शादी इंसान को पूरी तरह बदलने का माद्दा रखती है.. उसकी दिनचर्या ही नहीं, उसकी किस्मत भी...एक का ख्वाब तो दूसरे का डर, तीसरे के लिए नफरत और चौथे के लिए कारोबार और किसी के लिए शायद बेड़ी... 27/5/09
Love+Marriage= Divorce, Arrange+Marriage= Chaos!!
शादी इंसान को पूरी तरह बदलने का माद्दा रखती है.. उसकी दिनचर्या ही नहीं, उसकी किस्मत भी...एक का ख्वाब तो दूसरे का डर, तीसरे के लिए नफरत और चौथे के लिए कारोबार और किसी के लिए शायद बेड़ी... 13/5/09
जिंदगी का आखिरी इम्तिहान बनाम नेचुरल सेलेक्शन
पापा कहते थे बड़ा नाम करेगा.. लेकिन वही बेटा अब खामोश है.. बेटी खामोश हो गई है हमेशा के लिए.. और जानते हैं पापा की तमन्ना क्यों पूरी नहीं होगी.. उन लोगों की वजह से जिनको न तो पापा जानते हैं और न वो बेटा.. जो अब कभी नहीं उठेगा..क्या दसवीं का रिजल्ट इतना घातक हो सकता है..इधर दसवीं के नतीजे आ रहे थे और उधर रीवा के संजय गांधी अस्पताल में एक के बाद एक बच्चे पहुंच रहे थे..सबकी एक ही दास्तां..सबकी एक ही कहानी...मध्य प्रदेश में इस साल 10वीं के रिजल्ट ने 6 बच्चों की जिंदगी छीन ली है..11/5/09
किसे चाहिए अखबार?
किसे चाहिए वो अखबार, जिसमें एक कमांड के जरिए खबरें सर्च न की जा सकें...ये बहस टैक्नोलॉजी की नहीं है...अगर लोग ये सोचते हैं तो शायद गलत होगा...ये बहस है स्वाद की...बदले हुए जायके की...ये बहस है हमारे वक्त में अखबारों के लगातार जायके में रुकावट पैदा करने की...
तो क्यों न इनकी मौत होगी..सिर्फ सूचना पाने के लिए तो बहुत से और माध्यम और रास्ते हैं.. जो तकरीबन मुफ्त हैं.. एडवर्टीजमेंट के सस्ते और कारगर उपाय और माध्यम अभी एडवर्टाइजर्स को पता नहीं चले हैं, या बहुत नवजात हालत में हैं... जैसे रीयल इस्टेट, ऑटोमोटिव, एजूकेशन आदि के विज्ञापन धीरे धीरे ऑनलाइन हो रहे हैं.. और ये भी तय है कि अखबार केवल एडवर्टाइजर के लिए नहीं छप रहे.. तो किसके लिए छप रहे हैं.. इस सवाल का जवाब आगे...पहले उन बिंदुओं पर बात कर ली जाए जो शुरू में उठाए गए थे...
1/5/09
23 साल की रखैल की डायरी-2
(यह कहानी मुझे www.yourtango.com पर मिली.. लेखिका हैं एमिली रोजेन..मेरा इसमें कुछ नहीं..सिर्फ अनुवाद.. दूसरा और अंतिम भाग)'ईट, प्रे, लव' नाम की किताब में जीवनसाथी का जिक्र कुछ यूं किया गया है - 'ऐसा शख्स जो आपको उस चीज के बारे में बताता है जो आपको पीछे खींचती है..जो आपको खुद पर ध्यान देना सिखाता है ताकि आप अपनी जिंदगी में बदलाव ला सकें.. जो आपकी दीवारों को गिरा देता है और चौंकाकर आपको जगा देता है..और जो आपकी जिंदगी में इसलिए आता है ताकि वो आपको अपनी जिंदगी के दूसरे पक्ष से रूबरू करा सकें'
23 साल की रखैल की डायरी-1

हम पहली बार एक बिजनेस कांफ्रेंस में मिले थे..तब मैं 23 की थी और कॉलेज से निकली ही थी.. वो बिल्कुल मेरे पास बैठा मुस्करा रहा था.. नजर ऐसी कि मेरे बाएं गाल पर जलन महसूस होने लगी.. काले बाल, बकरे जैसी दाढ़ी और चेहरे के एक तरफ निशान.. मैंने अपनी स्थिति कुछ बदली ताकि इस अनजान से शख्स के साथ यूं एकदम जिस्मानी हालात का सामना न करना पड़े..पर हमारे जिस्मों की भाषा में जुंबिश शुरू हो चुकी थी..
