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1/3/09

स्लमडॉग की पिटाई की जांच न कराएं रेणुकाजी...

आदरणीय रेणुका जी, 
मुझे बहुत अच्छा लगा कि आपने स्लमडॉग अजहर की पिटाई की जांच कराने का कदम उठाने का फैसला किया है...ये वाकई कोई बेहद संवेदनशील मनुष्य ही कर सकता था...

पर आपकी और ज्यादा प्रशंसा से पहले कुछ सवाल करना चाहता हूं... रिपोर्टर की आदत है न छूटती नहीं... क्या आपको पता है कि इस देश में स्लमडॉग रोज पिटते हैं... ढाबों पर, चाय के खोखों में, आपके घर में काम ठीक से न करने पर, चौराहों पर ऑटो गैराज में...और आप इसे नहीं रोक सकतीं... आप आज तक नहीं रोक पाए... जी हां, आप स्लमडॉग को पिटने से नहीं रोक सकतीं रेणुका जी...

माफी चाहूंगा, अगर कुछ ऐसे सवाल कर लूं, जिन्हें सुनने पर आपको बुरा लगे... मेरा पहला सवाल ये है कि क्या इस स्लमडॉग का पिटना आपको बुरा लगा... क्या ये स्लमडॉग कुछ खास है... क्योंकि उसने एक ऐसी फिल्म में काम किया है जिसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी है... क्या ये स्लमडॉग ऑस्कर विनर है... इसलिए आपको बुरा लग रहा है...क्योंकि स्लमडॉग तो रोज ही पिटते हैं जिनकी चीखें आप तक नहीं पहुंचतीं... जब राजपथ से आपकी गाड़ी गुजर रही होती है और रेडलाइट पर किताबें या खिलौने, हिंदुस्तान का झंडा बेचने वाला एक स्लमडॉग आपकी गाड़ी के शीशों को हाथ लगाता है, तो आप घृणा से मुंह फेर लेती हैं...हालांकि शायद ही आपको पता हो कि वो कुछ ही देर पहले पिटकर आया होता है... लेकिन आपको उस स्लमडॉग की पिटाई नहीं कचोटती... क्यों?

स्लमडॉग अजहरुद्दीन की पिटाई तो उसके ही बाप ने की है... लेकिन जिन स्लमडॉग्स को आप और हम रोज देखते हैं, उन्हें पीटने वाले उन्हें जन्म देने वाले नहीं, उनका बचपन छीनने वाले होते हैं...क्या उन स्लमडॉग्स को आप स्लमडॉग नहीं मानतीं? 

क्या किसी स्लमडॉग का धारावी स्लम में जाकर रहना ही जरूरी है... क्या दिल्ली या दूसरे किसी शहर के स्लम में पिट रहे अजहर को ऑस्कर अर्जित करने वाली फिल्म में काम करना जरूरी है... तभी उसे पिटने से बचाया जा सकता है... क्या सरकारी ओहदेदारों की नजर में वो अभी स्लमडॉग की श्रेणी में नहीं हैं?

मेरा अगला सवाल ये है कि क्या दिल्ली, आगरा, बैंगलोर, नोएडा और मुंबई में भी धारावी से बाहर किसी स्लमडॉग के साथ कुत्ते का सुलूक नहीं हो रहा है... आप पूरी तरह सुनिश्चित हैं?

क्या इन स्लमडॉग्स के साथ हो रहे सुलूक के खिलाफ आपने और आपकी सरकार ने सारे जरूरी कदम उठा लिए हैं और सिर्फ अजहर का मामला ही बचा है जिसे राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग जांच करने जा रहा है...?

एक और जरूरी सवाल कि क्या फिजिकल यानी शारीरिक मारपीट ही स्लमडॉग के अधिकारों का उत्पीड़न कहा जा सकता है... क्या इन स्लमडॉग्स के दिलो-दिमाग को चीरकर रख देने वाली गाली-गुफ्तार करने वाले माफ किए जा सकते हैं... क्योंकि उन्होंने उनका शारीरिक उत्पीड़न नहीं किया है?

रेणुका जी, आप बेहतर जानती हैं कि देश में कितने स्लमडॉग हैं और उनके साथ क्या सुलूक हो रहा है... लेकिन शायद ही किसी की तवज्जो उधर जाती हो... भई और भी जरूरी काम हैं...बचपन का ठेका ले रखा है क्या सरकार ने... मैं समझता हूं रेणुका जी

तो फिर इस स्लमडॉग पर कैसे नजर पड़ गई आपकी... क्या इसलिए कि वो इस वक्त मीडिया कंपास में है और आप भी इस मौके को नहीं चूकना चाहतीं...क्रुसेडर की अपनी छवि को और चमकाने का इससे बढ़िया और क्या मौका हो सकता है...हां, मैं समझता हूं...इसमें सदाशयता इतनी नहीं जितनी स्लमडॉग के साथ नाम जोड़ने की तमन्ना है... और जनता इसे जानती है...

