3/2/10

हिंदी में 'दुर्व्यवहार'

हमारी हिंदी कितनी संपन्न भाषा है.. इसकी बानगी देखिए जरा.. सिर्फ एक शब्द के जरिए आपको इसकी ताकत का पता चल जाएगा.. दुर्व्यवहार.. मीडिया ने इस शब्द की ताकत को दोबाला कर दिया है.. आप पूछ सकते हैं कैसे.. हम बताते हैं..

अगर आपके मुंह पर किसी ने घूंसा चलाया और आपका दांत टूट गया है तो ये दुर्व्यवहार है..किसी ने सदन में आपसे मारपीट की है तो ये दुर्व्यवहार है.. सड़क पर आपकी गाड़ी रोककर कोई आपको घसीटता और मारता पीटता है, तो ये भी दुर्व्यवहार है.. अगर किसी ने चलती बस में महिला से छेड़खानी की, तो ये भी दुर्व्यवहार है.. यहां तक कि अगर कोई महिला से बलात्कार कर देता है तो ये भी दुर्व्यवहार ही होगा..

अगर आप कोई अखबार नहीं पढ़ते और न ही टीवी देखते हैं तो बस गूगल बाबा में जाकर ये शब्द टाइप करें - 'से दुर्व्यवहार'.. गूगल आपके सामने 1 लाख 68 हजार पन्ने खोलेगा.. जिनमें पहली खबर है - अनगड़ा में युवतियों से दुर्व्यवहार..शिक्षक पर छात्रा से दुर्व्यवहार का आरोप.. पर्यटकों से दुर्व्यवहार.. कैदियों से दुर्व्यवहार, पाक में भारतीय पत्रकारों से दुर्व्यवहार, दरभंगा में मीडियाकर्मियों से दुर्व्यवहार.. महिला से दुर्व्यवहार मामले में.. मेरे ख्याल में हर वह पाठक जो 18 साल से ज्यादा उम्र का है अच्छी तरह जानता है कि महिलाओं से दुर्व्यवहार में क्या किया गया, कैदियों और पर्यटकों से दुर्व्यवहार कैसे किया गया.. भारतीय पत्रकारों के साथ क्या सुलूक किया गया.. मीडियाकर्मियों के साथ क्या व्यवहार किया गया.. (ये सारे परिणाम 2 फरवरी 2010 की रात 11.30 बजे के हैं)

मगर इन सभी दुर्व्यवहारों को मीडिया में उन अपराधों का नाम नहीं दिया गया.. जिन्हें हर पीड़ित ने अपनी पुलिस रिपोर्ट में जरूरी तौर पर लिखवाया था.. क्यों..

इसका मतलब ये है कि आपके जिस्म और दिलोदिमाग पर होने वाले तमाम हमले और आपकी इज्जत-अस्मिता से खिलवाड़ सभी हिंदी मीडिया की नजर में 'दुर्व्यवहार' की कैटेगरी में आते हैं.. हालांकि अभी तक मुझे आईपीसी में ऐसे 'दुर्व्यवहार' का कोई कानून नहीं मिला है, पर तलाश जारी है..

सवाल ये है कि आखिर 'दुर्व्यवहार' करने वाले हैं कौन..भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की नजर में ऐसे लोग कहीं नहीं होते, जो दुर्व्यवहार करते हों..क्योंकि 'दुर्व्यवहार' जैसे कम इंटेंसिटी वाले काम करने वाले कभी क्रिमिनल नहीं हो सकते.. (ऐसा मेरा नहीं, व्यावहारिक तौर पर भारतीय दंड कानून का मानना है) और फिर ऐसे लोगों को जिनके खिलाफ कोई सबूत ही न हो, आईपीसी कोई तवज्जो नहीं देती.. हां अगर आप इस 'दुर्व्यवहार' को ज्यादा तूल देंगे तो पुलिस उन लोगों के खिलाफ केस तो दर्ज कर लेगी, पर करेगी कुछ नहीं... वह अच्छी तरह जानती है कि 'दुर्व्यवहार' की शिकायत लेकर पहुंचे लोग मक्कार हैं.. और ये केस को कोर्ट तक ले जाने के भी इच्छुक नहीं.. इसलिए ज्यादा दिमाग खपाने की जरूरत नहीं..

तो क्या सचमुच ऊपर बताए गए दुर्व्यवहारों में कोई 'दुर्व्यवहार' अपराध की कोटि में नहीं आता.. क्या 'दुर्व्यवहार' का शिकार होने वाले इज्जतदार और डरपोक हैं.. क्या 'दुर्व्यवहार' शब्द का इस्तेमाल बंद नहीं करना चाहिए..क्योंकि इसमें न्याय की आशाएं धूमिल नजर आती हैं..क्योंकि यह अपराध को अपराध नहीं सामान्य खराब व्यवहार की कोटि में ही रखता है..

