27/5/09

Love+Marriage= Divorce, Arrange+Marriage= Chaos!!

शादी इंसान को पूरी तरह बदलने का माद्दा रखती है.. उसकी दिनचर्या ही नहीं, उसकी किस्मत भी...एक का ख्वाब तो दूसरे का डर, तीसरे के लिए नफरत और चौथे के लिए कारोबार और किसी के लिए शायद बेड़ी... 

कुछ भी हो, जिंदगी का सबसे मुश्किल वक्त.. अगर आप सही शख्स को चुनते हैं तो भी आपकी कामयाबी का फीसद बहुत ज्यादा नहीं रहने वाला..क्योंकि मिस्टर और मिस परफेक्ट इस दुनिया में नहीं होते..परियों की कहानियों की बात अलग है.. सार्त्र का सूत्र Other is Evil.. हम इस मौके पर याद भी नहीं करना चाहते.. लेकिन कुछ साल बाद ही ये सच समझ आ जाता है क्योंकि गहराई के साथ इसे आप महसूस करना शुरू करते हैं जब आपकी जिंदगी में कोई आ जाता है.. प्यार में शादी और मां-बाप की मंजूरी के बाद शादी.. दो रास्ते हैं ईविल अदर को जिंदगी में लाने के.. 

इससे लोग इत्तिफाक रखें या नहीं मगर प्यार और शादी एक दूसरे के उल्टे लफ्ज हैं.. मगर फिर भी Love Marriage होती हैं..जाहिर है इन दोनों का अजीबोगरीब घालमेल करेंगे तो उम्मीदों का पहाड़ भी साथ आएगा.. और उम्मीदें पूरी नहीं होंगी तो कोर्ट के रास्ते खुले ही हैं.. ज्यादातर तलाक ऐसे ही जोड़ों के नाम हैं जिन्होंने फूल जैसे नाजुक शब्द को बाकायदा बेड़ी की तरह पहनने की कोशिश की..

Arranged और मां-बाप की सलाह पर की गई शादी में लड़के या लड़की की इच्छा का कोई महत्व नहीं.. ये परिवारों का सामंती और रूढ़िवादी नजरिया है.. ये नजरिया मानता है कि जिनकी शादी की जा रही है वो ढोर-डंगर हैं और उनका व्यक्तित्व तब तक विकसित नहीं होगा जब तक कि वो इस व्यवस्था के तहत नहीं आ जाते.. हमारे जैसे एक पुरुष प्रधान समाज में इसका बड़ा खमियाजा भुगतती हैं लड़कियां..Arranged Marriage के side effects उनकी जिंदगी पर साफ दिखते हैं.. सीता और सावित्री के इस देश में लड़की की इच्छा का मतलब ही है कि वो चरित्रहीन है...इसलिए न उनसे पूछा जाता है और न इसकी जरूरत ही समझी जाती है... इसमें भी लड़के और उसके घरवालों के सामने लड़की को इस तरह पेश किया जाता है.. मानो वो बिकाऊ माल हो.. बस फर्क इतना होता है कि एक बार में सिर्फ एक ही ग्राहक मौजूद होता है.. और उसे ही convince करना है...वीटो का बटन लड़के और उसके माता पिता के हाथ ही होता है..लड़की को पूरी तरह से निहार कर और नाप-तोल परखकर वो रद्द कर सकते हैं.. 

सदियों से हिंदुस्तानी समाज का ये दस्तूर बदस्तूर चल रहा है.. और चूंकि हम मानते हैं कि दोहराने से बुराई अच्छाई में बदल जाती है इसलिए हमने इसे स्वीकार कर लिया है.. जबकि इससे आपत्तिजनक कोई बात हो ही नहीं सकती कि माता-पिता शादी का फैसला कर सकते हैं.. चाहे फिर इसके जो परिणाम हों..समय और मूल्यों के अंतर के लिहाज से ही नहीं..व्यक्तिवादी सोच के लिहाज से भी...ये एकदम लचर सोच है.. मां-बाप का ऐसे फैसलों में पड़ने का मतलब है कि उनका चुनाव पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता...पूरी तरह से अनजान घर में अर्धांगिनी या अर्धनारीश्वर बनकर प्रवेश करना एक सजा से कम नहीं.. और ऐसी शादियां अपनी कीमत भी चुकवाती हैं...दहेज के लिए हत्या के रूप में, परिवार के सदस्यों की बुरी नीयत का शिकार बनाकर या घर से निकाले जाने में.. या बेवजह छोड़े जाने तक.. मगर व्यवस्थित शादियों के समर्थक कहेंगे कि सफलता का प्रतिशत बहुत ज्यादा है.. ठीक है..लेकिन जो बेमन से शादियां ढो रहे होते हैं, क्या इन समर्थकों ने उनसे पूछा है... 

हिंदुस्तानी मां-बाप लव मैरिज को जब तक अरेंज में न बदल लें, चैन नहीं लेते.. वो बेटे-बेटी के बीच थर्ड पार्टी जरूर बनना चाहते हैं..यानी ये शादियां भी arranged होकर खत्म होती हैं..ये लड़के-लड़की के बीच mutual understanding है, जो इसलिए मंजूर हो जाता है क्योंकि दोनों को एक-दूसरे का साथ मिल रहा होता है वो भी अपने-अपने मां-बाप के साथ, उनकी कीमत पर नहीं.. प्रेम विवाह में शादी दूसरी ऐसी गलती है.. जिसके शब्द ही आपस में मेल नहीं खाते.. एक रूहानी संवाद तो दूसरा बेहद जमीनी और समाजी व्यवस्था..ये वो शादी है जिसमें अहम ही अहमियत रखता है.. बाकी चीजें गौण होती हैं.. और निभ जाएं तो वो गर्मजोशी नहीं रह सकती जिसकी वो उम्मीद करते थे..प्यार नाम की खुशबू उड़ चुकी होती है.. और पीछे बचते हैं मैं और तुम.. जाहिर है वो टकराएंगे भी.. दोनों अहम एक दिन खुद को अदालत में पाते हैं..