वह शुरू से ही जिद्दी था और ये गुण मुझे उसमें काफी सेक्सी लगा था.. उसने पूरी बेतकल्लुफी के साथ मेरे ही बॉस के सामने मुझे ड्रिंक के लिए आमंत्रित किया... मुझे लगा था कि शायद वो अभी तक सिंगल ही था क्योंकि उसने अपनी पिछली पत्नी का जिक्र किया था और फिर मैं ये जानकर काफी निराश हुई जब उसने बताया कि वह दूसरी बार शादी कर चुका था..ड्रिंक के बाद उसने पूछा कि आज रात हम किस होटल में चल रहे हैं... मुझे यह बेहद हास्यास्पद लगा.. 'तुमसे मिलकर बेहद खुशी हुई'..मैंने उससे कहा.. इसके बाद उसने मुझे ड्रॉप कर दिया...
कुछ ही दिन बाद उसने फ्लर्ट करना शुरू कर दिया.. वो लगातार मेरे बॉस को ईमेल भेजता और उसकी एक कॉपी मुझे कर देता... अगर मैं कहूं कि मैं उसके अगले कदम का बेकरारी से इंतजार नहीं कर रही थी तो ये बात झूठ ही होगी.. जब उसने दोबारा मुझे ड्रिंक के लिए कहा तो मेरा मन हुआ कि न कर दूं.. लेकिन मुझे खुद के सही होने का भरोसा था कि मैं जो करूंगी ठीक ही होगा..मैंने सोचा चूंकि मैं खुद कभी किसी को धोखा नहीं देती तो उसके साथ एक ड्रिंक लेने में हर्ज ही क्या है और वह इतने वक्त से मेरे चारों तरफ चक्कर जो काट रहा था.. लेकिन भीतर ही भीतर कहीं मुझे पता था कि मेरे लिए मुसीबत खड़ी होने वाली थी..एक शादीशुदा शख्स के साथ डेटिंग के ख्याल से ही मुझे अपनी पिछली सभी डेट वाली रातें बच्चों का खेल नजर आने लगी थीं..
मुझे काफी राहत मिली जब मैंने उसे रेस्टोरेंट में आते देखा.. कांफ्रेंस का तनाव कहीं गायब हो चुका था.. मैंने सोचा - 'वह शायद ज्यादा देर तक टिकेगा'.. लेकिन एक, दो और तीन ड्रिंक और इसके बाद सब ठहर गया...
हमारी कैब हमें घर की तरफ लेकर उड़ चली..सड़कों की रोशनी धुंधली पड़ती जा रही थी.. रफ्तार अमूमन से ज्यादा तेज लग रही थी.. हम एक दूसरे को काफी देर तक चूमते रहे..इस हद तक कि होटल के फेंसी लाउंज के बाहर जा गिरे..और जब उसने मेरी पेंट उतारकर हाथ अंदर डाला तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि मैं इतनी कमजोर थी..वह इसे नहीं जानता लेकिन मैं उस रात अपने बाथरूम में गिरकर रोती रही थी..मुझे उसके घर मौजूद उसकी पत्नी का ख्याल आया..और यह भी कि कैसे मैं खुद पर काबू न रख सकी.. 'क्या मैं इस तरह की शख्स हूं जो एक शादीशुदा के साथ डेटिंग कर रही थी'..मुझे काफी ताज्जुब हुआ.. मैं इतना अपराध बोध से भर गई, इतना अपराध बोध से भर गई कि मुझे उसमें मजा आने लगा..
