28/2/09

बांग्लादेश: जम्हूरियत को लगी नजर

सारी दुनिया पिछले तीन दिन से बांग्लादेश राइफल्स के विद्रोह की तस्वीरें और ढाका में चल रही हलचल को देख रही है... लेकिन अभी तक पूरी तरह साफ नहीं कि आखिर वो क्या बात थी जिसने बांग्लादेश राइफल्स में इतने बड़े विद्रोह को हवा दे दी...क्या ये सिर्फ बांग्लादेश का आंतरिक मामला है... और क्या वास्तव में विद्रोह खत्म हो चुका है... ये कुछ सवाल हैं जिनसे दक्षिण एशियाई थिंक टैंक दोचार है... बांग्लादेश आर्मी बेशक सरकारी नियंत्रण में रही है, लेकिन बांग्लादेश राइफल्स ने 1971 से ही अपनी पहचान बनाए रखने पर जोर दिया है... वो सेना के साथ कभी नहीं मिली... इसके पीछे है एक लंबा इतिहास... हालांकि बांग्लादेश राइफल्स में समय-समय पर सेना के ही अफसर नियुक्त होते रहे हैं...

ईस्ट इंडिया कंपनी की फ्रंटियर प्रोटेक्शन फोर्स का नाम 1795 में रामगढ़ लोकल बटालियन पड़ा...1861 में इसे फिर से गठित कर नाम दिया गया फ्रंटियर गार्ड्स, 1891 में इन्हें नया नाम मिला बंगाल मिलिट्री पुलिस और 1920 में ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स और 1947 में ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स... इसके बाद 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के साथ ही इन्हें वो नाम मिला जो आज तक इनके साथ है...  

सेना और बीडीआर दोनों में काफी वक्त से वेतन, काम करने की परिस्थितियों, रैंक, लाभों और करियर में मौकों को लेकर ऊंच-नीच रहा है... बीडीआर अफसरों काफी वक्त से इसे लेकर गुस्से में हैं... बीडीआर जवानों ने कई बार अपनी मांगें रखी भीं, लेकिन उन्हें अनसुना कर दिया गया... डायरेक्टर जनरल ने प्रधानमंत्री के सामने उनकी मांगें रखने का वायदा भी किया लेकिन जब प्रधानमंत्री शेख हसीना बीडीआर के कार्यक्रम में गईं तो डायरेक्टर जनरल अपना वायदा भूल गए... पूरी रात बीडीआर जवानों को नींद नहीं आई... अगली सुबह सभी 168 सेक्टर कमांडर दरबार हॉल में इकट्ठे थे...तभी वहां बीडीआर जवानों और उनके अफसरों में जमकर तकरार हुई... कहा जाता है कि इसी दौरान खुद एक ऑफिसर ने अपनी रायफल से फायर झोंक दिया... और इसके बाद तो जैसे ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका रख दिया गया...गुस्साए बीडीआर जवानों ने कैंटोनमेंट एरिया में निकलकर एक के बाद एक अफसरों को भूनना शुरू कर दिया...विद्रोह के 10 मिनट में ही डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल शकील अहमद को गोलियों से छलनी कर दिया गया...जो रास्ते में आया बीडीआर जवानों ने गोलियां दाग दीं... खबरें यहां तक हैं कि खुद बीडीआर चीफ ने एक जवान के साथ नोकझोंक के बाद अपनी बंदूक निकाली और उस पर फायर कर दिया... इसके बाद हालात बिगड़ गए.. बीडीआर जवानों ने मीडिया के सामने झूठ भी बोला और सिर्फ एक अफसर की मौत का खुलासा किया था...जबकि तब तक वो करीब 70 अफसरों को मौत के घाट उतार चुके थे...यही नहीं जिन्हें गोली मारी गईं, उन्हें संगीनें भी घुसाकर उनके जिस्म क्षतविक्षत कर दिए गए...बंधक बनाए गए कुछ अफसरों ने क्रूरता के जो हालात बयान किए हैं... उनसे इस विद्रोह के स्केल का पता चलता है... बीडीआर में कैप्टन रैंक से ऊपर के सारे अफसर मारे जा चुके हैं... 

हालात को देखें तो तय है कि ये सिर्फ अचानक हुआ विद्रोह नहीं है... लेकिन क्या एक लोकतंत्र में जवानों की परेशानियों की इस कदर अनदेखी करना ठीक है कि वो अपने ही लोगों के खिलाफ विद्रोह पर उतर आएं...शायद शुद शेख हसीना सरकार को भी इसका इल्म न था कि ऐसा हो जाएगा... इसका पता इस बात से भी चलता है कि तुरंत सरकार ने विद्रोही बीडीआर जवानों के सामने घुटने टेक दिए और उन्हें आम माफी की घोषणा कर दी... 