तो क्या शादी खुद में ही बेवकूफाना व्यवस्था है.. शायद..लेकिन फिलहाल इसका विकल्प भी नहीं.. तजुर्बे चल रहे हैं..शायद कोई नुस्खा कामयाब हो..

13/5/09

जिंदगी का आखिरी इम्तिहान बनाम नेचुरल सेलेक्शन

पापा कहते थे बड़ा नाम करेगा.. लेकिन वही बेटा अब खामोश है.. बेटी खामोश हो गई है हमेशा के लिए.. और जानते हैं पापा की तमन्ना क्यों पूरी नहीं होगी.. उन लोगों की वजह से जिनको न तो पापा जानते हैं और न वो बेटा.. जो अब कभी नहीं उठेगा..क्या दसवीं का रिजल्ट इतना घातक हो सकता है..इधर दसवीं के नतीजे आ रहे थे और उधर रीवा के संजय गांधी अस्पताल में एक के बाद एक बच्चे पहुंच रहे थे..सबकी एक ही दास्तां..सबकी एक ही कहानी...मध्य प्रदेश में इस साल 10वीं के रिजल्ट ने 6 बच्चों की जिंदगी छीन ली है..

इतने घातक इम्तिहान कि एक के बाद एक किशोर जिंदगियों को दुनिया से बेजार करके रख दें.. क्या इम्तिहान इतना खतरनाक हो सकता है कि मासूम के दिमाग को इस दुनिया के लिए नफरत से भर दे..हां, ये मुमकिन है.. बिल्कुल मुमकिन है.. क्योंकि अभी तक तो हमारा पैमाना परीक्षाएं ही रही हैं जो तय करती हैं कि हम कितने होशियार हैं.. हम कितने जहीन हैं.. कितने समझदार हैं.. और कितने इंटेलेक्चुअल हैं..इम्तिहान लेने वाला दिमाग भी खुद को बहुत इंटेलेक्चुअल इसीलिए महसूस करता है क्योंकि उसने इम्तिहान दिए हैं और पास किए हैं..जाहिर है उसके लिए एक और अकेला यही पैमाना है.. 

मुझे लगता है कि ये अकेडमिक आतंकवाद है.. और इम्तिहान लेने वाले, उनके आधार पर किसी भी व्यक्ति की जिंदगी को सफल-असफल करार देने वाले अकेडमिक आतंकवादी.. ये आतंकवादी आपके बच्चों के दिमाग को जहर से भर रहे हैं.. और चेतन तौर पर ये महसूस करा रहे हैं कि बगैर किसी परीक्षा को पास किए ये जिंदगी बेकार होगी.. ये बात आपको भी मंजूर है और आपने मन ही मन कबूल कर ली है..क्योंकि जैसे-तैसे आपने भी इम्तिहान तो पास किया ही था.. और अब बारी है आपके मासूमों की... 

नतीजे आए तो रीवा में दो, छतरपुर, दतिया, गुना औऱ राजगढ़ में कुछ बच्चों ने पाया कि वो फेल हो गए हैं.. और वो जिंदगी भी क्या जो फेल होकर, अपने मां-बाप और अकेडमिक आतंकवादियों की नजर में दोयम बनकर जीनी पड़े..(ये तर्जुमानी मेरी है..हो सकता है इन मासूमों ने इन्हीं शब्दों में न सोचा हो, लेकिन तकरीबन ऐसा ही सोचा होगा).. इन छह बच्चों ने खुदकुशी कर ली... 

स्नेहा डॉक्टर बनने का सपना पाल रही थी...सत्रह साल की स्नेहा रीवा के रेवांचल पब्लिक स्कूल में पढ़ती थी.. लेकिन डॉक्टर बनने का सपना तभी टूट गया जब उसने पाया कि वो दसवीं में फेल हो गई है..लगा कि ये तो बहुत बड़ा सितम है..उसने किसी तरह जहर हासिल किया और खा लिया..डॉक्टर के अधूरे सपने के साथ ही स्नेहा चली गई.. 
रविकांत चक्रधर हायर सेकण्डरी स्कूल में पढ़ता था.. उसने भी दसवीं की परीक्षा दी थी..वही परीक्षा जो उसके लिए मौत का संदेश लेकर आई थी..ज़हर खाकर उसने जान दे दी.. 
विष्णु ने दोबारा दसवीं का इम्तिहान दिया था..पिछली बार फेल होने पर इतनी लानत-मलामत हुई थी कि इस बार वो कोई चांस नहीं लेना चाहता था.. इस किशोर ने भी फाँसी लगा ली..लेकिन मां-बाप को वक्त पर पता चला और वो उसे लेकर अस्पताल पहुंच गए.. किस्मत से विष्णु बच गया.. 
लेकिन दतिया का रिंकेश खुशनसीब नहीं था...16 साल के रिंकेश को मौत का एक रास्ता दिखाई दिया..सामने से आती ट्रेन..जो उसे उसके सपनों के साथ रौंदकर निकल गई...चिरूला हाईस्कूल में पढ़ने वाला रिंकेश भी सदमे में था..वजह थी बिजली, जो परीक्षाओं से ऐन पहले गुल हो गई थी और तब आई जब रिंकेश की जिंदगी खत्म हो चुकी थी...
राजगढ़ ज़िले के खिलचीपुर में शिवचरण ने ज़हर खाया.. अपनी मां को वो ये कहकर चला गया कि 'छोटे भाई को पढ़ाना, मैं इस काबिल नहीं'.. 
गुना में राजकुमार ने पंखे से लटककर फांसी लगा ली..उसकी मेज पर इंटरनेट से निकाली गई उसकी दसवीं की मार्कशीट मिली.. 
छतरपुर में पूनम ने भी फांसी लगाकर जान दे दी.. किसी भी साइकिएट्रिस्ट ने ये नहीं कहा कि ये गलती अकेडमिक टैररिस्ट की है.. सबने इसके लिए मां-बाप की जिम्मेदारी तय कर दी..

