हैं और न वो बेटा.. जो अब कभी नहीं उठेगा..क्या दसवीं का रिजल्ट इतना घातक हो सकता है..इधर दसवीं के नतीजे आ रहे थे और उधर रीवा के संजय गांधी अस्पताल में एक के बाद एक बच्चे पहुंच रहे थे..सबकी एक ही दास्तां..सबकी एक ही कहानी...मध्य प्रदेश में इस साल 10वीं के रिजल्ट ने 6 बच्चों की जिंदगी छीन ली है..

इतने घातक इम्तिहान कि एक के बाद एक किशोर जिंदगियों को दुनिया से बेजार करके रख दें.. क्या इम्तिहान इतना खतरनाक हो सकता है कि मासूम के दिमाग को इस दुनिया के लिए नफरत से भर दे..हां, ये मुमकिन है.. बिल्कुल मुमकिन है.. क्योंकि अभी तक तो हमारा पैमाना परीक्षाएं ही रही हैं जो तय करती हैं कि हम कितने होशियार हैं.. हम कितने जहीन हैं.. कितने समझदार हैं.. और कितने इंटेलेक्चुअल हैं..इम्तिहान लेने वाला दिमाग भी खुद को बहुत इंटेलेक्चुअल इसीलिए महसूस करता है क्योंकि उसने इम्तिहान दिए हैं और पास किए हैं..जाहिर है उसके लिए एक और अकेला यही पैमाना है.. 

मुझे लगता है कि ये अकेडमिक आतंकवाद है.. और इम्तिहान लेने वाले, उनके आधार पर किसी भी व्यक्ति की जिंदगी को सफल-असफल करार देने वाले अकेडमिक आतंकवादी.. ये आतंकवादी आपके बच्चों के दिमाग को जहर से भर रहे हैं.. और चेतन तौर पर ये महसूस करा रहे हैं कि बगैर किसी परीक्षा को पास किए ये जिंदगी बेकार होगी.. ये बात आपको भी मंजूर है और आपने मन ही मन कबूल कर ली है..क्योंकि जैसे-तैसे आपने भी इम्तिहान तो पास किया ही था.. और अब बारी है आपके मासूमों की... 

नतीजे आए तो रीवा में दो, छतरपुर, दतिया, गुना औऱ राजगढ़ में कुछ बच्चों ने पाया कि वो फेल हो गए हैं.. और वो जिंदगी भी क्या जो फेल होकर, अपने मां-बाप और अकेडमिक आतंकवादियों की नजर में दोयम बनकर जीनी पड़े..(ये तर्जुमानी मेरी है..हो सकता है इन मासूमों ने इन्हीं शब्दों में न सोचा हो, लेकिन तकरीबन ऐसा ही सोचा होगा).. इन छह बच्चों ने खुदकुशी कर ली... 

स्नेहा डॉक्टर बनने का सपना पाल रही थी...सत्रह साल की स्नेहा रीवा के रेवांचल पब्लिक स्कूल में पढ़ती थी.. लेकिन डॉक्टर बनने का सपना तभी टूट गया जब उसने पाया कि वो दसवीं में फेल हो गई है..लगा कि ये तो बहुत बड़ा सितम है..उसने किसी तरह जहर हासिल किया और खा लिया..डॉक्टर के अधूरे सपने के साथ ही स्नेहा चली गई.. 
रविकांत चक्रधर हायर सेकण्डरी स्कूल में पढ़ता था.. उसने भी दसवीं की परीक्षा दी थी..वही परीक्षा जो उसके लिए मौत का संदेश लेकर आई थी..ज़हर खाकर उसने जान दे दी.. 
विष्णु ने दोबारा दसवीं का इम्तिहान दिया था..पिछली बार फेल होने पर इतनी लानत-मलामत हुई थी कि इस बार वो कोई चांस नहीं लेना चाहता था.. इस किशोर ने भी फाँसी लगा ली..लेकिन मां-बाप को वक्त पर पता चला और वो उसे लेकर अस्पताल पहुंच गए.. किस्मत से विष्णु बच गया.. 
लेकिन दतिया का रिंकेश खुशनसीब नहीं था...16 साल के रिंकेश को मौत का एक रास्ता दिखाई दिया..सामने से आती ट्रेन..जो उसे उसके सपनों के साथ रौंदकर निकल गई...चिरूला हाईस्कूल में पढ़ने वाला रिंकेश भी सदमे में था..वजह थी बिजली, जो परीक्षाओं से ऐन पहले गुल हो गई थी और तब आई जब रिंकेश की जिंदगी खत्म हो चुकी थी...
राजगढ़ ज़िले के खिलचीपुर में शिवचरण ने ज़हर खाया.. अपनी मां को वो ये कहकर चला गया कि 'छोटे भाई को पढ़ाना, मैं इस काबिल नहीं'.. 
गुना में राजकुमार ने पंखे से लटककर फांसी लगा ली..उसकी मेज पर इंटरनेट से निकाली गई उसकी दसवीं की मार्कशीट मिली.. 
छतरपुर में पूनम ने भी फांसी लगाकर जान दे दी.. किसी भी साइकिएट्रिस्ट ने ये नहीं कहा कि ये गलती अकेडमिक टैररिस्ट की है.. सबने इसके लिए मां-बाप की जिम्मेदारी तय कर दी..

ये कुछ नाम भर हैं और वो भी सिर्फ एक राज्य के..हर बार जब इम्तिहान होंगे..इस सूची में कुछ और नाम जुड़ जाएंगे..ये सिलसिला साल दर साल चलेगा, लेकिन क्या इसका मलाल होना चाहिए कि आपके बच्चे इम्तिहान में खरे नहीं उतरे..
जब तक इम्तिहान हैं, खुदकुशी होंगी, क्योंकि सभी पास नहीं होंगे..जो पास नहीं होंगे वो डार्विन के नेचुरल सेलेक्शन के नियम को चुनेंगे..जो बच जाएंगे, वो योद्धा कहलाएंगे..क्योंकि हम इम्तिहान इसलिए देते हैं कि हमें जीतना है..लेकिन शायद ये भी कहीं लिखा है कि कोई भी इम्तिहान जिंदगी का आखिरी इम्तिहान नहीं होता...