बहुत से सवाल हैं और उनके जवाब कोई नहीं... आखिर विद्रोह क्या वेतन-भत्तों की मांग को लेकर हुआ... या फिर इसके पीछे कोई सोची समझी तैयारी थी... बांग्लादेश की इंटेलीजेंस एजेंसी तब क्या कर रही थीं... अपने अफसरों को इतनी बड़ी तादाद में मौत के घाट उतारने वाले जवानों को तुरंत आम माफी कैसे देने का ऐलान कर दिया गया.. क्या शेख हसीना सरकार का उनके साथ कोई समझौता हुआ है... विद्रोह के पहले राउंड में मीडिया के सामने बीडीआर ने आत्मसमर्पण का जो ऐलान किया था क्या वो महज सहानुभूति हासिल करने का तरीका था... क्या ये सच है कि जवानों और उनकी महिलाओं के साथ भी अफसर बुरा बर्ताव करते रहे हैं...बांग्लादेश सरकार ने पहले राउंड में विद्रोह के दौरान ही बंधकों को छुड़ाना अपनी प्राथमिकता नहीं समझी, क्यों... क्या बीडीआर के डीजी ने ही खुद सबसे पहले फायर किया था...  

खूनी विद्रोह डेढ़ अरब आबादी वाले भुखमरी से जूझते बांग्लादेश की राजनीति का एक हिस्सा रहे हैं... 1971 में ये देश खुद एक विद्रोह से जन्मा, जब बांग्ला बोलने वाले पूर्वी पाकिस्तानियों ने पाकिस्तान से अपना नाता तोड़ने का ऐलान कर दिया... 1982 में आर्मी चीफ लै जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद ने सैनिक तख्तापलट में सत्ता हथिया ली और 1990 में लोकतंत्र की वापसी तक काबिज रहा...2007 में एक बार फिर सेना सड़कों पर उतरी, जब देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के बीच आपसी संघर्ष ने सैकड़ों-हजारों को तबाह कर दिया... दो साल बाद फिर से लोकतंत्र की वापसी हुई है लेकिन पुरानी आग अभी भी धधक रही है... इस बार बीडीआर ने विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया है... तो क्या ये बांग्लादेश में एक बार फिर लोकतंत्र के अंत का संकेत है...

27/2/09

कसाब, कम से कम प्लेटफॉर्म टिकट तो ले लेते!

ये वो देश है जहां आप किसी का कत्ल कर दें, तो भी ये सुनिश्चित नहीं कि आपको सजा मिलेगी ही... और अगर आप किसी सम्माननीय की औलाद हैं तो तय मानिए कि शायद ही आप जेल जाएं और शायद ही आपको कोई छूने की हिम्मत ही करे...यही वो देश है जहां कानून आपके पैरों की जूती से ज्यादा अहमियत नहीं रखता...यही वो देश है जहां सबसे ज्यादा कानून के रखवाले ही कानून तोड़ने वालों में शामिल हैं...

और यही वो देश है जहां 50 से ज्यादा लोगों के कातिल कसाब पर रेलवे ने बगैर प्लेटफॉर्म टिकट लिए स्टेशन में घुसने का अपराध दर्ज किया है... कसाब के खिलाफ 26 फरवरी को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई है... उसके खिलाफ तकरीबन 12 केस लगाए गए हैं... और इन्हीं में कसाब और उसके साथी का एक अपराध है छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन पर बगैर प्लेटफॉर्म टिकट के घुसने का... कसाब और 10 आतंकियों के लीडर उसके साथी अबू इस्माइल ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हमला किया था...बधवार पार्क एरिया में आतंकियों की पांचों टीमों के अपनी मुहिम पर निकलने के बाद कसाब और इस्माइल टैक्सी से सीएसटी स्टेशन पहुंचे और स्टेशन के एक किनारे से प्लेटफॉर्म पर घुसे... इसके बाद वो मुख्य वेटिंग हॉल में घुसे... दोनों ने हैंड ग्रेनेड उछाले और अपनी एके-47 से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी...इसके बाद दोनों एक तरफ जाकर छिप गए... आखिर कसाब को गिरगाम चौपाटी पर पकड़ लिया गया और इस्माइल पुलिस की गोली का शिकार हुआ... रेलवे का कहना है कि दोनों ने सीएसटी स्टेशन पर बगैर प्लेटफॉर्म के घुसकर रेलवे के नियमों का उल्लंघन किया है... दोनों के पास प्लेटफॉर्म टिकट नहीं थे...  

जिस शख्स पर इतने बड़े आतंकी हमले को लॉन्च करने, उसे अंजाम देने... पूरी बेदर्दी के साथ 50 से ज्यादा लोगों को कत्ल करने का आरोप है... क्लोज सर्किट टीवी की तस्वीरें इसकी गवाह हैं... तो इस अपराध का क्या मतलब है...अगर कोई अपराध कायम होता है... तो वो इसलिए होता है कि नियम तोड़े गए हैं...लेकिन कानून का कोई भी जानकार शायद इससे इनकार करे कि जिस शख्स पर हत्या का अपराध दर्ज है... तो उनमें इस अपराध का क्या औचित्य रह जाता है...  

क्या आप इससे ये अर्थ निकालने को मजबूर नहीं होते कि कसाब को अगर रेलवे स्टेशन पर घुसना ही था तो कम से कम प्लेटफॉर्म टिकट तो ले लेता...यानी प्लेटफॉर्म पर वो चाहे जिसका खून करे लेकिन पहले प्लेटफॉर्म टिकट लेना जरूरी है...क्या ये कानून का मजाक नहीं है... लेकिन कानून को पेचीदा और झोल से भरपूर करने के लिए जिम्मेदार लोगों को इससे कोई मतलब नहीं रह गया है कि वो क्या कर रहे हैं... और दुनियाभर में बारीकी से हो रही इस इंटरनेशनल केस की स्क्रूटनी में वो किस हद तक हंसी के पात्र बनेंगे...