इस रात के बाद मैंने उसे लिखा कि ऐसा अब कभी नहीं होगा.. 'अगर तुम ऐसा चाहती हो' उसने लिखा 'तो मुझे बताओ कि क्या सचमुच तुम्हारा ख्याल बदल गया है'.. मैं 'नहीं' नहीं कहना चाहती थी लेकिन मैं जानती थी कि मुझे एक शादीशुदा शख्स को डेट नहीं करना चाहिए.. पर उसे जल्द ही पता चल गया कि आखिर मैं कैसे और क्या सोच रही थी..अब सारा दोष मेरे मत्थे था.. मुझे कम से कम यही लगता था.. एक लोकल जैज क्लब में हमारी अगली डेट के बाद मैं उसके साथ उसके घर गई..
उसके बिस्तर पर, उसके कपड़ों में घुसते ही मुझे लगा कि वो मुझ पर ही नजर गड़ाए है.. मद्धम रोशनी में वह काफी खूबसूरत लग रहा था.. मैं जानती थी कि वो मुझसे बड़ा था लेकिन ये नहीं जानती थी कि कितना.. उसके बिस्तर पर मैंने उसकी उम्र पूछी.. '45'.. उसने काफी ध्यान से सोचते हुए जवाब दिया.. जैसे ही वह मेरे ऊपर झुका, मुझे खुद से दोगुनी उम्र के शख्स के साथ होने का रोमांच महसूस होने लगा..
अगली सुबह दिन चढ़ने पर मैं उठी.. मैंने देखा कि उसकी शादी की अंगूठी उस उंगली में थी जिसने उसके (उसकी बीवी के) बिस्तर पर मेरे बदन को छुआ था..भूरे रंग के ऊंची हील के जूते जो मै हॉल के रास्ते में छोड़ आई थी, अब बेडरूम में थे.. क्या उसे चिंता सता रही थी कि वो जल्द ही वापस लौट सकती थी और उन्हें देख सकती थी.. दीवाल पर मौजूद उनकी शादी के फोटोग्राफ ने मुझे तुरंत याद दिलाई कि कुछ देर पहले क्या हुआ था.. मैं कभी ये नहीं जानना चाहती थी कि वह देखने में कैसी लगती होगी..मैंने इस बात से अपना ध्यान हटाने की कोशिश की कि अगर मैं उसके बारे में जरा भी जान गई तो शायद उसकी तरफदार हो जाऊंगी.. मैंने कपड़े पहने और पूरी नफरत और उसके पति के साथ घर से निकल गई..
तीन महीने बीत गए.. साफ था कि उसकी बीवी के बारे में जानकारियां भी मुझे उसके पति से मिलने से नहीं रोक सकती थीं.. हफ्ते में एक बार मुलाकात से तसल्ली नहीं मिलती थी.. 'हेलो' और 'गुडबाय' के फोन घंटे-घंटे भर की बातचीत में तब्दील हो जाया करते.. छोटे-छोटे एसएमएस अब 'आय मिस यू' और 'आय वांट यू' से बदलकर 'आय लव यू' में बदल गए.. मुझे चिंता होने लगी कि हम कहां आ पहुंचे थे और कहां जा रहे थे..
उसने मुझे बताया था कि कुछ ऐसी चीजें थीं जो वह (बीवी) उसे नहीं दे सकती थी.. 'मुझे केवल बच्चे नहीं चाहिए, मुझे उनकी जरूरत है'.. उसने रेड वाइन को पीते हुए एक बातचीत के दौरान यह बात कही थी.. जबकि उसकी बीवी बच्चे नहीं चाहती थी.. उसने मुझे बताया वह मेरी वजह से इस नतीजे पर पहुंचा था.. मुझे लगा कि शायद शादी से पहले उन्होंने कभी भी एक परिवार बनाने के बारे में नहीं सोचा था.. न उस पर कभी बात की थी.. लेकिन मैं उसकी बीवी के बारे में खामोश रही.. मैं इस बारे में फैसला देने वाली कौन थी..
मेरे सामने यह एकदम साफ था कि उसके ये ख्यालात उसके अपनी पत्नी से रिश्तों को तार-तार कर रहे थे.. मुझे ताज्जुब हुआ कि मेरी तरफ उसका खिंचाव क्या उसकी इस स्थिति से ध्यान बंटाने की कोशिश भर थी या मैं उसकी जिंदगी में उसे इसी सच का सामना कराने के लिए आई थी..