11/5/09

किसे चाहिए अखबार?

किसे चाहिए वो अखबार, जिसमें एक कमांड के जरिए खबरें सर्च न की जा सकें...
किसे चाहिए वो खबर जो आपके कंप्यूटर, मोबाइल और पामटॉप पर सेव न की जा सके..
किसे चाहिए वो खबर जिसे आप 21वीं सदी में भी किसी को भेजकर पढ़ा ही न सकें...
किसे चाहिए वो खबर जिस पर आप दूसरों के साथ राय-मश्विरा न कर सकें, बगैर कंटेंट की तर्जुमानी किए...
किसे चाहिए वो खबर, जिसे आप दूसरी खबरों के साथ नाप-तोल न कर सकें, लिंक न कर सकें...
किसे चाहिए वो अखबार जो सुबह ऑफिस जाने से पहले न पढ़ा जा सके और रात तक सड़ जाए..
किसे चाहिए वो अखबार जो आपको ध्वनि और दृश्य से दूर रखकर सिर्फ सोचने तक छोड़ दे...

ये बहस के कुछ बिंदु हैं जो शुरू हुई है और चल रही है...लेकिन न्यूजपेपरमैन का ही इससे सरोकार नहीं क्योंकि वो अपनी नौकरी से ज्यादा नहीं सोचता...(हालांकि अखबार का उपभोक्ता वो भी है).. मालिक को इसलिए नहीं कि अभी कोई सीधी चुनौती नहीं मिली है...

ये बहस टैक्नोलॉजी की नहीं है...अगर लोग ये सोचते हैं तो शायद गलत होगा...ये बहस है स्वाद की...बदले हुए जायके की...ये बहस है हमारे वक्त में अखबारों के लगातार जायके में रुकावट पैदा करने की...

देश में बड़े-बड़े कई अखबार हैं... हिंदी के भी और अंग्रेजी के भी.. लेकिन उनमें न तो ठीक से इंटरनेशनल कवरेज होता है (हिंदी में तकरीबन नहीं) और न पूरी तरह नेशनल (नेशनल में पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत भी शामिल है, केवल उत्तर नहीं, हिंदी में ये बिल्कुल नहीं)...सभी खुद को राष्ट्रीय कहने में जरा भी शर्म महसूस नहीं करते..जबकि ज्यादातर का फोकस लोकल है.. या महानगरीय.. ज्यादातर के फ्रंटपेज पर सबसे बड़ी और अहम खबरें एजेंसी की छपती हैं...उनके पास या तो रिपोर्टर्स नहीं हैं या फिर उनका फोकस नहीं है.. इन्वेस्टिगेशन के नाम पर सिटी के बेहद मामूली विभागीय घोटाले या फिर किसी से स्पांसर्ड खबर का प्रस्तुतिकरण...

तो क्यों न इनकी मौत होगी..सिर्फ सूचना पाने के लिए तो बहुत से और माध्यम और रास्ते हैं.. जो तकरीबन मुफ्त हैं.. एडवर्टीजमेंट के सस्ते और कारगर उपाय और माध्यम अभी एडवर्टाइजर्स को पता नहीं चले हैं, या बहुत नवजात हालत में हैं... जैसे रीयल इस्टेट, ऑटोमोटिव, एजूकेशन आदि के विज्ञापन धीरे धीरे ऑनलाइन हो रहे हैं.. और ये भी तय है कि अखबार केवल एडवर्टाइजर के लिए नहीं छप रहे.. तो किसके लिए छप रहे हैं.. इस सवाल का जवाब आगे...पहले उन बिंदुओं पर बात कर ली जाए जो शुरू में उठाए गए थे...

अखबारों को बचाने की कोशिश या उनके हक में हर आवाज दरअसल एक तरह का नॉस्टेल्जिया ही है.. जो हमारी पीढ़ी तक चल रहा है.. लेकिन हमारे बाद? 

पत्रकारिता चाहे अखबार में हो, लैपटॉप या डेस्कटॉप पर, ब्लैकबेरी पर या पॉडकास्ट के बतौर या फिर किंडल (बुक रीडर) पर...हर जगह उसे साबित करना ही होता है..कि वो जनता की आवाज के हक में खड़ी है.. और स्टेट का विकल्प दे रही है... लेकिन फिर अखबार ही क्यों? 

यकीनन कंटेंट अपने माध्यम के साथ बदल जाता है...चाहे वो घटिया ढंग से बदले या बेहतर से.. हम खबर के रूपांतरण के दौर में जी रहे हैं.. शायद कल न तो अखबार होगा और न टेलीविजन.. 
और ये अखबार इस देश में आज अगर बिक रहे हैं तो उनकी वजह से जिनके लिए वो छापे ही नहीं जा रहे...शायद 

1/5/09

23 साल की रखैल की डायरी-2

(यह कहानी मुझे www.yourtango.com पर मिली.. लेखिका हैं एमिली रोजेन..मेरा इसमें कुछ नहीं..सिर्फ अनुवाद.. दूसरा और अंतिम भाग)

'ईट, प्रे, लव' नाम की किताब में जीवनसाथी का जिक्र कुछ यूं किया गया है - 'ऐसा शख्स जो आपको उस चीज के बारे में बताता है जो आपको पीछे खींचती है..जो आपको खुद पर ध्यान देना सिखाता है ताकि आप अपनी जिंदगी में बदलाव ला सकें.. जो आपकी दीवारों को गिरा देता है और चौंकाकर आपको जगा देता है..और जो आपकी जिंदगी में इसलिए आता है ताकि वो आपको अपनी जिंदगी के दूसरे पक्ष से रूबरू करा सकें' 

मैं सोचा करती थी कि किसी को धोखा देना शायद सबसे बड़ा गुनाह होता है..और अपने वायदे के बाद झूठा बन जाना मानो धोखाधड़ी की इंतहा है.. मेरे ख्याल में शादी एक रोमांटिक ख्याल था जो सच्चे प्यार के चारों तरफ बुना जाता है.. न कि व्यभिचार के चारों तरफ.. मैंने यह भी देखा था कि फिल्मों में रखैलों के साथ क्या होता है.. लेकिन अब मैं इसे दूसरे ढंग से देखती हूं.. 