24/2/09

ब्लॉगर, आपका वकील कहां है!

अगर आपके ब्लॉग पर किसी पोस्ट की वजह से आपके खिलाफ कोई केस हो जाए तो... आपको किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म की मानहानि के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाए... अब ऐसा हो सकता है... ये खतरा अमेरिका, चीन, बर्मा के बाद मध्य एशिया के देशों में फैला और अब भारत में आसन्न खड़ा दिखाई दे रहा है...
यानी अब तक ब्लॉगिंग के सामान्य उसूल भी आपके खिलाफ खड़े हो सकते हैं... क्योंकि उन पर कानून की नजर है...
19 साल के एक ब्लॉगर अजीत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का कथन इसका सबूत है... जिसने शिवसेना के खिलाफ अपने ऑर्कुट प्रोफाइल पर एक कम्यूनिटी खड़ी की... मकसद था महाराष्ट्र कोर्ट की तरफ से एक क्रिमिनल केस में अपने खिलाफ जारी सम्मनों से बचाव... लेकिन उसका तरीका चल नहीं पाया... इस पोस्ट पर शिवसेना के खिलाफ आई प्रतिक्रियाओं से शिवसैनिक इतने तिलमिलाए कि उन्होंने ब्लॉगर अजीत के खिलाफ थाणे पुलिस स्टेशन में एक और केस ठोक दिया...
अजीत को केरल हाईकोर्ट से एंटिसिपेटरी जमानत मिली तो वो सुप्रीम कोर्ट चला गया जहां उसका तर्क था कि कम्यूनिटी में दर्ज हुए सारे कमेंट्स उस कम्यूनिटी तक ही महदूद हैं... उनका मकसद किसी का अपमान करना नहीं था... और ये अभिव्यक्ति की आजादी की तरह समझे जाने चाहिए... एक कंप्यूटर साइंस छात्र अजीत की बात को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना... सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि वो अच्छी तरह जानता है कि कितने लोग इंटरनेट पोर्टल देखते हैं... और अगर कोई इस कंटेंट को पढ़ने के आधार पर कोई केस दर्ज कराता है तो उसे इसका सामना करना पड़ेगा... और ये भी साफ करना होगा कि इस कंटेंट को अपने वैबपेज पर रखने के पीछे उसका तर्क क्या है...
इस मामले को बतौर ब्लॉगर आप कैसे देखते हैं... ये काफी अहमियत रखता है... सुप्रीम कोर्ट के रुख से दो-तीन बातें एकदम साफ हो गई हैं... 
एक, अगर आपके ब्लॉग पर जो भी कंटेंट मौजूद है तो उसके लिए सिर्फ और सिर्फ आप ही जिम्मेदार माने जाएंगे... 
दूसरे, अगर आपके वैबपेज, कम्यूनिटी वैबसाइट और ब्लॉग पर किसी ने अपने विचार रखे हैं और आप सिर्फ होस्ट की भूमिका निभा रहे हैं तो काम नहीं चलेगा... जिन्होंने विचार व्यक्त किए हैं, वो उतने नहीं बल्कि आप इसके आपराधिक पक्ष की ज़द में आएंगे...
तीसरी बात, आप अभिव्यक्ति की आजादी का सहारा लेकर अपनी वैबसाइट को क्लीनचिट नहीं दिला सकते... आपको इसके तहत मौजूद कानूनी नुक्तों का ख्याल रखना होगा... 
चौथी बात, किसी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी और गलतबयानी, बदनामी और मानहानि के लिए जो कानून प्रिंट और टीवी पर लागू होता है, ब्लॉगर भी उसकी सीमा में आते हैं...
पांचवीं बात, अगर आप ब्लॉग या कम्यूनिटी वैबसाइट या वैबपेज शुरू कर रहे हैं तो एक वकील को भी साथ रखें, वरना आप कब जेल में होंगे कहना मुश्किल है...

इस घटना से कम से कम ये तो साबित हो गया है कि ब्लॉग अखबार और टीवी से कमजोर नहीं है... वो उतना ही बड़ा मीडियम है जितने दूसरे... और कानून का जो कंसर्न दिखाई दे रहा है, उसमें अखबार और टीवी से भी ज्यादा इसकी जिम्मेदारी देखी जा रही है... 

23/2/09

धारावी तो कुनैन है!