आखिर उन दोनों ने खुद को शादी के बंधनों से मुक्त करने का फैसला ले लिया था..दोनों ने तय किया था कि अगर उनमें से किसी का अफेयर होगा तो वो दूसरे को नहीं बताएगा.. जहां तक मैं जानती हूं, वह मेरे बारे में नहीं जानती थी.. लेकिन उसके पति को इस बात की कतई चिंता नहीं थी कि उसे मेरा पता चले.. ये ऐसा ही था कि वो दोनों साथ तो रहते थे लेकिन अपनी-अपनी जिंदगियों में मुब्तिला..
8 महीने बीत चुके हैं.. एक दिन उसने मुझे मैसेज किया और कहा - 'हम बीत रही शाम के सितारे जैसे हैं, जो एक खतरनाक रिश्ते से उबर पाने में नाकाम हैं '.. हमारे भावनात्मक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और सेक्सुअल रिश्ते से इनकार नहीं किया जा सकता.. ये इतना ताकतवर रिश्ता है कि बेशक वो शादीशुदा है पर मुझे किसी दूसरे शख्स का साथ पसंद नहीं.. दूसरे सभी इस मामले में कमतर लगते हैं.. (क्रमश:)
27/4/09
गूगल मार रहा है अखबारों को
अखबार संकट में हैं...उनके रेट नीचे गिर रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा लोग इंटरनेट की तरफ बढ़ रहे हैं... और इसका दोष है गूगल के माथे... वो मुफ्त में ऐसा कंटेंट दे रहा है, जिसके लिए अब तक अखबार और मैग्जीन पैसा वसूलते थे... तो क्या गूगल अखबारों को खत्म करने में जुटा है...दरअसल, अगर आप साफ तौर पर देखें तो ये गूगल की गलती नहीं...बल्कि ये गलती है अखबारों और मैग्जीन की, जो खुद को वक्त के साथ ढाल पाने में नाकाम रहे हैं...देखा जाए तो गूगल अखबारों की मदद कर रहा है...मुफ्त में ढेर सारा कंटेंट मुहैया कराकर... जिसके लिए अखबार को कोई पैसा नहीं देना पड़ता...गूगल न्यूज समेत ढेरों वेबसाइट्स पर मौजूद खबरें और एडऑन जानकारियां अखबारों को और ज्यादा समृद्ध बना रही हैं...
13/4/09
समंदर में दफन हिंदुस्तान का अतीत!






इनके अलावा टाइटेनिक पर सवार कई यात्री ऐसे भी थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश आर्मी के लिए काम किया था. टाइटेनिक की आखिरी प्रामाणिक फोटो खींचने वाला मॉरोग भी भारत आया था. टाइटेनिक से जुड़े 29 लोग ऐसे थे, जिनका भारत से कोई न कोई रिश्ता रहा. कुछ ने यहां जन्म लिया तो कुछ ने भारत को कर्मभूमि बनाया और कुछ इसी मिट्टी में समा गए. कुछ इतने अभागे थे कि भारत में पैदा होने के बाद मौत उन्हें टाइटेनिक के साथ समंदर में खींच ले गई.
12/4/09
मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया...
बूट अहमद ने बनाया, मैंने मज़मून लिखामेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया
9/4/09
उन दिनों विश्वविद्यालय हुआ करते थे...
अखबार मर रहे हैं... क्या अगला नंबर यूनिवर्सिटी का है... ये सवाल भारत में भारतीयों के लिए अहमियत बेशक न रखता हो... लेकिन वो वक्त दूर नहीं जब जल्द ही ये हमारे दरपेश भी होगा... पश्चिमी दुनिया अखबारों की मौत को नहीं रोक पा रही...लेकिन इससे बहुत परेशान तो है ही...(क्योंकि अभी भी कागज से रोमांस बाकी है...) तो क्या पश्चिम में यूनिवर्सिटीज भी अखबारों के रास्ते पर हैं...शायद... 23/3/09
जेड की मौत का इंतजार था हमें!