ये कुछ नाम भर हैं और वो भी सिर्फ एक राज्य के..हर बार जब इम्तिहान होंगे..इस सूची में कुछ और नाम जुड़ जाएंगे..ये सिलसिला साल दर साल चलेगा, लेकिन क्या इसका मलाल होना चाहिए कि आपके बच्चे इम्तिहान में खरे नहीं उतरे..
जब तक इम्तिहान हैं, खुदकुशी होंगी, क्योंकि सभी पास नहीं होंगे..जो पास नहीं होंगे वो डार्विन के नेचुरल सेलेक्शन के नियम को चुनेंगे..जो बच जाएंगे, वो योद्धा कहलाएंगे..क्योंकि हम इम्तिहान इसलिए देते हैं कि हमें जीतना है..लेकिन शायद ये भी कहीं लिखा है कि कोई भी इम्तिहान जिंदगी का आखिरी इम्तिहान नहीं होता...

11/5/09

किसे चाहिए अखबार?

किसे चाहिए वो अखबार, जिसमें एक कमांड के जरिए खबरें सर्च न की जा सकें...
किसे चाहिए वो खबर जो आपके कंप्यूटर, मोबाइल और पामटॉप पर सेव न की जा सके..
किसे चाहिए वो खबर जिसे आप 21वीं सदी में भी किसी को भेजकर पढ़ा ही न सकें...
किसे चाहिए वो खबर जिस पर आप दूसरों के साथ राय-मश्विरा न कर सकें, बगैर कंटेंट की तर्जुमानी किए...
किसे चाहिए वो खबर, जिसे आप दूसरी खबरों के साथ नाप-तोल न कर सकें, लिंक न कर सकें...
किसे चाहिए वो अखबार जो सुबह ऑफिस जाने से पहले न पढ़ा जा सके और रात तक सड़ जाए..
किसे चाहिए वो अखबार जो आपको ध्वनि और दृश्य से दूर रखकर सिर्फ सोचने तक छोड़ दे...

ये बहस के कुछ बिंदु हैं जो शुरू हुई है और चल रही है...लेकिन न्यूजपेपरमैन का ही इससे सरोकार नहीं क्योंकि वो अपनी नौकरी से ज्यादा नहीं सोचता...(हालांकि अखबार का उपभोक्ता वो भी है).. मालिक को इसलिए नहीं कि अभी कोई सीधी चुनौती नहीं मिली है...

ये बहस टैक्नोलॉजी की नहीं है...अगर लोग ये सोचते हैं तो शायद गलत होगा...ये बहस है स्वाद की...बदले हुए जायके की...ये बहस है हमारे वक्त में अखबारों के लगातार जायके में रुकावट पैदा करने की...

देश में बड़े-बड़े कई अखबार हैं... हिंदी के भी और अंग्रेजी के भी.. लेकिन उनमें न तो ठीक से इंटरनेशनल कवरेज होता है (हिंदी में तकरीबन नहीं) और न पूरी तरह नेशनल (नेशनल में पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत भी शामिल है, केवल उत्तर नहीं, हिंदी में ये बिल्कुल नहीं)...सभी खुद को राष्ट्रीय कहने में जरा भी शर्म महसूस नहीं करते..जबकि ज्यादातर का फोकस लोकल है.. या महानगरीय.. ज्यादातर के फ्रंटपेज पर सबसे बड़ी और अहम खबरें एजेंसी की छपती हैं...उनके पास या तो रिपोर्टर्स नहीं हैं या फिर उनका फोकस नहीं है.. इन्वेस्टिगेशन के नाम पर सिटी के बेहद मामूली विभागीय घोटाले या फिर किसी से स्पांसर्ड खबर का प्रस्तुतिकरण...

तो क्यों न इनकी मौत होगी..सिर्फ सूचना पाने के लिए तो बहुत से और माध्यम और रास्ते हैं.. जो तकरीबन मुफ्त हैं.. एडवर्टीजमेंट के सस्ते और कारगर उपाय और माध्यम अभी एडवर्टाइजर्स को पता नहीं चले हैं, या बहुत नवजात हालत में हैं... जैसे रीयल इस्टेट, ऑटोमोटिव, एजूकेशन आदि के विज्ञापन धीरे धीरे ऑनलाइन हो रहे हैं.. और ये भी तय है कि अखबार केवल एडवर्टाइजर के लिए नहीं छप रहे.. तो किसके लिए छप रहे हैं.. इस सवाल का जवाब आगे...पहले उन बिंदुओं पर बात कर ली जाए जो शुरू में उठाए गए थे...

अखबारों को बचाने की कोशिश या उनके हक में हर आवाज दरअसल एक तरह का नॉस्टेल्जिया ही है.. जो हमारी पीढ़ी तक चल रहा है.. लेकिन हमारे बाद? 

पत्रकारिता चाहे अखबार में हो, लैपटॉप या डेस्कटॉप पर, ब्लैकबेरी पर या पॉडकास्ट के बतौर या फिर किंडल (बुक रीडर) पर...हर जगह उसे साबित करना ही होता है..कि वो जनता की आवाज के हक में खड़ी है.. और स्टेट का विकल्प दे रही है... लेकिन फिर अखबार ही क्यों? 