हॉलीवुड ने भारत की गंदगी को रेड कार्पेट पर ले जाकर सम्मानित कर दिया है... जो गंदगी हमें कालीन के नीचे रखनी मंजूर थी, हॉलीवुड ने उसने उघाड़कर दुनिया के सामने खड़ा कर दिया है...स्लमडॉग मिलियॉनेयर को 8 एकेडमी अवार्ड से नवाजा जाना उस सच का सम्मान लगता है, जिसे हम कबूलने से साफ इनकार करते हैं... अगर इसे बदजुबानी न माना जाए तो शायद हमारे किसी फिल्मकार में अभी भी ये दम नहीं कि वो विश्वमंच पर ऐसा सिनेमाई यथार्थ उतारने की हिम्मत रखता हो...
स्लमडॉग को लेकर राष्ट्वादी भारतीयों की आवाजें आईं थीं कि ये गंदगी को सिर पर रखने जैसा है... लेकिन डायरेक्टर डैनी बॉयल को इसकी परवाह नहीं थी...उनकी प्रतिबद्धता सिर्फ कला के प्रति थी और उन्होंने वही किया भी...लेकिन भारत में इस फिल्म को लेकर जो होहल्ला मचा था, जो विरोध हुआ उस पर आप क्या कहेंगे... मेरे ख्याल में स्लमडॉग को गंदगी का पोर्न सिनेमा कहने वालों के लिए ये वैसा ही था जैसे किसी अतिथि ने आपको आपके टॉयलेट में बैठे देख लिेया हो...

घोर गरीबी में कुलबुलाते धारावी को भी उसी हिंदुस्तान ने खड़ा किया है जो इसका विरोध करता है... वो आर्थिक ऊंचाइयां छूते इसी भारत का बाय प्रोडक्ट है... लेकिन आसमान से बातें करता कामयाब हिंदुस्तान दुनिया के सामने इस सच को नहीं लाना चाहता... लेकिन इससे धारावी और ऐसे दूसरे स्लम का अस्तित्व खत्म नहीं हो जाएगा... वो रहेंगे और आपकी कामयाबी को मुंह चिढ़ाते रहेंगे... 

स्लमडॉग मिलियॉनेयर ने मुंबई जैसे लाजवाब शहर की जीवंतता और कामयाबी के शिखर चूमते शहर के दो बड़े सच सामने रखे हैं... एक सच है ताकत और शोहरत की दौड़ में जुटे शहर का तो दूसरी तरफ है अपनी जिंदगी से जद्दोजहद करते शहर का... स्लम में जवान होता नायक खुद कामयाब होने का सपना देख रहा है...चाहे वो अपनी महबूब को पाने की हो या फिर कौन बनेगा करोड़पति के जरिए नई जिंदगी की शुरुआत की...

डैनी बॉयल की फिल्म किसी कल्पना या हीरोइज्म का सहारा नहीं लेती... जैसा कि आप दूसरी स्लम आधारित फिल्मों में देखते आए हैं... चाहे वो पुलिस बर्बरता हो, झुग्गीबस्ती में गुजर-बसर कर रहे लोगों की दयनीय हालत हो, धर्मों के नाम पर होने वाले दंगे हों, भीख मंगवाने के लिए बच्चों का अपहरण हो... आप हर चीज पर सौ फीसदी यकीन कर सकते हैं... कहानी में कुछ मोड़ जरूर हैं, जो शायद हर किसी की जिंदगी में नहीं आते... लेकिन जिंदगी फिल्म का प्लॉट भी तो तभी बन सकती है, जब फिल्मकार इस जिंदगी में कुछ अनयूजुअल, अनोखा ढूंढ निकाले... यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी है...

हां, डैनी बॉयल ने भारत में फिल्म बनाते वक्त एक बात का पूरा ख्याल रखा... भारतीय प्रतीकों का... उन्होंने जहां जरूरी समझा उन्हें इस्तेमाल कर लिया... चाहे वो प्यार की मिसाल ताजमहल हो या बदलती महानगरीय जिंदगी की पहचान कॉल सेंटर हों...हो सकता है कि आप कहें कि उन्होंने विदेशों में भारत की तस्वीरों में सबसे ज्यादा दिखने वाले सपेरों का इस्तेमाल कहीं नहीं किया है... जाहिर है भारत से पूरी तरह नावाकिफ डैनी बॉयल को ज्यादातर भारतीय प्रतीक अपने पूर्ववर्ती फिरंगियों से ही लेने पड़े... वरना इतनी जल्द इस देश की मिट्टी को समझ पाना आसान भी तो नहीं था...और इसके बावजूद उन्होंने अपनी फिल्म में संतुलन नहीं खोया...
 
शायद भारत में हायतोबा की एक वजह ये भी रही कि स्लमडॉग मिलियॉनेयर ने भारतीय मध्यवर्ग की अनदेखी की है... इसने तरक्की करते भारत के उस हिस्से को सामने रखा है, जिसके एक पैर में गैंग्रीन हो चुका है...जमाने के साथ कदमताल की कोशिश कर रहे तरक्कीपसंद हिंदुस्तान को अपने पैर में हुए इस गैंग्रीन की परवाह नहीं है... 
ये वो चीज है जो हम ज्यादातर मध्यवर्गीय भारतीयों के गले नहीं उतरती...हम सपनों में रहने वाले, सपने देखने वाले लोग हैं...पिछले सौ साल से पर्दे पर हमें प्यार-मोहब्बत की कहानियां ही अच्छी लगती रही हैं... धारावी के शहर के फिल्मकारों ने भी हमें कमोबेश यही दिया है... और धारावी तो कुनैन है... 

24/11/08

टीआरपी जिसे कहते हैं...