क्या जेड गुडी की मौत में कुछ ऐसा अनूठा है, जो उसे दूसरी मौतों से अलग करता है... मौत तो मौत है...एक ही ढंग से दबोचती है...वजह चाहे जो हो... शायद कुछ ऐसा जरूर था जेड की मौत में... ये अनोखापन था उसकी मौत का इंतजार... जेड के जाने के बाद ये इंतजार खत्म हो गया है... जेड ने मौत के इस ऑब्सेशन को अलविदा कह दी है... हमें किसी नए इंतजार के लिए छोड़ दिया है... जेड के बेटे बॉबी और फ्रेडी अभी ये नहीं समझ सकते कि उनकी मां किस हादसे की शिकार हुई है... उन्हें ये भी पता नहीं कि कैमरे के सामने जिंदगी जीने की आदी उनकी मां ने अपनी मौत से पहले उनके लिए जिंदगी का सामान इकट्ठा कर दिया है...
हर दूसरे घंटे दर्द से निपटने के लिए जेड को पेनकिलर्स लेनी पड़ती थीं... जैक ट्वीड के साथ शादी की रात जेड के घर के बाहर हर वक्त एक एंबुलेंस तैयार थी... जेड हर चीज के लिए तैयार थी... इस हद तक कि अगर उसकी मौत उससे बेवफाई करती तो शायद उसे मुंह दिखाने लायक न छोड़ती...
जेड ने अपनी मौत से पहले सभी अधिकार बेच दिए थे... 22 फरवरी को हुई उसकी शादी को टीवी चैनल लिविंग ने दो हिस्सों में दिखाया... टीवी पर होने वाली दुल्हन ने कुछ शो भी किए...ओके मैग्जीन को उसने अपनी मौत से पहले श्रद्धांजलि इश्यू छापने की इजाजत दी...अपने आखिरी शब्दों के साथ...
17/3/09
जुनून खौफ का!

मीडिया हमें संवेदनशील बनाता है या हमारी संवेदनाओं को कुंद करता है...पता नहीं...जहां तक मुझे पता है कि मीडिया अपनी कमेंट्री में, अपने संवाद में, अपने झुकाव में...आपको कहीं छूने की कोशिश करता है क्योंकि वो पशुओं से संवाद नहीं कर रहा... वो जानवरों को समझाने की कोशिश नहीं कर रहा बल्कि जीते-जागते सोचने वाले जीव इंसानों तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं... लेकिन ऐसा लगता नहीं है...
मौत का मासूम चेहरा, जुनून की खौफनाक दास्तान, पहली बार टीवी पर, इन तस्वीरों से बच्चों को दूर रखना... 4 फुट की मौत...
अगर आपको कुछ भी पता न हो तो इन लाइनों से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे...शायद कोई सनसनीखेज वारदात...जिसमें चार फुट लंबे शख्स ने किसी की जान ले ली है...जिसे देखकर बच्चे डर सकते हैं...शायद यही या कुछ ऐसा ही...
लेकिन जनाब आप पूरी तरह गलत साबित होंगे...क्योंकि ये वो खबर है जो अंतर्राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समुदाय ही नहीं पूरी मानवता के लिए परेशानी का खुलासा करने वाली है...ये आतंकवाद का वो घिनौना चेहरा है, जिसे देख और सुनकर रौंगटे खड़े हो सकते हैं...ये खबर है पूरी बेरहमी से बचपन को मौत के मुंह में धकेलने की.. बच्चों को बंदूक और बम बांधकर लोगों की जान से खेलने की...उनके जिस्म पर बम बांधकर बदला लेने की हवस...जो दुनियाभर के आतंकी संगठन कर रहे हैं...
और ये चेहरा है 2009 की हिंदी टीवी रिपोर्टिंग का...इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि आप यूट्यूब की फुटेज इस्तेमाल करके किसी मुद्दे को हथियार बना रहे हैं, अपनी बात कह रहे हैं...लेकिन आपत्ति उसके प्रस्तुतिकरण पर जरूर होनी चाहिए...जो बेहद खौफनाक, सस्ती, मुद्दे से कोसों दूर, सनसनी से भरपूर और डर के सिवाय कोई भी असर छोड़ने में नाकामयाब है...