यकीनन कंटेंट अपने माध्यम के साथ बदल जाता है...चाहे वो घटिया ढंग से बदले या बेहतर से.. हम खबर के रूपांतरण के दौर में जी रहे हैं.. शायद कल न तो अखबार होगा और न टेलीविजन.. 
और ये अखबार इस देश में आज अगर बिक रहे हैं तो उनकी वजह से जिनके लिए वो छापे ही नहीं जा रहे...शायद 

1/5/09

23 साल की रखैल की डायरी-2

(यह कहानी मुझे www.yourtango.com पर मिली.. लेखिका हैं एमिली रोजेन..मेरा इसमें कुछ नहीं..सिर्फ अनुवाद.. दूसरा और अंतिम भाग)

'ईट, प्रे, लव' नाम की किताब में जीवनसाथी का जिक्र कुछ यूं किया गया है - 'ऐसा शख्स जो आपको उस चीज के बारे में बताता है जो आपको पीछे खींचती है..जो आपको खुद पर ध्यान देना सिखाता है ताकि आप अपनी जिंदगी में बदलाव ला सकें.. जो आपकी दीवारों को गिरा देता है और चौंकाकर आपको जगा देता है..और जो आपकी जिंदगी में इसलिए आता है ताकि वो आपको अपनी जिंदगी के दूसरे पक्ष से रूबरू करा सकें' 

मैं सोचा करती थी कि किसी को धोखा देना शायद सबसे बड़ा गुनाह होता है..और अपने वायदे के बाद झूठा बन जाना मानो धोखाधड़ी की इंतहा है.. मेरे ख्याल में शादी एक रोमांटिक ख्याल था जो सच्चे प्यार के चारों तरफ बुना जाता है.. न कि व्यभिचार के चारों तरफ.. मैंने यह भी देखा था कि फिल्मों में रखैलों के साथ क्या होता है.. लेकिन अब मैं इसे दूसरे ढंग से देखती हूं.. 

ये दरअसल खुदगर्जी से भरी प्रतिबद्धता है ताकि आप किसी असुविधाजनक स्थिति को जायज ठहरा सकें... वह जगह जहां पहुंचकर आप खुद को पूरी तरह उखड़ा हुआ पाते हैं.. जो आपको आपकी जरूरतों का सामना करने को मजबूर करती है.. और आपको आपके एक कदम और करीब ले जाती है... हमारे अफेयर ने मुझे मजबूर किया कि मैं उसके करीब होकर अपनी सारी दीवारें गिरा दूं और उसके लिए गहरी चाहत महसूस करूं.. और पहली बार किसी के साथ होकर खुद को पा सकूं..मुझे महसूस होता है कि अब मैं दूसरों के यह बताने के काबिल हो गई हूं कि मुझे क्या चाहिए..और उसे भी इससे खुशी मिलती है.. इससे पहले मैंने खुद ही अपनी जिंदगी में सब कुछ करने का फैसला किया था..लेकिन अब वह मुझे दिखा रहा है कि कैसे अपने फैसलों में दूसरों की मदद ली जा सकती है.. 

यकीनन मुश्किलें भी आईं हैं.. जब मैं उसकी मुहब्बत और नफरत के बीच झूलती-उतराती हूं तो कभी उसे मंजूर करती हूं और कभी खारिज करती हूं.. लेकिन ज्यादातर बार मैंने ऐसे जज्बात को पसंद ही किया है.. हम दोनों ने एक दूसरे के लिए अपने जुनून की हदें पार कर दी हैं.. और अब मैं इससे कम पर सोचने के लिए तैयार नहीं हूं.. 

ये संभावना कि मैं ऐसी शख्स हूं जिसे वह पसंद कर सकता है, मुझे अंदर तक हिला देती है...वह सचमुच ताज्जुब में डाल देता है..मैं अभी तक तय नहीं कर सकी हूं कि मैं सचमुच उसके साथ जिंदगी बिताने या परिवार जमाने के लिए तैयार भी हूं या नहीं.. यहां तक कि मैं ये भी नहीं जानती हम दोनों उसकी बीवी के बिना कैसे जिंदगी बिताएंगे.. इस तरह की जिंदगी जीते हुए कल हम कैसे पति-पत्नी होंगे.. लेकिन एक बात तय है कि मैं उसे किसी भी हालत में छोड़ने के ख्याल से ही डर जाती हूं... 

भविष्य में क्या और कैसा होगा, ये कई बातों पर निर्भर करता है.. उसका अपनी बीवी से संबंध, दोनों कब तक इस तरह अपनी शादी को आगे ले जा सकते हैं...परिवार के लिए उसकी इच्छा बनाम उसका अपनी बीवी के साथ फिर से रहने का फैसला.. और मैं किस हद तक सहन कर सकती हूं और उससे क्या चाहती हूं और वह मुझसे क्या चाहता है.. 

तो क्या मैं अपराधबोध से ग्रस्त हूं? क्या मैं उसका घर तोड़ने के लिए जिम्मेदार हूं? हां, ये सही है..लेकिन अगर कुछ सालों बाद वह खुश हो सकता है और उसे एक परिवार मिल जाता है, मेरे साथ या मेरे बगैर, और मैं बाकी लोगों को अपनी भावनाओं की दीवार के पीछे धकेल पाई..तो शायद हमारी ये मुलाकात सही साबित होगी.. खासकर तब जब हम दोनों को अंत में एक दूसरे का साथ मिल जाए...

23 साल की रखैल की डायरी-1

(यह कहानी मुझे www.yourtango.com पर मिली.. लेखिका हैं एमिली रोजेन..मेरा इसमें कुछ नहीं..सिर्फ अनुवाद)

मैं उसके ऑफिस में थी, अपने घुटनों पर गलीचे की रगड़ से पैदा हुई जलन संभाले हुए..क्योंकि उसने खुद मेरे ऊपर आकर मुझे बुरी तरह आगे-पीछे धकेला था.. बुकशेल्फ और उसकी मेज पर मैं उसकी पत्नी की फोटो को मुस्कराते और हंसते हुए देख सकती थी..जब मैंने उन्हें उस शाम पहली बार देखा तो पहली बार भाग जाने का मन हुआ था.. लेकिन इसके बजाय मैं रुक गई..मैं जो अपनी शख्सियत बनते देख रही थी, उस पर मुझे उल्टी भी आ रही थी.. वह इतना मोहक था और उसकी मौजूदगी दिलोदिमाग पर इस कदर छा जाती थी कि इस बात ने मेरे कदम रोक लिए..पूरी ईमानदारी से कहूं तो मुझे अपनी इच्छाशक्ति पर इतना अभिमान कभी नहीं रहा था और मुझे वह उसके प्यार में बंधने से रोक भी नहीं सकी..