कहते हैं एक बार एक राजा पर उसके दुश्मन ने हमला किया... लेकिन ये हमला सैनिक नहीं था... राज्य की जनता और राजा को मारने के लिए उसने नया उपाय खोजा था... वो ये था कि किले के सभी कुओं में जहर डाल दिया गया... जिन्होंने भी वो पानी पिया, मौत की गोद में चले गए... सिर्फ एक कुएं में कुछ पानी ठीक था... पर जिसने भी उसे पिया, वो पागल हो गया... किले की जनता पागल हो चुकी थी और उसका कहना था कि उनका राजा पागल है... उसने राजा के महल पर हमला बोल दिया... तभी राजा के विश्वासपात्र मंत्री को एक उपाय सूझा... उसने राजा को सलाह दी कि अब बचने का एक ही रास्ता है उस कुएं का पानी पी लिया जाए... ताकि राजा भी अपनी जनता की तरह हो जाए... बेमौत मारे जाने से बेहतर था पानी पी लिया जाए... राजा ने वक्त की नजाकत समझी और पानी पी लिया... इसके बाद महल से बाहर आकर वो भी जनता के साथ शामिल हो गया... अब राजा और प्रजा दोनों खुश थे...
ये कहानी कई बार कही गई है... मैंने अपनी स्मृति के सहारे लिखी है... इसलिए मुमकिन है कि कुछ विवरणों में गलती हो जाए... लेकिन कहानी तकरीबन यही है... दरअसल ये कहानी हमसे कुछ कहती है... सामूहिक झूठों, बहुमत की तानाशाही के बारे में... और ऐसा ही एक सामूहिक झूठ है टीआरपी...
आंकड़े बताते हैं कि ७ हजार करोड़ रुपये की टेलिविजन चैनल इंडस्ट्री हर साल 23 फीसदी की दर से बढ़ रही है... लेकिन इस चैनलों को चलाती है एक कंपनी टेलीविजन ऑडिएंस मेजरमेंट यानी टैम... और यही देती है हफ्तेवार टीआरपी यानी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट...
अब आप पूछ सकते हैं कि ऊपर की कहानी से टीआरपी का क्या ताल्लुक... मैं बताता हूं... जरा टीआरपी को उस कुएं की पानी की जगह रखकर देखिए, जिसे पीकर राजा और उसके मंत्री की जान बची थी... शायद आप समझ गए होंगे... जी हां, टीआरपी पीकर ही चैनलों की जान बचती है...
लेकिन इस कहानी को और समझने के लिए जरा गौर करें... टीआरपी तय होती है 14 राज्यों के ७३ शहरों में लगे पीपुलमीटरों से... कंपनी इनसे ७००० सैंपल इकट्ठा करती है... और हर हफ्ते चैनलों की रेटिंग बताती है... यानी ७००० लोगों की पसंद-नापसंद पर चल रही है ७००० करोड़ सालाना की इंडस्ट्री...
टैम के मुताबिक खबरों का बाजार दिल्ली और मुंबई हैं... इसलिए वहां हर घटना राष्ट्रीय झंडे के बाद फहरने वाली पहली चीज होती है... और बिहार की बाढ़ स्निपेट... यानी संक्षिप्त... (हां, अगर दिल्ली और मुंबई से कोई डिग्नीटेरी जा रहा हो, तो बात अलग है)
अब बात करते हैं विज्ञापनदाताओं की... यानी एड एजेंसियों की... आप पूछेंगे कि कहानी में ये कहां फिट बैठते हैं... ये वही जनता है जो राजा को मारने के लिए महल पर टूट पड़ी थी... जी हां, एड एजेंसियां टैम की हफ्तेवार रिपोर्ट पर ही चैनलों को सांस लेने की इजाजत देते हैं...यानी विज्ञापन तभी मिलेंगे जब टैम में आपका ग्राफ ऊपर चढ़ता दिखेगा...
आप पूछेंगे कि चैनल खुद अपना पीपुलमीटर क्यों नहीं लगा लेते... तो वो इसलिए क्योंकि इन कोशिशों को एड एजेंसियां तरजीह नहीं देतीं... वो इनकी विश्वसनीयता को मानेंगी ही नहीं... और उन्होंने कोई कोशिश भी नहीं की अभी तक... उनमें इतनी हिम्मत भी नहीं है... यानी राजा किसी भी हालत में बच नहीं सकता मरने से...
जान बचाने के लिए उसके सामने एक ही रास्ता बचा है... उसी कुएं का पानी पी ले, जिसे किले की बाकी जनता ने पिया है... इस पानी को पीकर ही वो बच सकता है... बेशक पागल हो जाए...
मैं जानता हूं कि आपके ढेरों सवाल हैं... कि आखिर मंत्री कौन है... मंत्री है चैनल का मैनेजमेंट और संपादक... जो साफ कहता है राजा आप पानी पी लें, वरना मौत तय है... क्योंकि जनता दरवाजे पर पहुंच चुकी है...
लेकिन सवाल है कि दर्शक कहां है कहानी में... अब आप ही बताएं कहां है वो... सभी सवालों का जवाब मैं ही क्यों दूं... आप सोचिए और बताइए... कहानी में दर्शक कहां है... है भी या नहीं... या कहानी कहते वक्त दर्शक नहीं हुआ करता था...