आखिर मीडिया शरीर और दिमाग पर हर हमले को 'दुर्व्यवहार' की कोटि में ही क्यों रखता है.. क्यों वह इन 'दुर्व्यवहारों' के नाम उजागर नहीं करता.. क्या आईपीसी में भी इन्हें अपराध मानकर दर्ज किया जाता है... या फिर हमारा मीडिया हिंदी से ही 'दुर्व्यवहार' करने पर आमादा है.. और वह संज्ञेय अपराध का नाम न लेकर उसकी ग्रेविटी खत्म कर रहा है...

31/1/10

दिल्ली में है दम, क्योंकि क्राइम यहां है लम्पसम!


देश का दिल या राजधानी जो चाहें कहें आप, पर क्या आपको ताज्जुब नहीं होगा अगर कहें कि दिल्ली में अपराध बहुत कम है.. हमारा परंपरागत विवेक, हमारे प्रबुद्ध क्रिमिनोलॉजिस्ट्स, हमारी सरकार, हमारे समाजविज्ञानी, हमारा मीडिया, हमारे साथी और पड़ोसियों का कहना है कि इस शहर का चप्पा-चप्पा अपराधियों की पदचाप से गूंज रहा है.. कौन-कहां-कब-कैसे शिकार बनेगा, कोई नहीं जानता.. (माफ कीजिएगा, फिल्म आनंद के डायलॉग की तर्ज पर)

जब इतनी बहस-मुबाहिसे चल ही रहे हैं तो हमें इसका दूसरा पक्ष भी देखना चाहिए.. दिल्ली घूमकर यूएस लौटे कुछ अमेरिकियों के अनुभव क्या कहते हैं क्राइम कैपिटल के हालात पर.. आखिर उनकी नजर को तो आप निष्पक्ष मानेंगे ही..इस शहर में कदम रखने से पहले ही उन्हें उनके दूसरे अमेरिकी साथियों ने सावधानी बरतने की हिदायतें दे दी थीं.. क्योंकि उन्हें मिली खबरें बताती थीं कि दिल्ली क्राइम कैपिटल है.. सो जैसे ही इन अमेरिकियों ने एयरपोर्ट पर कदम रखा और ऑटो के लिए बाहर आए, उनके कान खड़े थे..इसके बाद जब तक वो दिल्ली में रहे खौफज़दा रहे.. शहर के मीडिया में आईं अपराध की खबरें उनके रौंगटे खड़़ी करती रहीं..मगर दिल्ली में 18 महीने गुजारने के दौरान उनका वास्ता सिर्फ चार चोरों से पड़ा..और जानते हैं ये चोर कौन थे.. शनि महाराज के नाम पर शनिवार को भीख मांगने वाले बच्चे.. जो फिरंगी चमड़ी देखकर उनके पीछे हो लिए थे.. 'क्राइम कैपिटल' से वापस लौटकर उनकी राय कुछ और ही दास्तां बयां कर रही है..

दिल्ली की जनसंख्या और आर्थिक हालात ये कहते हैं कि इस शहर में ज्यादा अपराध होना चाहिए.. और इनके आधार ये हैं..
पहला, दिल्ली में 55 फीसदी आबादी पुरुषों की है.. जबकि पूरे देश में 52 फीसदी और दुनिया भर में 50 फीसदी से कुछ ज्यादा..
दूसरे, आबादी का 53 फीसदी से ज्यादा 25 साल से कम उम्र का है.. जिसकी अगर न्यूयॉर्क से तुलना करें तो वो 33 फीसदी आती है..
तीसरे, गरीब लड़के अपनी ऊर्जा और गुस्सा निकालने के लिए अमेरिका में दो ही रास्ते इख्तियार करते हैं सैक्स अपराध या हिंसा.. पर दिल्ली में ऐसा नहीं होता..
चौथे, शहर में आर्थिक खाई इतनी बड़ी और साफ दिखने वाली है कि आप उसे दूर से भांप सकते हैं..
पांचवें मौसम और पर्यावरण की मुश्किलें.. मसलन, कहर की गर्मी, जबर्दस्त ठंड, ट्रैफिक, प्रदूषण, पानी-बिजली की किल्लत, आबादी का ज्यादा घनत्व, नाइंसाफी और बेइज्जती..

इन सभी दिक्कतों को वो भी झेल जाते हैं जो आराम से इनसे निपट सकते हैं.. दुनियाभर में बहुत से शहर इन सामाजिक दिक्कतों से टूट रहे हैं लेकिन दिल्ली नहीं.. मगर क्यों?