लेकिन इसमें आपकी गलती नहीं है...अब बच्चों के चाचा नेहरू तो हैं नहीं जो उनके लिए संवेदनशीलता दिखाएंगे... दीयासलाई के कारखानों, होटलों-ढाबों और ऑटो गैराजों में जिंदगी खर्च रहे स्लमडॉग का अब इस देश में कोई नहीं है...सरकार के पास इतनी संवेदनशीलता बची नहीं कि वो अपने चुनावी गणित से ही बाहर आ सके...

मगर मेरा एक सुझाव है, कृपया आप स्लमडॉग अजहर की पिटाई की जांच-वांच न कराएं... इतना भी कष्ट न उठाएं क्योंकि इससे आपकी छवि खराब होगी...हां बयान जरूर देती रहें...ताकि देशवासी आपको समाज सुधारक के बतौर जानते रहें...स्लमडॉग तो पिटते रहते हैं, पिटते रहेंगे...

इस चुनाव में आपकी फतेह का आकांक्षी
खाली दिमाग

27/2/09

कसाब, कम से कम प्लेटफॉर्म टिकट तो ले लेते!

ये वो देश है जहां आप किसी का कत्ल कर दें, तो भी ये सुनिश्चित नहीं कि आपको सजा मिलेगी ही... और अगर आप किसी सम्माननीय की औलाद हैं तो तय मानिए कि शायद ही आप जेल जाएं और शायद ही आपको कोई छूने की हिम्मत ही करे...यही वो देश है जहां कानून आपके पैरों की जूती से ज्यादा अहमियत नहीं रखता...यही वो देश है जहां सबसे ज्यादा कानून के रखवाले ही कानून तोड़ने वालों में शामिल हैं...

और यही वो देश है जहां 50 से ज्यादा लोगों के कातिल कसाब पर रेलवे ने बगैर प्लेटफॉर्म टिकट लिए स्टेशन में घुसने का अपराध दर्ज किया है... कसाब के खिलाफ 26 फरवरी को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई है... उसके खिलाफ तकरीबन 12 केस लगाए गए हैं... और इन्हीं में कसाब और उसके साथी का एक अपराध है छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन पर बगैर प्लेटफॉर्म टिकट के घुसने का... कसाब और 10 आतंकियों के लीडर उसके साथी अबू इस्माइल ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हमला किया था...बधवार पार्क एरिया में आतंकियों की पांचों टीमों के अपनी मुहिम पर निकलने के बाद कसाब और इस्माइल टैक्सी से सीएसटी स्टेशन पहुंचे और स्टेशन के एक किनारे से प्लेटफॉर्म पर घुसे... इसके बाद वो मुख्य वेटिंग हॉल में घुसे... दोनों ने हैंड ग्रेनेड उछाले और अपनी एके-47 से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी...इसके बाद दोनों एक तरफ जाकर छिप गए... आखिर कसाब को गिरगाम चौपाटी पर पकड़ लिया गया और इस्माइल पुलिस की गोली का शिकार हुआ... रेलवे का कहना है कि दोनों ने सीएसटी स्टेशन पर बगैर प्लेटफॉर्म के घुसकर रेलवे के नियमों का उल्लंघन किया है... दोनों के पास प्लेटफॉर्म टिकट नहीं थे...  

जिस शख्स पर इतने बड़े आतंकी हमले को लॉन्च करने, उसे अंजाम देने... पूरी बेदर्दी के साथ 50 से ज्यादा लोगों को कत्ल करने का आरोप है... क्लोज सर्किट टीवी की तस्वीरें इसकी गवाह हैं... तो इस अपराध का क्या मतलब है...अगर कोई अपराध कायम होता है... तो वो इसलिए होता है कि नियम तोड़े गए हैं...लेकिन कानून का कोई भी जानकार शायद इससे इनकार करे कि जिस शख्स पर हत्या का अपराध दर्ज है... तो उनमें इस अपराध का क्या औचित्य रह जाता है...  

क्या आप इससे ये अर्थ निकालने को मजबूर नहीं होते कि कसाब को अगर रेलवे स्टेशन पर घुसना ही था तो कम से कम प्लेटफॉर्म टिकट तो ले लेता...यानी प्लेटफॉर्म पर वो चाहे जिसका खून करे लेकिन पहले प्लेटफॉर्म टिकट लेना जरूरी है...क्या ये कानून का मजाक नहीं है... लेकिन कानून को पेचीदा और झोल से भरपूर करने के लिए जिम्मेदार लोगों को इससे कोई मतलब नहीं रह गया है कि वो क्या कर रहे हैं... और दुनियाभर में बारीकी से हो रही इस इंटरनेशनल केस की स्क्रूटनी में वो किस हद तक हंसी के पात्र बनेंगे...