ये दरअसल खुदगर्जी से भरी प्रतिबद्धता है ताकि आप किसी असुविधाजनक स्थिति को जायज ठहरा सकें... वह जगह जहां पहुंचकर आप खुद को पूरी तरह उखड़ा हुआ पाते हैं.. जो आपको आपकी जरूरतों का सामना करने को मजबूर करती है.. और आपको आपके एक कदम और करीब ले जाती है... हमारे अफेयर ने मुझे मजबूर किया कि मैं उसके करीब होकर अपनी सारी दीवारें गिरा दूं और उसके लिए गहरी चाहत महसूस करूं.. और पहली बार किसी के साथ होकर खुद को पा सकूं..मुझे महसूस होता है कि अब मैं दूसरों के यह बताने के काबिल हो गई हूं कि मुझे क्या चाहिए..और उसे भी इससे खुशी मिलती है.. इससे पहले मैंने खुद ही अपनी जिंदगी में सब कुछ करने का फैसला किया था..लेकिन अब वह मुझे दिखा रहा है कि कैसे अपने फैसलों में दूसरों की मदद ली जा सकती है.. 

यकीनन मुश्किलें भी आईं हैं.. जब मैं उसकी मुहब्बत और नफरत के बीच झूलती-उतराती हूं तो कभी उसे मंजूर करती हूं और कभी खारिज करती हूं.. लेकिन ज्यादातर बार मैंने ऐसे जज्बात को पसंद ही किया है.. हम दोनों ने एक दूसरे के लिए अपने जुनून की हदें पार कर दी हैं.. और अब मैं इससे कम पर सोचने के लिए तैयार नहीं हूं.. 

ये संभावना कि मैं ऐसी शख्स हूं जिसे वह पसंद कर सकता है, मुझे अंदर तक हिला देती है...वह सचमुच ताज्जुब में डाल देता है..मैं अभी तक तय नहीं कर सकी हूं कि मैं सचमुच उसके साथ जिंदगी बिताने या परिवार जमाने के लिए तैयार भी हूं या नहीं.. यहां तक कि मैं ये भी नहीं जानती हम दोनों उसकी बीवी के बिना कैसे जिंदगी बिताएंगे.. इस तरह की जिंदगी जीते हुए कल हम कैसे पति-पत्नी होंगे.. लेकिन एक बात तय है कि मैं उसे किसी भी हालत में छोड़ने के ख्याल से ही डर जाती हूं... 

भविष्य में क्या और कैसा होगा, ये कई बातों पर निर्भर करता है.. उसका अपनी बीवी से संबंध, दोनों कब तक इस तरह अपनी शादी को आगे ले जा सकते हैं...परिवार के लिए उसकी इच्छा बनाम उसका अपनी बीवी के साथ फिर से रहने का फैसला.. और मैं किस हद तक सहन कर सकती हूं और उससे क्या चाहती हूं और वह मुझसे क्या चाहता है.. 

तो क्या मैं अपराधबोध से ग्रस्त हूं? क्या मैं उसका घर तोड़ने के लिए जिम्मेदार हूं? हां, ये सही है..लेकिन अगर कुछ सालों बाद वह खुश हो सकता है और उसे एक परिवार मिल जाता है, मेरे साथ या मेरे बगैर, और मैं बाकी लोगों को अपनी भावनाओं की दीवार के पीछे धकेल पाई..तो शायद हमारी ये मुलाकात सही साबित होगी.. खासकर तब जब हम दोनों को अंत में एक दूसरे का साथ मिल जाए...

23 साल की रखैल की डायरी-1

(यह कहानी मुझे www.yourtango.com पर मिली.. लेखिका हैं एमिली रोजेन..मेरा इसमें कुछ नहीं..सिर्फ अनुवाद)

मैं उसके ऑफिस में थी, अपने घुटनों पर गलीचे की रगड़ से पैदा हुई जलन संभाले हुए..क्योंकि उसने खुद मेरे ऊपर आकर मुझे बुरी तरह आगे-पीछे धकेला था.. बुकशेल्फ और उसकी मेज पर मैं उसकी पत्नी की फोटो को मुस्कराते और हंसते हुए देख सकती थी..जब मैंने उन्हें उस शाम पहली बार देखा तो पहली बार भाग जाने का मन हुआ था.. लेकिन इसके बजाय मैं रुक गई..मैं जो अपनी शख्सियत बनते देख रही थी, उस पर मुझे उल्टी भी आ रही थी.. वह इतना मोहक था और उसकी मौजूदगी दिलोदिमाग पर इस कदर छा जाती थी कि इस बात ने मेरे कदम रोक लिए..पूरी ईमानदारी से कहूं तो मुझे अपनी इच्छाशक्ति पर इतना अभिमान कभी नहीं रहा था और मुझे वह उसके प्यार में बंधने से रोक भी नहीं सकी..