हम पहली बार एक बिजनेस कांफ्रेंस में मिले थे..तब मैं 23 की थी और कॉलेज से निकली ही थी.. वो बिल्कुल मेरे पास बैठा मुस्करा रहा था.. नजर ऐसी कि मेरे बाएं गाल पर जलन महसूस होने लगी.. काले बाल, बकरे जैसी दाढ़ी और चेहरे के एक तरफ निशान.. मैंने अपनी स्थिति कुछ बदली ताकि इस अनजान से शख्स के साथ यूं एकदम जिस्मानी हालात का सामना न करना पड़े..पर हमारे जिस्मों की भाषा में जुंबिश शुरू हो चुकी थी..

वह शुरू से ही जिद्दी था और ये गुण मुझे उसमें काफी सेक्सी लगा था.. उसने पूरी बेतकल्लुफी के साथ मेरे ही बॉस के सामने मुझे ड्रिंक के लिए आमंत्रित किया... मुझे लगा था कि शायद वो अभी तक सिंगल ही था क्योंकि उसने अपनी पिछली पत्नी का जिक्र किया था और फिर मैं ये जानकर काफी निराश हुई जब उसने बताया कि वह दूसरी बार शादी कर चुका था..ड्रिंक के बाद उसने पूछा कि आज रात हम किस होटल में चल रहे हैं... मुझे यह बेहद हास्यास्पद लगा.. 'तुमसे मिलकर बेहद खुशी हुई'..मैंने उससे कहा.. इसके बाद उसने मुझे ड्रॉप कर दिया...

कुछ ही दिन बाद उसने फ्लर्ट करना शुरू कर दिया.. वो लगातार मेरे बॉस को ईमेल भेजता और उसकी एक कॉपी मुझे कर देता... अगर मैं कहूं कि मैं उसके अगले कदम का बेकरारी से इंतजार नहीं कर रही थी तो ये बात झूठ ही होगी.. जब उसने दोबारा मुझे ड्रिंक के लिए कहा तो मेरा मन हुआ कि न कर दूं.. लेकिन मुझे खुद के सही होने का भरोसा था कि मैं जो करूंगी ठीक ही होगा..मैंने सोचा चूंकि मैं खुद कभी किसी को धोखा नहीं देती तो उसके साथ एक ड्रिंक लेने में हर्ज ही क्या है और वह इतने वक्त से मेरे चारों तरफ चक्कर जो काट रहा था.. लेकिन भीतर ही भीतर कहीं मुझे पता था कि मेरे लिए मुसीबत खड़ी होने वाली थी..एक शादीशुदा शख्स के साथ डेटिंग के ख्याल से ही मुझे अपनी पिछली सभी डेट वाली रातें बच्चों का खेल नजर आने लगी थीं..

मुझे काफी राहत मिली जब मैंने उसे रेस्टोरेंट में आते देखा.. कांफ्रेंस का तनाव कहीं गायब हो चुका था.. मैंने सोचा - 'वह शायद ज्यादा देर तक टिकेगा'.. लेकिन एक, दो और तीन ड्रिंक और इसके बाद सब ठहर गया...

हमारी कैब हमें घर की तरफ लेकर उड़ चली..सड़कों की रोशनी धुंधली पड़ती जा रही थी.. रफ्तार अमूमन से ज्यादा तेज लग रही थी.. हम एक दूसरे को काफी देर तक चूमते रहे..इस हद तक कि होटल के फेंसी लाउंज के बाहर जा गिरे..और जब उसने मेरी पेंट उतारकर हाथ अंदर डाला तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि मैं इतनी कमजोर थी..वह इसे नहीं जानता लेकिन मैं उस रात अपने बाथरूम में गिरकर रोती रही थी..मुझे उसके घर मौजूद उसकी पत्नी का ख्याल आया..और यह भी कि कैसे मैं खुद पर काबू न रख सकी.. 'क्या मैं इस तरह की शख्स हूं जो एक शादीशुदा के साथ डेटिंग कर रही थी'..मुझे काफी ताज्जुब हुआ.. मैं इतना अपराध बोध से भर गई, इतना अपराध बोध से भर गई कि मुझे उसमें मजा आने लगा..

इस रात के बाद मैंने उसे लिखा कि ऐसा अब कभी नहीं होगा.. 'अगर तुम ऐसा चाहती हो' उसने लिखा 'तो मुझे बताओ कि क्या सचमुच तुम्हारा ख्याल बदल गया है'.. मैं 'नहीं' नहीं कहना चाहती थी लेकिन मैं जानती थी कि मुझे एक शादीशुदा शख्स को डेट नहीं करना चाहिए.. पर उसे जल्द ही पता चल गया कि आखिर मैं कैसे और क्या सोच रही थी..अब सारा दोष मेरे मत्थे था.. मुझे कम से कम यही लगता था.. एक लोकल जैज क्लब में हमारी अगली डेट के बाद मैं उसके साथ उसके घर गई..

उसके बिस्तर पर, उसके कपड़ों में घुसते ही मुझे लगा कि वो मुझ पर ही नजर गड़ाए है.. मद्धम रोशनी में वह काफी खूबसूरत लग रहा था.. मैं जानती थी कि वो मुझसे बड़ा था लेकिन ये नहीं जानती थी कि कितना.. उसके बिस्तर पर मैंने उसकी उम्र पूछी.. '45'.. उसने काफी ध्यान से सोचते हुए जवाब दिया.. जैसे ही वह मेरे ऊपर झुका, मुझे खुद से दोगुनी उम्र के शख्स के साथ होने का रोमांच महसूस होने लगा..