हमास बच्चों को अपने ग्रुप में शामिल करके उन्हें बाकायदा जिहाद में दीक्षित कर रहा है...मणिपुर में कुछ उग्रवादी संगठन, लिट्टे, कश्मीर के कुछ संगठन, तालिबान, अल कायदा और सरकारों के खिलाफ जेहाद में जुटे कई संगठन बच्चों को कवच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं... लेकिन क्या इसे ऐसे पेश करना ठीक होगा कि ये आपका मनोरंजन करे एक हॉरर मूवी की तरह...इस बारे में आगे सोचने की कोई गुंजाइश ही न छोड़े...
लेकिन ऐसा ही हुआ... अगर इस मुद्दे को भारतीय हिंदी टेलीविजन या अखबार उठाते हैं तो यही संदेश समझ आता है...सिर्फ यही खास, बाकी सब बकवास...बिल्कुल यही मैसेज होता है उनका...
यूट्यूब की इस फुटेज में हमास के एक स्थानीय नेता और एक बच्चे अहमद से स्थानीय रिपोर्टर का इंटरव्यू है... रिपोर्टर आतंकी और बच्चे से सवाल करती है...आतंकी अपना मकसद बताता है कि उनकी लड़ाई इजरायल के खिलाफ है और ये बच्चा उनका भाई है जो उनके मिशन में बेहद उपयोगी है...वो ये भी बता रहा है कि उनके पास अहमद जैसे सैकड़ों-हजारों बच्चे हैं...अगर अहमद शहीद भी हो गया तो उसकी जगह लेने को हजारों अहमद तैयार हैं...अहमद भी शहादत का जज्बा रखता है...
हिंदी पत्रकारों का सवाल है कि क्यों वो बच्चे मारे जा रहे हैं और ये नकाबपोश बचे हुए हैं... क्यों नहीं ये खुद लड़ने जाते...वो बता रहा है एकबारगी तो अहमद भी सिहर जाएगा...जो खुद की मर्जी से शहीद होना चाहता है, वो भी रुआंसा हो जाएगा... जब उसके बड़े भाइयों यानी इन नकाबपोशों के कुछ शब्द उसके कानों में शीशों की तरह पिघलेंगे...(बेहद गैरजिम्मेदाराना सामान्यीकरण और हवा में महल)
क्या यही समझदारी है इस मुद्दे की...जिस सवाल को हिंदी मीडिया भारत में बैठकर उठा रहा है...वो उन जेहादियों के लिए पूरी तरह बेमानी है...और क्या उन्हें ये पता नहीं कि नकाबपोश भी लड़ने जाते हैं... सैकड़ों-हजारों फिलिस्तीनी नौजवान लगातार इजरायल के खिलाफ संघर्ष में मारे जा रहे हैं...क्या उन्हें पता है कि आखिर फिलिस्तीन की जमीन क्यों इजरायल के खिलाफ धधक रही है...क्यों ऐसी नौबत आई कि बच्चों के सिर पर कफन बांधना पड़ा...छोड़िए जाने दीजिए...हिंदी दर्शक इतना गरिष्ठ मानसिक भोजन नहीं कर पाएगा...ये उनका दर्शन है... इसलिए आपका मनोरंजन करने और आपकी संवेदनाएं छूने के लिए बस खौफ का ही आखिरी रास्ता बचा है हिंदी मीडिया के पास...दूसरे, इसमें खुद की नाजानकारी भी आसानी से छिप जाती है...
इसी फुटेज में आतंकी बता रहे हैं कि आखिर अहमद इतनी छोटी उम्र में ही उनके साथ क्यों है... क्योंकि उनसे उनका बचपन छीन लिया गया...लेकिन ताज्जुब ये कि पूरी कहानी में सबसे अहम इस बात की कोई व्याख्या ही नहीं है...क्योंकि खुद उसे इस मुद्दे का ही पता नहीं है कि आखिर वो बचपन कैसे गया...और कहां गया...किसकी वजह से गया...और इसे बगैर किसी तवज्जो के छोड़ दिया गया...