हम पहली बार एक बिजनेस कांफ्रेंस में मिले थे..तब मैं 23 की थी और कॉलेज से निकली ही थी.. वो बिल्कुल मेरे पास बैठा मुस्करा रहा था.. नजर ऐसी कि मेरे बाएं गाल पर जलन महसूस होने लगी.. काले बाल, बकरे जैसी दाढ़ी और चेहरे के एक तरफ निशान.. मैंने अपनी स्थिति कुछ बदली ताकि इस अनजान से शख्स के साथ यूं एकदम जिस्मानी हालात का सामना न करना पड़े..पर हमारे जिस्मों की भाषा में जुंबिश शुरू हो चुकी थी..

वह शुरू से ही जिद्दी था और ये गुण मुझे उसमें काफी सेक्सी लगा था.. उसने पूरी बेतकल्लुफी के साथ मेरे ही बॉस के सामने मुझे ड्रिंक के लिए आमंत्रित किया... मुझे लगा था कि शायद वो अभी तक सिंगल ही था क्योंकि उसने अपनी पिछली पत्नी का जिक्र किया था और फिर मैं ये जानकर काफी निराश हुई जब उसने बताया कि वह दूसरी बार शादी कर चुका था..ड्रिंक के बाद उसने पूछा कि आज रात हम किस होटल में चल रहे हैं... मुझे यह बेहद हास्यास्पद लगा.. 'तुमसे मिलकर बेहद खुशी हुई'..मैंने उससे कहा.. इसके बाद उसने मुझे ड्रॉप कर दिया...

कुछ ही दिन बाद उसने फ्लर्ट करना शुरू कर दिया.. वो लगातार मेरे बॉस को ईमेल भेजता और उसकी एक कॉपी मुझे कर देता... अगर मैं कहूं कि मैं उसके अगले कदम का बेकरारी से इंतजार नहीं कर रही थी तो ये बात झूठ ही होगी.. जब उसने दोबारा मुझे ड्रिंक के लिए कहा तो मेरा मन हुआ कि न कर दूं.. लेकिन मुझे खुद के सही होने का भरोसा था कि मैं जो करूंगी ठीक ही होगा..मैंने सोचा चूंकि मैं खुद कभी किसी को धोखा नहीं देती तो उसके साथ एक ड्रिंक लेने में हर्ज ही क्या है और वह इतने वक्त से मेरे चारों तरफ चक्कर जो काट रहा था.. लेकिन भीतर ही भीतर कहीं मुझे पता था कि मेरे लिए मुसीबत खड़ी होने वाली थी..एक शादीशुदा शख्स के साथ डेटिंग के ख्याल से ही मुझे अपनी पिछली सभी डेट वाली रातें बच्चों का खेल नजर आने लगी थीं..

मुझे काफी राहत मिली जब मैंने उसे रेस्टोरेंट में आते देखा.. कांफ्रेंस का तनाव कहीं गायब हो चुका था.. मैंने सोचा - 'वह शायद ज्यादा देर तक टिकेगा'.. लेकिन एक, दो और तीन ड्रिंक और इसके बाद सब ठहर गया...

हमारी कैब हमें घर की तरफ लेकर उड़ चली..सड़कों की रोशनी धुंधली पड़ती जा रही थी.. रफ्तार अमूमन से ज्यादा तेज लग रही थी.. हम एक दूसरे को काफी देर तक चूमते रहे..इस हद तक कि होटल के फेंसी लाउंज के बाहर जा गिरे..और जब उसने मेरी पेंट उतारकर हाथ अंदर डाला तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि मैं इतनी कमजोर थी..वह इसे नहीं जानता लेकिन मैं उस रात अपने बाथरूम में गिरकर रोती रही थी..मुझे उसके घर मौजूद उसकी पत्नी का ख्याल आया..और यह भी कि कैसे मैं खुद पर काबू न रख सकी.. 'क्या मैं इस तरह की शख्स हूं जो एक शादीशुदा के साथ डेटिंग कर रही थी'..मुझे काफी ताज्जुब हुआ.. मैं इतना अपराध बोध से भर गई, इतना अपराध बोध से भर गई कि मुझे उसमें मजा आने लगा..

इस रात के बाद मैंने उसे लिखा कि ऐसा अब कभी नहीं होगा.. 'अगर तुम ऐसा चाहती हो' उसने लिखा 'तो मुझे बताओ कि क्या सचमुच तुम्हारा ख्याल बदल गया है'.. मैं 'नहीं' नहीं कहना चाहती थी लेकिन मैं जानती थी कि मुझे एक शादीशुदा शख्स को डेट नहीं करना चाहिए.. पर उसे जल्द ही पता चल गया कि आखिर मैं कैसे और क्या सोच रही थी..अब सारा दोष मेरे मत्थे था.. मुझे कम से कम यही लगता था.. एक लोकल जैज क्लब में हमारी अगली डेट के बाद मैं उसके साथ उसके घर गई..

उसके बिस्तर पर, उसके कपड़ों में घुसते ही मुझे लगा कि वो मुझ पर ही नजर गड़ाए है.. मद्धम रोशनी में वह काफी खूबसूरत लग रहा था.. मैं जानती थी कि वो मुझसे बड़ा था लेकिन ये नहीं जानती थी कि कितना.. उसके बिस्तर पर मैंने उसकी उम्र पूछी.. '45'.. उसने काफी ध्यान से सोचते हुए जवाब दिया.. जैसे ही वह मेरे ऊपर झुका, मुझे खुद से दोगुनी उम्र के शख्स के साथ होने का रोमांच महसूस होने लगा..

अगली सुबह दिन चढ़ने पर मैं उठी.. मैंने देखा कि उसकी शादी की अंगूठी उस उंगली में थी जिसने उसके (उसकी बीवी के) बिस्तर पर मेरे बदन को छुआ था..भूरे रंग के ऊंची हील के जूते जो मै हॉल के रास्ते में छोड़ आई थी, अब बेडरूम में थे.. क्या उसे चिंता सता रही थी कि वो जल्द ही वापस लौट सकती थी और उन्हें देख सकती थी.. दीवाल पर मौजूद उनकी शादी के फोटोग्राफ ने मुझे तुरंत याद दिलाई कि कुछ देर पहले क्या हुआ था.. मैं कभी ये नहीं जानना चाहती थी कि वह देखने में कैसी लगती होगी..मैंने इस बात से अपना ध्यान हटाने की कोशिश की कि अगर मैं उसके बारे में जरा भी जान गई तो शायद उसकी तरफदार हो जाऊंगी.. मैंने कपड़े पहने और पूरी नफरत और उसके पति के साथ घर से निकल गई..