अगली सुबह दिन चढ़ने पर मैं उठी.. मैंने देखा कि उसकी शादी की अंगूठी उस उंगली में थी जिसने उसके (उसकी बीवी के) बिस्तर पर मेरे बदन को छुआ था..भूरे रंग के ऊंची हील के जूते जो मै हॉल के रास्ते में छोड़ आई थी, अब बेडरूम में थे.. क्या उसे चिंता सता रही थी कि वो जल्द ही वापस लौट सकती थी और उन्हें देख सकती थी.. दीवाल पर मौजूद उनकी शादी के फोटोग्राफ ने मुझे तुरंत याद दिलाई कि कुछ देर पहले क्या हुआ था.. मैं कभी ये नहीं जानना चाहती थी कि वह देखने में कैसी लगती होगी..मैंने इस बात से अपना ध्यान हटाने की कोशिश की कि अगर मैं उसके बारे में जरा भी जान गई तो शायद उसकी तरफदार हो जाऊंगी.. मैंने कपड़े पहने और पूरी नफरत और उसके पति के साथ घर से निकल गई..

तीन महीने बीत गए.. साफ था कि उसकी बीवी के बारे में जानकारियां भी मुझे उसके पति से मिलने से नहीं रोक सकती थीं.. हफ्ते में एक बार मुलाकात से तसल्ली नहीं मिलती थी.. 'हेलो' और 'गुडबाय' के फोन घंटे-घंटे भर की बातचीत में तब्दील हो जाया करते.. छोटे-छोटे एसएमएस अब 'आय मिस यू' और 'आय वांट यू' से बदलकर 'आय लव यू' में बदल गए.. मुझे चिंता होने लगी कि हम कहां आ पहुंचे थे और कहां जा रहे थे..

उसने मुझे बताया था कि कुछ ऐसी चीजें थीं जो वह (बीवी) उसे नहीं दे सकती थी.. 'मुझे केवल बच्चे नहीं चाहिए, मुझे उनकी जरूरत है'.. उसने रेड वाइन को पीते हुए एक बातचीत के दौरान यह बात कही थी.. जबकि उसकी बीवी बच्चे नहीं चाहती थी.. उसने मुझे बताया वह मेरी वजह से इस नतीजे पर पहुंचा था.. मुझे लगा कि शायद शादी से पहले उन्होंने कभी भी एक परिवार बनाने के बारे में नहीं सोचा था.. न उस पर कभी बात की थी.. लेकिन मैं उसकी बीवी के बारे में खामोश रही.. मैं इस बारे में फैसला देने वाली कौन थी..

मेरे सामने यह एकदम साफ था कि उसके ये ख्यालात उसके अपनी पत्नी से रिश्तों को तार-तार कर रहे थे.. मुझे ताज्जुब हुआ कि मेरी तरफ उसका खिंचाव क्या उसकी इस स्थिति से ध्यान बंटाने की कोशिश भर थी या मैं उसकी जिंदगी में उसे इसी सच का सामना कराने के लिए आई थी..

आखिर उन दोनों ने खुद को शादी के बंधनों से मुक्त करने का फैसला ले लिया था..दोनों ने तय किया था कि अगर उनमें से किसी का अफेयर होगा तो वो दूसरे को नहीं बताएगा.. जहां तक मैं जानती हूं, वह मेरे बारे में नहीं जानती थी.. लेकिन उसके पति को इस बात की कतई चिंता नहीं थी कि उसे मेरा पता चले.. ये ऐसा ही था कि वो दोनों साथ तो रहते थे लेकिन अपनी-अपनी जिंदगियों में मुब्तिला..

8 महीने बीत चुके हैं.. एक दिन उसने मुझे मैसेज किया और कहा - 'हम बीत रही शाम के सितारे जैसे हैं, जो एक खतरनाक रिश्ते से उबर पाने में नाकाम हैं '.. हमारे भावनात्मक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और सेक्सुअल रिश्ते से इनकार नहीं किया जा सकता.. ये इतना ताकतवर रिश्ता है कि बेशक वो शादीशुदा है पर मुझे किसी दूसरे शख्स का साथ पसंद नहीं.. दूसरे सभी इस मामले में कमतर लगते हैं.. (क्रमश:)

27/4/09

गूगल मार रहा है अखबारों को

अखबार संकट में हैं...उनके रेट नीचे गिर रहे  हैं और ज्यादा से ज्यादा लोग इंटरनेट की तरफ बढ़ रहे हैं... और इसका दोष है गूगल  के माथे... वो मुफ्त में ऐसा कंटेंट दे रहा है, जिसके लिए अब तक अखबार और  मैग्जीन पैसा वसूलते थे... तो क्या गूगल अखबारों को खत्म करने में जुटा है...

दरअसल, अगर आप साफ तौर पर देखें तो ये गूगल की  गलती नहीं...बल्कि ये गलती है अखबारों और मैग्जीन की, जो खुद को वक्त के साथ ढाल पाने में नाकाम रहे हैं...देखा जाए तो गूगल अखबारों की मदद कर रहा है...मुफ्त में ढेर सारा कंटेंट मुहैया कराकर... जिसके लिए अखबार को कोई पैसा नहीं देना  पड़ता...गूगल न्यूज समेत ढेरों वेबसाइट्स पर मौजूद खबरें और एडऑन जानकारियां  अखबारों को और ज्यादा समृद्ध बना रही हैं... 