15/9/08

डिजेस्टर टूरिज्म का नाम सुना है?

जी हां, मैं पूछ रहा हूं कि डिजेस्टर टूरिज्म का नाम सुना है आपने... शायद न सुना हो तो बता देता हूं... वो टूरिज्म जो अभी बिल्कुल बाल अवस्था में है... टूरिज्म यानी पर्यटन की वो शाखा जिसमें आप किसी ऐसे स्थान पर जाते हैं... जहां लोग किसी भारी विपदा या प्राकृतिक आपदा से दो चार हों...
हाल ही में दिल्ली ब्लॉगर्स की एक पोस्ट को देखा तो लगा कि एक अनोखा ही ट्रैंड चल पड़ा है... अब लोग उन जगहों की यात्रा पर पर्यटन पर निकल रहे हैं... जहां लोग या तो प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे हैं या फिर आदमी की खुद बनाई किसी मुसीबत से... इसी पोस्ट पर जिक्र था लखनऊ के पास एक जगह का जहां लोगों के घर पानी में डूब गए हैं... वहां लोग अपने परिवार सहित गाड़ियों में बैठकर पहुंच रहे हैं... ठेलेवाले आइसक्रीम और चाट के ठेले लगाकर खड़े हो गए हैं... माल बिक रहा है... ऐसे ही एक व्यक्ति राजीव से उस ब्लॉगर ने सवाल किया कि कैसे वहां आना हुआ? राजीव नाम के इस शख्स ने अपने बेटे को ठेलेवाले से एक आइसक्रीम लेकर बेटे को देते हुए कहा... मैं चाहता था कि मेरा बेटा भी देखे कि पानी में डूबे लोगों के घर क्या कैफियत पैदा करते हैं... और कैसे लोग उससे जूझते हैं... ये तो रही एक बात...
इसी कहानी को दूसरा विस्तार देना चाहूंगा... आज ही के टाइम्स ऑफ इंडिया में एक नीदरलैंड के जोड़े की खबर है... जो दिल्ली में गफ्फार मार्केट पहुंचा... आतंकी धमाकों के बाद... वो लोग आगरा से ये देखने आए हैं कि आखिर दिल्ली में उन जगहों पर क्या हुआ जहां बम फटे... कैसे दिल्ली इन धमाकों के दंश को झेल रही है... यानी पुलिस और पत्रकार के अलावा अब सरकार को उन लोगों का भी ध्यान रखना होगा जो त्रासदी के बाद इन जगहों के दौरे के लिए जाते हैं... महज उस रोमांच को महसूस करने जो दूसरे झेल रहे हैं... जिंदगी और मौत के संघर्ष को पास से देखने ताकि वो इनके प्रति असंवेदनशील हो सकें... अच्छी तरह... क्योंकि ये तो कहा नहीं जा सकता कि अगली बार आपका नंबर नहीं आ सकता...

4/9/08

ब्लैकबेरी की औलादें!

कुछ जमीन की औलादें होती हैं तो कुछ अमीन की... कुछ फकीरी की औलादें होती हैं तो कुछ हकीरी की... इसी तरह होती हैं ब्लैकबेरी की औलादें... जन्मे और अजन्मे के बीच की रेखा जहां खत्म हो जाती है वहां पनपते हैं ये कुकुरमुत्ते... ये वो औलादें हैं जिन्हें मां के गर्भ से बाहर आने के बाद कोई झटका नहीं लगता... ये वो बच्चे हैं जो अब वयस्क नहीं होंगे... ये वो औलादें हैं जिन्हें बुजुर्ग ही पैदा होना था... एक संवाद सुनें... 'अरे यार पेपर खराब हो गया है, मैंने शायद कुछ गलत लिख दिया था... मुझे लग रहा था कि वो अब दोबारा देना पड़ेगा'... आप सोच सकते हैं कि शायद ये किसी बच्चे का अपने दोस्त से किया गया संवाद होगा... जी, ये संवाद तो था, लेकिन किससे पता नहीं... लेकिन इससे अलग कुछ बात कहना चाहूंगा...
रात को देर से एक सड़क के किनारे दोस्त के साथ खड़ा था कि एक तेजरफ्तार स्कूटी मेरे बगल में आकर रुकी... पीछे एक लड़की बैठी थी और एक लड़का स्कूटी चला रहा था... लड़की के हाथ कान पर एक मोबाइल थामे थे... लड़का स्कूटी चलाते हुए भी कान से मोबाइल दबाए आया था... जैसे ही स्कूटी रुकी लड़की छलांग मारकर नीचे उतरी और मार्केट की तरफ दौड़ गई... पीजा हट शॉप के लिए... लड़का जो बातचीत में मशगूल था, कान पर मोबाइल फोन लगाए उतनी ही तेजी के साथ उतरा... चाभी खींची और लड़की के पीछे भाग लिया... आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि दोनों की उम्र रही होगी करीब १२ साल... लेकिन उनके हावभाव ३२ साल के थे... आंखों से जमीन के किनारों को पढ़ने का भाव लिए कान पर मोबाइल थामे लड़का भी पीजा हट की तरफ चला गया...
अब अपने मंतव्य पर आता हूं... लड़के के कान पर जो फोन लगा था... वो था ब्लैकबेरी... शायद हमारी पीढ़ी के बहुत से लोगों ने नहीं देखा है... अप्रचलित है और ज्यादातर कॉर्पोरेट्स अपने कर्मचारियों को ट्रैक करने के लिए इस्तेमाल करते हैं... महंगा भी काफी है इसलिए हर भारतीय के बस की बात नहीं... जिस अंदाज से वो ब्लैकबेरी को इस्तेमाल कर रहा था, उससे लगा कि वो इस फोन को अच्छी तरह पहचानता है... क्योंकि उसके फीचर नोकिया जैसे जनपसंद वाले फीचर्स से कुछ भिन्न हैं... अगर वो स्कूल के दिनों में ब्लैकबेरी इस्तेमाल कर रहा है तो क्या हम नोकिया वालों को सावधान नहीं हो जाना चाहिए... अपने ' टैक-सेवी' होने के तमगे पर...