तीन महीने बीत गए.. साफ था कि उसकी बीवी के बारे में जानकारियां भी मुझे उसके पति से मिलने से नहीं रोक सकती थीं.. हफ्ते में एक बार मुलाकात से तसल्ली नहीं मिलती थी.. 'हेलो' और 'गुडबाय' के फोन घंटे-घंटे भर की बातचीत में तब्दील हो जाया करते.. छोटे-छोटे एसएमएस अब 'आय मिस यू' और 'आय वांट यू' से बदलकर 'आय लव यू' में बदल गए.. मुझे चिंता होने लगी कि हम कहां आ पहुंचे थे और कहां जा रहे थे..

उसने मुझे बताया था कि कुछ ऐसी चीजें थीं जो वह (बीवी) उसे नहीं दे सकती थी.. 'मुझे केवल बच्चे नहीं चाहिए, मुझे उनकी जरूरत है'.. उसने रेड वाइन को पीते हुए एक बातचीत के दौरान यह बात कही थी.. जबकि उसकी बीवी बच्चे नहीं चाहती थी.. उसने मुझे बताया वह मेरी वजह से इस नतीजे पर पहुंचा था.. मुझे लगा कि शायद शादी से पहले उन्होंने कभी भी एक परिवार बनाने के बारे में नहीं सोचा था.. न उस पर कभी बात की थी.. लेकिन मैं उसकी बीवी के बारे में खामोश रही.. मैं इस बारे में फैसला देने वाली कौन थी..

मेरे सामने यह एकदम साफ था कि उसके ये ख्यालात उसके अपनी पत्नी से रिश्तों को तार-तार कर रहे थे.. मुझे ताज्जुब हुआ कि मेरी तरफ उसका खिंचाव क्या उसकी इस स्थिति से ध्यान बंटाने की कोशिश भर थी या मैं उसकी जिंदगी में उसे इसी सच का सामना कराने के लिए आई थी..

आखिर उन दोनों ने खुद को शादी के बंधनों से मुक्त करने का फैसला ले लिया था..दोनों ने तय किया था कि अगर उनमें से किसी का अफेयर होगा तो वो दूसरे को नहीं बताएगा.. जहां तक मैं जानती हूं, वह मेरे बारे में नहीं जानती थी.. लेकिन उसके पति को इस बात की कतई चिंता नहीं थी कि उसे मेरा पता चले.. ये ऐसा ही था कि वो दोनों साथ तो रहते थे लेकिन अपनी-अपनी जिंदगियों में मुब्तिला..

8 महीने बीत चुके हैं.. एक दिन उसने मुझे मैसेज किया और कहा - 'हम बीत रही शाम के सितारे जैसे हैं, जो एक खतरनाक रिश्ते से उबर पाने में नाकाम हैं '.. हमारे भावनात्मक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और सेक्सुअल रिश्ते से इनकार नहीं किया जा सकता.. ये इतना ताकतवर रिश्ता है कि बेशक वो शादीशुदा है पर मुझे किसी दूसरे शख्स का साथ पसंद नहीं.. दूसरे सभी इस मामले में कमतर लगते हैं.. (क्रमश:)

27/4/09

गूगल मार रहा है अखबारों को

अखबार संकट में हैं...उनके रेट नीचे गिर रहे  हैं और ज्यादा से ज्यादा लोग इंटरनेट की तरफ बढ़ रहे हैं... और इसका दोष है गूगल  के माथे... वो मुफ्त में ऐसा कंटेंट दे रहा है, जिसके लिए अब तक अखबार और  मैग्जीन पैसा वसूलते थे... तो क्या गूगल अखबारों को खत्म करने में जुटा है...

दरअसल, अगर आप साफ तौर पर देखें तो ये गूगल की  गलती नहीं...बल्कि ये गलती है अखबारों और मैग्जीन की, जो खुद को वक्त के साथ ढाल पाने में नाकाम रहे हैं...देखा जाए तो गूगल अखबारों की मदद कर रहा है...मुफ्त में ढेर सारा कंटेंट मुहैया कराकर... जिसके लिए अखबार को कोई पैसा नहीं देना  पड़ता...गूगल न्यूज समेत ढेरों वेबसाइट्स पर मौजूद खबरें और एडऑन जानकारियां  अखबारों को और ज्यादा समृद्ध बना रही हैं... 

दूसरी बात गूगल खबरें चुराता नहीं, बल्कि वो  उनमें से बेहतरीन को छांटता है और उनके लिंक उठाकर लोगों तक पहुंचा देता है... गूगल न्यूज के पेज पर कोई विज्ञापन भी नहीं होता.. अब अगर ऐसे में किसी अखबार के रेट गिर रहे हैं और विज्ञापनदाता उससे हाथ खींच रहे हैं तो गलती किसकी है… गलती अखबार की है…

तरीका है… अखबार के इलेक्ट्रॉनिक वर्शन को मानक बनाकर प्रिंटेड वर्शन को महंगा और स्तरीय बनाना… इस बात को आप भूल जाएं कि लोगों को अखबारी कागज की खुशबू और उसका अहसास अच्छा लगता है इसलिए वो इसे खरीद रहे हैं… वो दरअसल खबर पाने के आसान से आसान तरीके की तलाश में हैं और जैसे ही इंटरनेट ने उन्हें ये मुहैया कराया वो वहां चले गए…