दूसरी बात गूगल खबरें चुराता नहीं, बल्कि वो  उनमें से बेहतरीन को छांटता है और उनके लिंक उठाकर लोगों तक पहुंचा देता है... गूगल न्यूज के पेज पर कोई विज्ञापन भी नहीं होता.. अब अगर ऐसे में किसी अखबार के रेट गिर रहे हैं और विज्ञापनदाता उससे हाथ खींच रहे हैं तो गलती किसकी है… गलती अखबार की है…

तरीका है… अखबार के इलेक्ट्रॉनिक वर्शन को मानक बनाकर प्रिंटेड वर्शन को महंगा और स्तरीय बनाना… इस बात को आप भूल जाएं कि लोगों को अखबारी कागज की खुशबू और उसका अहसास अच्छा लगता है इसलिए वो इसे खरीद रहे हैं… वो दरअसल खबर पाने के आसान से आसान तरीके की तलाश में हैं और जैसे ही इंटरनेट ने उन्हें ये मुहैया कराया वो वहां चले गए…

इसलिए अखबार के इलेक्ट्रॉनिक वर्शन को जल्द से जल्द ईमेल के जरिए अपने सब्सक्राइबर के मेलबॉक्स में पहुंचाना जरूरी है… और इसमें भी आसान तरीका इख्तियार करना जरूरी होगा..केवल दिन की खबरें देने से हटकर ऐसी खबरें देनी होंगी जो रियलटाइम हैं… जिनकी अहमियत इंसान के दिन और उसकी सोच पर असर डालती हो…लेकिन ब्रेकिंग खबरों के साथ साथ न्यूज डाइजेस्ट भी जरूरी होंगी… 

गूगल से लड़ने के बजाय उससे फायदा उठाने का तरीका अपनाना होगा… उसके पास ऐसे ढेरों उपकरण हैं जो अखबार की मदद कर सकते हैं…तो एक अखबार को क्या गूगल से लड़ना चाहिए या गूगल की  मदद लेने का तरीका ढूंढना चाहिए…

13/4/09

समंदर में दफन हिंदुस्तान का अतीत!

अटलांटिक की गोद में चिरनिद्रा में लीन उस जहाज पर कुछ लिखा है. समंदर में समाने के बाद भी वो लिखावट एक पूरी सदी नहीं मिटा सकी.ये इबारत है उन डेढ़ हजार जिंदगियों की, जो टाइटेनिक के साथ फना हो गईं. बहुत कम लोग जानते हैं कि इनमें कुछ जिंदगी ऐसी भी थीं जिनकी कहानी हिंदुस्तान की मिट्टी से जुड़ी थी.

दुनिया का सबसे बड़ा और ताकतवर स्टीमशिप टाइटेनिक 10 अप्रैल 1912 को साउथहैंपटन से न्यूयॉर्क के लिए निकल रहा था. मैरी डनबार लखनऊ से आ रही थीं और अपने बेटे फ्रांसिस से मिलने साउथ डकोटा जा रही थीं. मैरी तब 56 साल की थीं. जब उन्होंने टाइटेनिक में कदम रखा तो किसी को भी इल्म न था कि वो अब
 कभी वापस लौटने वाला नहीं था. ब्रिस्टल में पैदा हुईं मैरी डनबार के पति
 रैडरिक रुफोर्ड हैवलेट की मौत हो चुकी थी. भारत से उनका एक खास रिश्ता था. उनका एक लड़का रोजगार के साथ भारत आ गया था. लखनऊ को उसने अपना घर बनाया था. मैरी भी उसी के साथ लखनऊ में रह रही थीं. 1912 में मैरी डनबार ने अमेरिका की यात्रा शुरू की. भारत से वह पहले इंग्लैंड पहुंचीं. हैंपशायर इलाके में उनकी बेटी ई विलियर्स रहती थी. उससे मिलकर मैरी साउथहैंपटन गईं और वहां से टाइटेनिक में सेकेंड क्लास का टिकट खरीदा. यहीं से टाइटेनिक अपनी पहली और आखिरी यात्रा पर निकल रहा था. मैरी के टिकट का नंबर था 248706 और उन्होंने इसकी कीमत चुकाई थी 16 पॉन्ड. टाइटेनिक पर उनकी यात्रा मानो एक सपने के पूरा होने जैसी थी. लेकिन जल्द ही ये सपना टूटने वाला था. जहाज के डूबते वक्त कैप्टेन और क्रियु ने महिलाओं और बच्चों को पहले लाइफबोटों में बैठाया था. हैवलेट डेक पर मौजूद थीं और उन्हें भी लाइफबोट नंबर 13 में बैठा दिया गया. कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि उनके सामने ही दुनिया का सबसे खूबसूरत जहाज समंदर में समा रहा था. खौफजदा हैवलेट और लाइफबोट पर मौजूद बाकी यात्रियों को चार घंटे बाद मौके पर पहुंचे कार्पेथिया जहाज ने बचाया. कार्पेथिया पर पहुंचते ही उन्होंने 18 अप्रैल को लंदन में अपने घर टेलीग्राम भेजा - सुरक्षित कार्पेथिया पर. डनबार की किस्मत अच्छी थी, उन्हें अपने बेटे से मिलना बाकी था. फ्रांसिस से मिलकर वह फिर लौटीं और हमेशा के लिए भारत चली गईं. लेकिन टाइटेनिक जैसे खतरनाक हादसे में सुरक्षित बच गईं मैरी डनबार को सैप्टीसीमिया हो गया था. पांच साल बाद 9 मई 1917 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उनके बेटे ने मां की इच्छा के तहत उन्हें 10 मई को नैनीताल में दफना दिया. कालाधुंगी रोड पर हिमालय के चरणों में वह आज भी आराम कर रही हैं. 