चलती-फिरती मौत, पैरों पर चलकर आती तबाही, पलक झपकते मचा सकता है तबाही का तांडव, सैकेंड्स में सबकुछ खत्म कर देगा ये, बारूद वाला बच्चा, बर्बादी का बवंडर...मौत का परवाना.......ये वो कुछ जुमले हैं जो हिंदी मीडिया ने आतंकवादियों के साथ शामिल बच्चों को दिए... बड़े-बड़े शब्द...बेमानी लेकिन सनसनीखेज...संवेदनाहीन...जो शायद अब किसी के कानों पर जूं की तरह भी नहीं रेंगते...क्योंकि हर दूसरी-तीसरी लाइन पर इन्हें सुन-सुनकर आपके रौंगटे भी बैठ चुके हैं...
तो क्या मीडिया ने हिंदीभाषियों-हिंदी दर्शकों-हिंदी पाठकों को निरा उजड्ड, गंवार और बेवकूफ समझ रखा है...लगता तो कुछ ऐसा ही है...क्योंकि आंकड़े भी (टीआरपी) उन्हीं के साथ हैं... वो आपकी संवेदनशीलता को चुनौती देते हैं रोज...वो आपका वक्त ज़ाया करते हैं रोज...वो आपको पूरे परिवार के बीच शर्मसार करते हैं रोज...वो आपको जिल्लत और जहालत से भरपूर बताते हैं हरपल...आपकी सेंसिबिलिटी को कुरेदते हैं वो...आपको निहायत तुच्छ समझते हैं...पूरी सीनाजोरी के साथ...क्योंकि उनके पास आंकड़े हैं...अपनी बात के समर्थन में...
और फिर...हिंदी मीडिया को लगता है...भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त के बाद हिंदी में कोई साहित्यकार पैदा ही नहीं हुआ है...जो आपकी समझ विकसित कर सकता...हिंदी पत्रकार ही वो है जिसने हर नौकरी के नाकाबिल होने के बाद इस प्रोफेशन में कदम रखा...जो अपने गांव-कस्बे से सीधे महानगर पहुंचा...पढ़ने-लिखने से उसका कोई वास्ता नहीं...जो आपने पढ़ा, वही आपके पिताजी और उनके पिताजी ने पढ़ा था...इसलिए सोचें कैसे और क्या नया...कहां से आए संवेदनशीलता...गंभीर है तो गरिष्ठ है उसके लिए...हजम नहीं होता...इसीलिए हिंदी में अब विचार नहीं होता...सिर्फ साहित्य चिंतन होता है या प्राचीन महान का महिमामंडन...या फिर बचते हैं खतरनाक की कोटि में आने वाले शब्दबाण...
मगर एक बात है...हिंदी मीडिया अपने अंग्रेज सामंतियों की तरह ये भलीभांति जानता है कि हिंदी बेल्ट आधुनिकताबोध से वंचित नहीं है...बेशक उधारी की ही क्यों न हो...इसलिए इस बेल्ट को बाजार के बतौर देखने में उन्हें कोई उज्र नहीं है...हां, वो ये भी जानते हैं कि माल खरीदने वाला हिंदी ग्राहक सिर्फ नारों पर जाता है... और हर चमकदार, जोरदार, चीखपुकार से बेची गई चीज तुरंत खरीद लेता है... इसलिए साहित्यचिंतन से मुक्त हिंदी पत्रकारिता अब खतरनाक शब्दबाण लेकर मैदान में है...24X7 वो यही शब्दबाण छोड़ रही है...बाकी सबकुछ चुक गया है...हिंदी स्टाइल में अंग्रेजी पत्रकारिता...अंग्रेजी स्टाइल में देसी चिंतन...
नदी
क्या नदी बहती है या समय का है प्रवाह हममें से होकर या नदी स्थिर है पर हमारा मन खिसक रहा है क्या नदी और समय वहीं हैं उस क्षैतिज रेखा पर...
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(यह कहानी मुझे www.yourtango.com पर मिली.. लेखिका हैं एमिली रोजेन..मेरा इसमें कुछ नहीं..सिर्फ अनुवाद) मैं उसके ऑफिस में थी, अपने घुटनों पर...
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मैं उसे परपीड़क कहूँगा , घोड़ों की लाशों से प्यार करने वाला. मगर ये बात फ़िज़ूल है- वुडी एलेन बस लाश ही हूँ मैं, टांगों के सिवा, जिसे आ...