इसलिए अखबार के इलेक्ट्रॉनिक वर्शन को जल्द से जल्द ईमेल के जरिए अपने सब्सक्राइबर के मेलबॉक्स में पहुंचाना जरूरी है… और इसमें भी आसान तरीका इख्तियार करना जरूरी होगा..केवल दिन की खबरें देने से हटकर ऐसी खबरें देनी होंगी जो रियलटाइम हैं… जिनकी अहमियत इंसान के दिन और उसकी सोच पर असर डालती हो…लेकिन ब्रेकिंग खबरों के साथ साथ न्यूज डाइजेस्ट भी जरूरी होंगी… 

गूगल से लड़ने के बजाय उससे फायदा उठाने का तरीका अपनाना होगा… उसके पास ऐसे ढेरों उपकरण हैं जो अखबार की मदद कर सकते हैं…तो एक अखबार को क्या गूगल से लड़ना चाहिए या गूगल की  मदद लेने का तरीका ढूंढना चाहिए…

13/4/09

समंदर में दफन हिंदुस्तान का अतीत!

अटलांटिक की गोद में चिरनिद्रा में लीन उस जहाज पर कुछ लिखा है. समंदर में समाने के बाद भी वो लिखावट एक पूरी सदी नहीं मिटा सकी.ये इबारत है उन डेढ़ हजार जिंदगियों की, जो टाइटेनिक के साथ फना हो गईं. बहुत कम लोग जानते हैं कि इनमें कुछ जिंदगी ऐसी भी थीं जिनकी कहानी हिंदुस्तान की मिट्टी से जुड़ी थी.

दुनिया का सबसे बड़ा और ताकतवर स्टीमशिप टाइटेनिक 10 अप्रैल 1912 को साउथहैंपटन से न्यूयॉर्क के लिए निकल रहा था. मैरी डनबार लखनऊ से आ रही थीं और अपने बेटे फ्रांसिस से मिलने साउथ डकोटा जा रही थीं. मैरी तब 56 साल की थीं. जब उन्होंने टाइटेनिक में कदम रखा तो किसी को भी इल्म न था कि वो अब
 कभी वापस लौटने वाला नहीं था. ब्रिस्टल में पैदा हुईं मैरी डनबार के पति
 रैडरिक रुफोर्ड हैवलेट की मौत हो चुकी थी. भारत से उनका एक खास रिश्ता था. उनका एक लड़का रोजगार के साथ भारत आ गया था. लखनऊ को उसने अपना घर बनाया था. मैरी भी उसी के साथ लखनऊ में रह रही थीं. 1912 में मैरी डनबार ने अमेरिका की यात्रा शुरू की. भारत से वह पहले इंग्लैंड पहुंचीं. हैंपशायर इलाके में उनकी बेटी ई विलियर्स रहती थी. उससे मिलकर मैरी साउथहैंपटन गईं और वहां से टाइटेनिक में सेकेंड क्लास का टिकट खरीदा. यहीं से टाइटेनिक अपनी पहली और आखिरी यात्रा पर निकल रहा था. मैरी के टिकट का नंबर था 248706 और उन्होंने इसकी कीमत चुकाई थी 16 पॉन्ड. टाइटेनिक पर उनकी यात्रा मानो एक सपने के पूरा होने जैसी थी. लेकिन जल्द ही ये सपना टूटने वाला था. जहाज के डूबते वक्त कैप्टेन और क्रियु ने महिलाओं और बच्चों को पहले लाइफबोटों में बैठाया था. हैवलेट डेक पर मौजूद थीं और उन्हें भी लाइफबोट नंबर 13 में बैठा दिया गया. कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि उनके सामने ही दुनिया का सबसे खूबसूरत जहाज समंदर में समा रहा था. खौफजदा हैवलेट और लाइफबोट पर मौजूद बाकी यात्रियों को चार घंटे बाद मौके पर पहुंचे कार्पेथिया जहाज ने बचाया. कार्पेथिया पर पहुंचते ही उन्होंने 18 अप्रैल को लंदन में अपने घर टेलीग्राम भेजा - सुरक्षित कार्पेथिया पर. डनबार की किस्मत अच्छी थी, उन्हें अपने बेटे से मिलना बाकी था. फ्रांसिस से मिलकर वह फिर लौटीं और हमेशा के लिए भारत चली गईं. लेकिन टाइटेनिक जैसे खतरनाक हादसे में सुरक्षित बच गईं मैरी डनबार को सैप्टीसीमिया हो गया था. पांच साल बाद 9 मई 1917 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उनके बेटे ने मां की इच्छा के तहत उन्हें 10 मई को नैनीताल में दफना दिया. कालाधुंगी रोड पर हिमालय के चरणों में वह आज भी आराम कर रही हैं. 