3/9/08

भ्रष्टाचारी है जनता!

पत्रकारिता मेरा पेशा है, मेरा धर्म है... पत्रकारिता से मैं हूं... पत्रकारिता मेरी पहचान है... वो कार्ड नहीं जो मुझे मेरे ऑफिस से मिलता है गले में लटकाने को... बल्कि वो दिल और दिमाग जो मेरे अंदर धड़कते हैं... लेकिन मैं कभी भी सच के साथ नहीं बोलता... क्योंकि मैं पत्रकार हूं... मैं बोलता हूं लेकिन वो मेरा ही बनाया एक सच होता है... सच के खिलाफ एक सच... इसी की मुझसे दरकार है... यही मेरी कंपनी मुझसे चाहती है... और मैं वही उसे देता हूं... इसीलिए मेरी कंपनी में मेरी जरूरत है... और मुझे मेरी कंपनी की... जो मुझे तनख्वाह, परिचय, पहचान, इज्जत सब दिलाती है... उस जनता के बीच जिसके बारे में मैं लिखता हूं... तो ये मैं हूं...

लेकिन मैं अपने बारे में नहीं उस जनता के बारे में कुछ कहना चाहता हूं... जिसके बारे में मैं रोज लिखता हूं... उस जनता को नंगा करना चाहता हूं जिसे मैं अपने ऑफिस में बैठकर नहीं कर पाता... लेकिन ये मेरी जगह है, मेरा कोना है और मैं यहां खुलकर बोल सकता हूं... क्योंकि मैं एक पत्रकार हूं...

दरअसल जिस जनता के लिए हम रोज मरते-खटते हैं... जिस बहुसंख्यक 'लोकतांत्रिक' व्यवस्थावादी जनता के हक में लिखते हैं, वो इस काबिल ही नहीं कि उसकी लड़ाई लड़ी जाए... क्योंकि वो अपनी लड़ाई कभी खुद नहीं लड़ना चाहती... वो चाहती है कि उसकी लड़ाई या तो नेता लड़े या फिर पत्रकार... चूंकि सामान्य और ईमान वाले न रखने के होते हैं न उठाने के, इसलिए वो अपने बीच के सबसे भ्रष्ट लोगों को चुनकर भेजती है... जिन्हें हर तरह का खेल करके उनका काम कराना आता हो... ये काम कोई सार्वजनिक हित नहीं होते... पूर्णत: व्यक्तिगत होते हैं... ये भारतीय जनता है... भीरु और कायर... भ्रष्टाचार में गले तक डूबी हुई...
भारतीय जनता कभी विद्रोह नहीं करती... क्योंकि कोई भ्रष्टाचारी विद्रोह नहीं करता... कर ही नहीं सकता... उसके लिए रीढ़ की हड्डी का होना पहली शर्त है... इसलिए कोई सार्वजनिक काम नहीं होता... सभी सरकारी दफ्तरों में रोज के घंटे अगर गिन लिए जाएं तो व्यक्तिगत काम के लिए पहुंचने वालों की तादाद किसी सड़क, नल लगाने जैसे कामों के लिए पहुंचने वालों के मुकाबले ९८ फीसदी तक होगी... और ये ९८ फीसदी अपने कामों को भी सरकारी कर्मचारियों की जेब गर्म करके करा रहे होंगे...
बहुत कुछ कहा जा सकता है... लेकिन एक बात जरूर कहूंगा कि भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज नहीं रह गई है अब... अब पूरा समाज ही भ्रष्टाचारी हो गया है... इसलिए भ्रष्टाचार हटाने के नारे भी अप्रासंगिक होकर मर चुके हैं... क्योंकि भ्रष्टाचार अब ऊपर से नहीं, नीचे से जाता है... क्योंकि भ्रष्ट जनता, भ्रष्ट नेता चुनती है... क्योंकि भ्रष्टतम वहीं हैं...