24/2/09

ब्लॉगर, आपका वकील कहां है!

अगर आपके ब्लॉग पर किसी पोस्ट की वजह से आपके खिलाफ कोई केस हो जाए तो... आपको किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म की मानहानि के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाए... अब ऐसा हो सकता है... ये खतरा अमेरिका, चीन, बर्मा के बाद मध्य एशिया के देशों में फैला और अब भारत में आसन्न खड़ा दिखाई दे रहा है...
यानी अब तक ब्लॉगिंग के सामान्य उसूल भी आपके खिलाफ खड़े हो सकते हैं... क्योंकि उन पर कानून की नजर है...
19 साल के एक ब्लॉगर अजीत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का कथन इसका सबूत है... जिसने शिवसेना के खिलाफ अपने ऑर्कुट प्रोफाइल पर एक कम्यूनिटी खड़ी की... मकसद था महाराष्ट्र कोर्ट की तरफ से एक क्रिमिनल केस में अपने खिलाफ जारी सम्मनों से बचाव... लेकिन उसका तरीका चल नहीं पाया... इस पोस्ट पर शिवसेना के खिलाफ आई प्रतिक्रियाओं से शिवसैनिक इतने तिलमिलाए कि उन्होंने ब्लॉगर अजीत के खिलाफ थाणे पुलिस स्टेशन में एक और केस ठोक दिया...
अजीत को केरल हाईकोर्ट से एंटिसिपेटरी जमानत मिली तो वो सुप्रीम कोर्ट चला गया जहां उसका तर्क था कि कम्यूनिटी में दर्ज हुए सारे कमेंट्स उस कम्यूनिटी तक ही महदूद हैं... उनका मकसद किसी का अपमान करना नहीं था... और ये अभिव्यक्ति की आजादी की तरह समझे जाने चाहिए... एक कंप्यूटर साइंस छात्र अजीत की बात को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना... सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि वो अच्छी तरह जानता है कि कितने लोग इंटरनेट पोर्टल देखते हैं... और अगर कोई इस कंटेंट को पढ़ने के आधार पर कोई केस दर्ज कराता है तो उसे इसका सामना करना पड़ेगा... और ये भी साफ करना होगा कि इस कंटेंट को अपने वैबपेज पर रखने के पीछे उसका तर्क क्या है...
इस मामले को बतौर ब्लॉगर आप कैसे देखते हैं... ये काफी अहमियत रखता है... सुप्रीम कोर्ट के रुख से दो-तीन बातें एकदम साफ हो गई हैं... 
एक, अगर आपके ब्लॉग पर जो भी कंटेंट मौजूद है तो उसके लिए सिर्फ और सिर्फ आप ही जिम्मेदार माने जाएंगे... 
दूसरे, अगर आपके वैबपेज, कम्यूनिटी वैबसाइट और ब्लॉग पर किसी ने अपने विचार रखे हैं और आप सिर्फ होस्ट की भूमिका निभा रहे हैं तो काम नहीं चलेगा... जिन्होंने विचार व्यक्त किए हैं, वो उतने नहीं बल्कि आप इसके आपराधिक पक्ष की ज़द में आएंगे...
तीसरी बात, आप अभिव्यक्ति की आजादी का सहारा लेकर अपनी वैबसाइट को क्लीनचिट नहीं दिला सकते... आपको इसके तहत मौजूद कानूनी नुक्तों का ख्याल रखना होगा... 
चौथी बात, किसी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी और गलतबयानी, बदनामी और मानहानि के लिए जो कानून प्रिंट और टीवी पर लागू होता है, ब्लॉगर भी उसकी सीमा में आते हैं...
पांचवीं बात, अगर आप ब्लॉग या कम्यूनिटी वैबसाइट या वैबपेज शुरू कर रहे हैं तो एक वकील को भी साथ रखें, वरना आप कब जेल में होंगे कहना मुश्किल है...

इस घटना से कम से कम ये तो साबित हो गया है कि ब्लॉग अखबार और टीवी से कमजोर नहीं है... वो उतना ही बड़ा मीडियम है जितने दूसरे... और कानून का जो कंसर्न दिखाई दे रहा है, उसमें अखबार और टीवी से भी ज्यादा इसकी जिम्मेदारी देखी जा रही है... 

नदी

क्या नदी बहती है  या समय का है प्रवाह हममें से होकर  या नदी स्थिर है  पर हमारा मन  खिसक रहा है  क्या नदी और समय वहीं हैं  उस क्षैतिज रेखा पर...