14-15 अप्रैल 1912 की सर्द रात को टाइटेनिक हादसे में बची मैरी डनबार की तरह बाकी डेढ़ हजार लोग खुशकिस्मत नहीं थे जो अपनी जिंदगी को आगे जी पाते. ऐसी ही एक 
बदकिस्मत थी ऐनी क्लैमर फंक. ऐनी पैदा तो हुई थी पेंसिलवेनिया में, पर उसकी कर्मभूमि थी भारत. माता-पिता मैनोनाइट थे और 18वीं सदी में जर्मनी में बस गए थे. फंक ने मैसाचुसेट्स में मैनोनाइट ट्रेनिंग स्कूल में पढ़ाई की थी. उसका एक ही सपना था मिशनरी बनकर दुनिया की सैर. ये सपना पूरा हुआ जब 1906 में उसे भारत भेजा गया. वो भारत में पहली मैनोनाइट मिशनरी महिला थी. भारत पहुंचकर उसने काम करने के लिए जगह चुनी जांजगीर, आज के छत्तीसगढ़ का एक जिला. यही जगह उसकी जिंदगी के बचे हुए सालों की कर्मभूमि होने वाली थी. जुलाई 1907 में उसने जांजगीर के एक घर के एक कमरे में लड़कियों का स्कूल खोला. शुरुआती दिनों में सिर्फ 17 बच्चियां ही पढ़ने जाती थीं. फंक ने बच्चों से बात करने के लिए धीरे-धीरे हिंदी सीखी. अचानक 1912 में उसे पेंसिलवेनिया से एक टेलीग्राम मिला - जल्द जाओ, मां बहुत बीमार है. मां से मिलने की तड़प में उसने तुरंत जांजगीर से बॉम्बे के लिए ट्रेन पकड़ी और वहां से पर्शियन जहाज के जरिए फ्रांस में मार्सेल पहुंची. यहां से वो ट्रेन और बोट के जरिए इंग्लैंड आई. लिवरपूल पहुंचकर उसे पता चला कि कोयला कामगारों ने हड़ताल कर रखी थी और उसका जहाज हैवरफोर्ड आगे नहीं बढ़ सकता था. थॉमस कुक एंड संस के दफ्तर में उसे कहा गया कि वो चाहे तो कुछ और रुपए चुकाकर टाइटेनिक की टिकट ले सकती थी. ऐनी फंक ने तुरंत टाइटेनिक का सेकेंड क्लास का टिकट खरीद लिया. उसके टिकट का नंबर था 237671 और इसके लिए उसने कीमत चुकाई थी 13 पॉन्ड. 10 अप्रैल 1912 को साउथहैंपटन से उसने टाइटेनिक पर कदम रखा. जहाज पर ही 12 अप्रैल को उसकी 38वीं सालगिरह थी, लेकिन जल्द ही अभिशप्त रात आनी थी, जिसके बाद कोई अगला जन्मदिन नहीं था. 

14-15 अप्रैल की रात ऐनी फंक अपने केबिन में सोई थी कि उसे स्टीवार्ड ने आकर जगाया और तैयार होकर डेक पर पहुंचने को कहा. ऐनी जैसे ही एक लाइफबोट में बैठने लगी, एक महिला पीछे से चिल्लाती हुई आई और उसे धकेलकर बोली - मेरे बच्चे, मेरे बच्चे. अब आखिरी सीट भी भर चुकी थी. ऐनी ने खुशी-खुशी वो सीट उस महिला के लिए छोड़ दी. कुछ ही देर में टाइटेनिक अपने साथ अभागों को समंदर की अतल गहराइयों में लेकर चला गया. इन्हीं में ऐनी फंक भी थी. उसकी लाश कभी नहीं मिली. हादसे की खबर से घबराया ऐनी का भाई होरेस फंक न्यूयॉर्क पहुंचा और अपनी बहन के बारे में खोज-खबर पाने की कोशिश की. भारत जाने के बाद पांच साल में पहली बार ऐनी किसी यात्रा पर निकली थी. होरेस अभी भी सोचता था कि उसकी बहन टाइटेनिक पर नहीं थी. लेकिन भाई गलत था. उसकी बहन तो कब की समुद्री कब्रगाह में पहुंच चुकी थी. ऐनी फंक की याद में छत्तीसगढ़ में आज भी वो स्कूल चल रहा है. अब उसका नाम है ऐनी फंक मैमोरियल स्कूल. पेंसिलवेनिया में भी ऐनी की याद में हैयरफोर्ड मैनोनाइट चर्च सिमिट्री में एक यादगार मौजूद है. 

मैरी डनबार और ऐनी फंक के अलावा एक साल का बच्चा रिचर्ड एफ बेकर भी टाइटेनिक पर था. कोडइकनाल में पैदा हुआ रिचर्ड अपनी मां नैली और बहनों मैरियन और रूथ के साथ अमेरिका यात्रा पर था. रिचर्ड को उसकी मां और बहन मैरियन के साथ लाइफबोट नंबर 11 के जरिए बचाया गया. भारत छोड़ते वक्त रिचर्ड का परिवार आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर में अपने पिता एलेन ओलिवर बेकर के साथ रहता था, जो गुंटूर में मिशनरी थे. इसी गुंटूर में ही टाइटेनिक का एक और यात्री भी पैदा हुआ था. वो थी रूथ बेकर ब्लैंचार्ड. हादसे के वक्त वो अपने नन्हे भाई रिचर्ड और मां से अलग हो गई थी. उसे भी कार्पेथिया जहाज ने बचा लिया था. जे फ्रैंक कार्नेस उर्फ क्लेयर बैनेट 22 साल की एक नई नवेली दुल्हन थी जो भारत से अमेरिका जा रही थी. शादी के बाद वह पति के साथ भारत आ गई थी. साउथहैंपटन से वो मेरी कोरे के साथ टाइटेनिक में सवार हुई थी. टिकट का नंबर था 13534 और उसने अमेरिका पहुंचने के लिए 21 पॉन्ड कीमत अदा की थी. क्लेयर ने 14 अप्रैल की दोपहर जहाज की सेकेंड क्लास लाइब्रेरी में गुजारी थी. कार्नेस को पता नहीं था कि कुछ दिन पहले चेचक से उनके पति की मौत हो चुकी थी. पति को भी अपने आखिरी वक्त तक ये गुमान न था कि वो अपनी पत्नी से हमेशा के लिए अलग हो रहा था. टाइटेनिक के साथ ही कार्नेस भी समंदर में समा गई. उसकी भी लाश नहीं मिल सकी. कार्नेस की सहेली मेरी पर्सी कोरे भी अपर बर्मा (तब भारत में) से अमेरिका जा रही थी, जहां उसका पति इंग्लिश ऑयल कंपनी में सुपरिंटेंडेंट था. मेरी की भी ये आखिरी यात्रा थी. दोनों सहेलियां एकसाथ इस दुनिया से रुखसत हुईं.