इन अमेरिकियों ने बाकायदा खोजबीन की और पता लगाने की कोशिश की कि क्या वाकई दिल्ली क्राइम कैपिटल है.. इनकी राय है कि दिल्ली को आप हिंदुस्तानी स्टैंडर्ड्स के आधार पर बेशक खतरनाक शहर का दर्जा दे दें पर ये अमेरिकी शहरों के कहीं आसपास भी नहीं ठहरती.. आखिर क्यों.. जरा मुलाहिजा फरमाएं.. दिल्ली और उसके आसपास 2007 में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 495 हत्याएं हुईं जो एक लाख की आबादी पर 2.95 हैं.. मगर उसी साल न्यूयॉर्क में एक लाख की आबादी पर औसत था 5.94 कत्ल का.. और ये भी ध्यान रखें जनाब कि यही वो साल था जब न्यूयॉर्क शहर को पूरे अमेरिका में सबसे सुरक्षित शहर का दर्जा दिया गया था.. यही हाल बलात्कारों का भी है.. 2007 में प्रति एक लाख की आबादी पर दिल्ली में 3.57 बलात्कार दर्ज हुए, तो न्यूयॉर्क में प्रति एक लाख पर 10.48...

आप कहेंगे कि साहब बहुत से अपराध तो दिल्ली में दर्ज ही नहीं होते पुलिस की कृपा से.. लेकिन क्या आपको यकीन आएगा कि हर एक लाख की आबादी पर तीन कत्ल और 7 बलात्कार के मामले दर्ज नहीं किए जाएंगे.. सोचने में कुछ भद्दा लगता है हिंदुस्तानी पुलिस के लिए.. तो ऐसे में बेहद सतही से लगने वाले ये आंकड़े क्या इसकी तसदीक नहीं करते कि दिल्ली को कम से कम अपराध की राजधानी का तमग़ा नहीं दिया जा सकता.. न्यूयॉर्क और दुनिया के दूसरे शहर अपनी दावेदारी में काफी आगे हैं..

मगर अखबारों की हेडलाइनें चीख-चीख कर कहती हैं दिल्ली अपराधियों का स्वर्ग बन चुका है.. यहां जीना मुश्किल होता जा रहा है.. आम शहरी सुरक्षित नहीं है.. और मीडिया जिस अपराध को रिपोर्ट करके बड़ी बड़ी हेडलाइनें बनाता है और सात-सात, आठ-आठ कॉलम की खबरें बुनता है.. उनकी बानगी भी देख लीजिए.. पंजाब के व्यापारी से एक लाख लूटे.. कार तोड़कर 5 लाख की नगदी चोरी..आदि-आदि.. यानी बेहद मामूली चोरियां..जो डकैती की परिभाषा में भी नहीं आतीं.. बेशक शिकार हुए लोगों के लिए यही बड़ी बात है पर ये भी ध्यान रहे कि अमेरिकी अखबारों में ये खबरें एक लाइन की जगह भी नहीं पातीं..

तो क्राइम कैपिटल में क्राइम लम्पसम ही कहा जा सकता है, पूरा नहीं..फिर भी अगर आप कहेंगे कि नहीं हमारे शहर को क्राइम कैपिटल के खिताब से यूं ही नहीं नवाजा गया है..इसके पीछे ठोस वजहें हैं..आपके इन अमेरिकियों की मामूली रिसर्च को क्यों मानें.. ठीक है तो फिर बताएं..

अगर दिल्ली अपराध राजधानी है तो क्यों नहीं यहां की विकट आर्थिक खाई यहां की बहुतायत युवा पीढ़ी को हथियार उठाने के लिए मजबूर करती? क्यों नहीं नौजवान पूरे शहर का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते? क्यों यहां के लोग पार्किंग वालों से महज 10 रुपए की पर्ची लेकर अपनी 8 लाख की कार की चोरी बर्दाश्त कर लेते हैं? क्यों लोग बसों में लड़कियों से हो रही छेड़छाड़ देखकर भी अपना मुंह मोड़ लेते हैं? क्यों यहां पुलिस आपके कागज पूरे होने के बावजूद आपकी गाड़ी रोककर आपके बीवी-बच्चों के सामने आपका चालान काट सकती है और आपका कॉलर पकड़कर आपके गाल पर तमाचा रख सकती है? क्यों कोई भी सरकारी विभाग का आदमी आपके घर के सामने सड़क खोदकर चला जाता है और फिर महीनों वहां आपके घर के बुजुर्ग गड्ढों में गिरकर जख्रमी होते रहते हैं? क्यों पीएफ डिपार्टमेंट का एक मामूली बाबू आपकी जिंदगी भर की कमाई का पैसा आपको सौंपने से पहले अपना कमीशन चाहता है? क्यों..क्यों..क्यों.. क्या यहां की मर्द आबादी नपुंसक हो चली है...या फिर मतलबपरस्त?

नदी

क्या नदी बहती है  या समय का है प्रवाह हममें से होकर  या नदी स्थिर है  पर हमारा मन  खिसक रहा है  क्या नदी और समय वहीं हैं  उस क्षैतिज रेखा पर...