22/6/08

जिंदगी के बारे में

अपने ही आसपास किसी का उठ जाना अजीब कैफियत पैदा कर जाता है... बेशक वो आपसे सीधे जुड़ा न रहा हो... पता नहीं क्यों लगता है कि कुछ हिस्सा टूट गया है... लेकिन वो उतना ही होता है, जितना आपने उसके साथ सांझा किया होता है... और यही लगता है... मुझे लगता है कि हम लोगों में अपना निवेश करते हैं... अपने पलों का, अपने जीवन के अच्छे-बुरे लम्हों का... और किसी के उठ जाने के बाद ये बात सालती है कि अब शायद उन सांझा किए गए पलों को फिर से जीवित नहीं किया जा सकेगा... ये तो वो चीज है जिसे हम अपने बेहद आसपास महसूस करते हैं... इसे आप कोई भी नाम न दें...
एक खबर तो अपने एक करीबी रिश्तेदार की मौत की... दूसरी मिली एक अमेरिकी प्रोफेसर की जो पैंक्रिएटिक कैंसर की वजह से कार्नेगी मैलन स्कूल में अपना आखिरी लैक्चर दे रहा है... बेहद गर्मजोश और जीवन से भरा... दोनों ही बातें छू गईं... एक प्रोफेसर जो जानता है कि अब शायद ज्यादा वक्त नहीं है उसके पास और उसके दो बच्चों में से एक को उसकी कोई याद नहीं होगी... कि उसका बाप कभी इस दुनिया में रहा करता था... ५ साल के अपने एक बेटे के साथ वो अपनी यादों को मजबूत करने में जुटा है... लेकिन उसका दूसरा बेटा जो अभी इतना छोटा है कि उसकी मां ही उसे बता सकेगी कि उसके पापा कैसे लगा करते थे... अजीबोगरीब अहसास है...

19/6/08

पहेली की आवाज

एनिग्मा, किसे पुकारेंगे आप... पहेली को... या किसी ऐसे पेचदार नमूने को...जिसे समझने में आप के दिमाग के तंतु जवाब दे जाते हैं... या फिर कोई ऐसी चीज जिसे महसूस करने लायक संवेदनशीलता आपके पास नहीं है... हां, मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है कि एनिग्मा एक गूढ़ रहस्य है... और रहस्य वही जो मेरी समझ से परे है... एनिग्मा सिरीज के गीत भी कुछ ऐसे ही हैं... एनिग्मा तभी खत्म हो जाता है, जब आप उसका ये रहस्य समझ जाते हैं... मुझे इस बार एनिग्मा के कुछ गीत सुनने को मिले..... इनमें कुछ बेहद गूढ़ लगे... यानी मेरी समझ से परे... कुछ ऐसे थे... जिन्हें कोई भी समझ सकता है... एनिग्मा गीतों की श्रंखला मुझे काफी पहले से ही पहेली की तरह लगती रही है... सो इस बार भी ऐसा ही हुआ...
इसी श्रेणी का एक गीत है 'वॉयस ऑफ एनिग्मा'.... यानी पहेली की आवाज... है न अजीब सा नाम और अजीब ही गीत है... मेरे ख्याल से एनिग्मा को सुनते वक्त आप अपने दिमाग को कहीं और रख दें... सिर्फ सुनें.... न, न, सोचें नहीं... बिल्कुल भी... तब शायद आप उस आवाज को पकड़ पाएं... पहेली की आवाज को.... हालांकि इसके फैन बहुत से हैं... कुछ ऐसे भी हैं, जो सिर्फ इसलिए फैन हो जाते हैं क्योंकि उसके बहुत से फैन होते हैं... लेकिन कुछ सच में फैन होते हैं...

15/6/08

प्रेम की जरूरत?

आखिर प्रेम करने की जरूरत क्या है... दरअसल जानवर तो प्रेम करते नहीं... अगर आदमी भी जानवरों के ही विकासक्रम से आया है तो ये दिमाग का फितूर ही कहा जाएगा... वो दिमाग जो जानवरों के पास नहीं है... हम किसी न किसी वजह से जीना चाहते हैं... क्यों नहीं बेवजह जी पाते...क्यों नहीं हम सामान्य होकर जी पाते... जानवरों की तरह भोले, एकदम निरीह होकर... अगर आप ये कहते हैं कि आदमी के लिए निरीह होकर जीने के खतरे बहुत हैं तो जानवरों की दुनिया में भी कम नहीं... वहां मेरे ख्याल से ज्यादा खतरे हैं... इसलिए अगर हम जी रहे हैं तो हमें खतरों से खेलना आना चाहिए... और अगर हमारे पास दिमाग है तो हमें इसे सिर्फ खतरों से खेलने पर ही लगाना चाहिए... हमारी असुरक्षा को कॉम्बैट करने में खर्च होनी चाहिए हमारी बुद्धि... न कि प्रेम जैसी कृत्रिम चीजों में...
प्रेम करना बेहद कृत्रिम लगता है मुझे... क्योंकि ये भाव प्रकृति प्रदत्त नहीं है... ये हमें नैसर्गिक तौर पर नहीं मिला है... ये ओढ़ी हुई चादर है... अति उन्नत खुराफाती दिमागों की उपज... प्रेम को उपजाने में बेवजह शक्तियों का नाश हो रहा है... जिन्हें हम अपने जीवन को उन्नत बनाने में लगा सकते थे...

नदी

क्या नदी बहती है  या समय का है प्रवाह हममें से होकर  या नदी स्थिर है  पर हमारा मन  खिसक रहा है  क्या नदी और समय वहीं हैं  उस क्षैतिज रेखा पर...