24 साल का हैनरी रैलेंड डायर भी टाइटेनिक का वो अभागा यात्री था जो अपने आखिरी सफर पर निकला था. डायर झांसी में पैदा हुआ था और भारत में ही पढ़ा-लिखा था. इसके बाद वो इंग्लैंड चला गया था. पेशे से इंजीनियर रैलेंड डायर व्हाइट स्टार लाइन कंपनी के साथ साउथहैंपटन में ही तैनात था. ये वही कंपनी थी जिसने टाइटेनिक जैसे ऐतिहासिक ख्याति के जहाज को तैयार किया था. हैनरी टाइटेनिक पर अपनी ड्यूटी देते हुए इस संसार से चला गया.

लंकाशायर, इंग्लैंड का रहने वाला चार्ल्स हर्बर्ट लाइटॉलर टाइटेनिक की शायद सबसे विवादास्पद शख्सियतों में से एक है. जो किस्मत से टाइटेनिक हादसे में बच गया. बाद में चली जांच के दौरान उसकी गवाही अहम साबित हुई. उसी ने हादसे के दौरान पूरे क्रियु की भूमिका का खुलासा किया था. 
खास बात ये है कि चार्ल्स लाइटॉलर ने कलकत्ता से कार्गो पर काम करने के लिए जरूरी सेकेंड मेट सर्टिफिकेट पास किया था. 1900 में उसने व्हाइट स्टार लाइन कंपनी में नौकरी पाई और टाइटेनिक की ऐतिहासिक यात्रा से दो हफ्ते पहले उस पर कदम रखा. 14-15 अप्रैल की काली रात घटी घटनाओं के इस साक्षी की गवाही ने अंतिम क्षणों में जहाज के कैप्टेन की भूमिका का खुलासा किया था. 

इनके अलावा टाइटेनिक पर सवार कई यात्री ऐसे भी थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश आर्मी के लिए काम किया था. टाइटेनिक की आखिरी प्रामाणिक फोटो खींचने वाला मॉरोग भी भारत आया था. टाइटेनिक से जुड़े 29 लोग ऐसे थे, जिनका भारत से कोई न कोई रिश्ता रहा. कुछ ने यहां जन्म लिया तो कुछ ने भारत को कर्मभूमि बनाया और कुछ इसी मिट्टी में समा गए. कुछ इतने अभागे थे कि भारत में पैदा होने के बाद मौत उन्हें टाइटेनिक के साथ समंदर में खींच ले गई.

12/4/09

मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया...

बूट अहमद ने बनाया, मैंने मज़मून लिखा
मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया 

जी हां, ये जूता चलाने का वक्त है...क्योंकि कलम बेदम है...बेजार है...जर्नेलिज्म का वक्त है क्योंकि जर्नलिज्म थक गया है...टूट गया है... और देखिए न, आपमें और हममें अब मजमून पढ़ने और लिखने का माद्दा भी कहां है, इसलिए जूता चलाइए पूरी तरह बेखौफ होकर.. हां एक बात का ख्याल जरूर रखें कि आपका जूता चुनाव के मौसम में ही चले...क्योंकि इन दिनों इस देश के सफेदपोश सबसे कमजोर होते हैं...उनकी संवेदनशीलता अपने उफान पर होती है...बेहद सहनशील...बिल्कुल प्रसूता गाय की तरह...वो सींग नहीं चला सकते इस दौरान...इसलिए उनसे डरने-घबराने की जरूरत नहीं... हां, एक बात का ख्याल रहे...मतदान के आखिरी दिन शाम तक ही आप जूता चला पाएंगे...क्योंकि इसके बाद आपका जूता आप पर ही उल्टा पड़ सकता है... 

अगर आप खीझे हुए हैं...और धैर्य ने साथ छोड़ दिया है...अगर 25 साल तक आप देश के कानून को बदमाशों के हाथों की कठपुतली बने रहते देखने के बाद नफरत करने लगे हैं...अगर न्यायपालिका और कार्यपालिका से आप ऊब गए हैं...तो जनाब यही वक्त है, चला दें जूता...क्योंकि क्या पता आपका जूता भी जरनैल के जूते की तरह निशाने पर बैठे... 

आप कह रहे हैं कि जरनैल ने जो संदेश दिया है वो कई पत्रकार अपने पूरे कैरियर में नहीं दे पाते...ठीक ही कह रहे हैं आप...क्योंकि जिंदगी भर कलम के सिपाही के रूप में आप बहुरुपिए ही थे...आपको तो बस एक मौके की तलाश थी...यकीनन अगर सभी पत्रकार जरनैल बन जाएं तो इस देश की किस्मत 'संवर' जाएगी... आपमें से कुछ की नजर में जरनैल भारत के छिपे हुए रत्न हैं और हमें उन पर गर्व होना चाहिए...बिल्कुल ठीक...भाड़ में जाए जर्नलिज्म...वो तो वैसे भी नपुंसकों का काम है...बाहुबल न हो तो कलमबल किस काम का... 

आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं जनाब शिरोमणि पत्रकार, जरनैल के जूते ने वह कर दिखाया जो 25 साल तक विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन नहीं कर सके...एक पत्रकार को अपनी कलम से ज्यादा अपने जूते पर भरोसा होना चाहिए...जब इतना जूताबल दिखा ही रहे हैं तो मेरी एक सलाह है...क्यों न जूते के नीचे लोहे की कीलें भी ठुकवा लें...और नेता के पास पहुंचने से पहले ही उतारकर भी रख लें...पता नहीं कौन से पल आपको अपना चोला उतारकर फेंकना पड़े...

नदी

क्या नदी बहती है  या समय का है प्रवाह हममें से होकर  या नदी स्थिर है  पर हमारा मन  खिसक रहा है  क्या नदी और समय वहीं हैं  उस क्षैतिज रेखा पर...