14-15 अप्रैल 1912 की सर्द रात को टाइटेनिक हादसे में बची मैरी डनबार की तरह बाकी डेढ़ हजार लोग खुशकिस्मत नहीं थे जो अपनी जिंदगी को आगे जी पाते. ऐसी ही एक 
बदकिस्मत थी ऐनी क्लैमर फंक. ऐनी पैदा तो हुई थी पेंसिलवेनिया में, पर उसकी कर्मभूमि थी भारत. माता-पिता मैनोनाइट थे और 18वीं सदी में जर्मनी में बस गए थे. फंक ने मैसाचुसेट्स में मैनोनाइट ट्रेनिंग स्कूल में पढ़ाई की थी. उसका एक ही सपना था मिशनरी बनकर दुनिया की सैर. ये सपना पूरा हुआ जब 1906 में उसे भारत भेजा गया. वो भारत में पहली मैनोनाइट मिशनरी महिला थी. भारत पहुंचकर उसने काम करने के लिए जगह चुनी जांजगीर, आज के छत्तीसगढ़ का एक जिला. यही जगह उसकी जिंदगी के बचे हुए सालों की कर्मभूमि होने वाली थी. जुलाई 1907 में उसने जांजगीर के एक घर के एक कमरे में लड़कियों का स्कूल खोला. शुरुआती दिनों में सिर्फ 17 बच्चियां ही पढ़ने जाती थीं. फंक ने बच्चों से बात करने के लिए धीरे-धीरे हिंदी सीखी. अचानक 1912 में उसे पेंसिलवेनिया से एक टेलीग्राम मिला - जल्द जाओ, मां बहुत बीमार है. मां से मिलने की तड़प में उसने तुरंत जांजगीर से बॉम्बे के लिए ट्रेन पकड़ी और वहां से पर्शियन जहाज के जरिए फ्रांस में मार्सेल पहुंची. यहां से वो ट्रेन और बोट के जरिए इंग्लैंड आई. लिवरपूल पहुंचकर उसे पता चला कि कोयला कामगारों ने हड़ताल कर रखी थी और उसका जहाज हैवरफोर्ड आगे नहीं बढ़ सकता था. थॉमस कुक एंड संस के दफ्तर में उसे कहा गया कि वो चाहे तो कुछ और रुपए चुकाकर टाइटेनिक की टिकट ले सकती थी. ऐनी फंक ने तुरंत टाइटेनिक का सेकेंड क्लास का टिकट खरीद लिया. उसके टिकट का नंबर था 237671 और इसके लिए उसने कीमत चुकाई थी 13 पॉन्ड. 10 अप्रैल 1912 को साउथहैंपटन से उसने टाइटेनिक पर कदम रखा. जहाज पर ही 12 अप्रैल को उसकी 38वीं सालगिरह थी, लेकिन जल्द ही अभिशप्त रात आनी थी, जिसके बाद कोई अगला जन्मदिन नहीं था. 

14-15 अप्रैल की रात ऐनी फंक अपने केबिन में सोई थी कि उसे स्टीवार्ड ने आकर जगाया और तैयार होकर डेक पर पहुंचने को कहा. ऐनी जैसे ही एक लाइफबोट में बैठने लगी, एक महिला पीछे से चिल्लाती हुई आई और उसे धकेलकर बोली - मेरे बच्चे, मेरे बच्चे. अब आखिरी सीट भी भर चुकी थी. ऐनी ने खुशी-खुशी वो सीट उस महिला के लिए छोड़ दी. कुछ ही देर में टाइटेनिक अपने साथ अभागों को समंदर की अतल गहराइयों में लेकर चला गया. इन्हीं में ऐनी फंक भी थी. उसकी लाश कभी नहीं मिली. हादसे की खबर से घबराया ऐनी का भाई होरेस फंक न्यूयॉर्क पहुंचा और अपनी बहन के बारे में खोज-खबर पाने की कोशिश की. भारत जाने के बाद पांच साल में पहली बार ऐनी किसी यात्रा पर निकली थी. होरेस अभी भी सोचता था कि उसकी बहन टाइटेनिक पर नहीं थी. लेकिन भाई गलत था. उसकी बहन तो कब की समुद्री कब्रगाह में पहुंच चुकी थी. ऐनी फंक की याद में छत्तीसगढ़ में आज भी वो स्कूल चल रहा है. अब उसका नाम है ऐनी फंक मैमोरियल स्कूल. पेंसिलवेनिया में भी ऐनी की याद में हैयरफोर्ड मैनोनाइट चर्च सिमिट्री में एक यादगार मौजूद है. 

मैरी डनबार और ऐनी फंक के अलावा एक साल का बच्चा रिचर्ड एफ बेकर भी टाइटेनिक पर था. कोडइकनाल में पैदा हुआ रिचर्ड अपनी मां नैली और बहनों मैरियन और रूथ के साथ अमेरिका यात्रा पर था. रिचर्ड को उसकी मां और बहन मैरियन के साथ लाइफबोट नंबर 11 के जरिए बचाया गया. भारत छोड़ते वक्त रिचर्ड का परिवार आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर में अपने पिता एलेन ओलिवर बेकर के साथ रहता था, जो गुंटूर में मिशनरी थे. इसी गुंटूर में ही टाइटेनिक का एक और यात्री भी पैदा हुआ था. वो थी रूथ बेकर ब्लैंचार्ड. हादसे के वक्त वो अपने नन्हे भाई रिचर्ड और मां से अलग हो गई थी. उसे भी कार्पेथिया जहाज ने बचा लिया था. जे फ्रैंक कार्नेस उर्फ क्लेयर बैनेट 22 साल की एक नई नवेली दुल्हन थी जो भारत से अमेरिका जा रही थी. शादी के बाद वह पति के साथ भारत आ गई थी. साउथहैंपटन से वो मेरी कोरे के साथ टाइटेनिक में सवार हुई थी. टिकट का नंबर था 13534 और उसने अमेरिका पहुंचने के लिए 21 पॉन्ड कीमत अदा की थी. क्लेयर ने 14 अप्रैल की दोपहर जहाज की सेकेंड क्लास लाइब्रेरी में गुजारी थी. कार्नेस को पता नहीं था कि कुछ दिन पहले चेचक से उनके पति की मौत हो चुकी थी. पति को भी अपने आखिरी वक्त तक ये गुमान न था कि वो अपनी पत्नी से हमेशा के लिए अलग हो रहा था. टाइटेनिक के साथ ही कार्नेस भी समंदर में समा गई. उसकी भी लाश नहीं मिल सकी. कार्नेस की सहेली मेरी पर्सी कोरे भी अपर बर्मा (तब भारत में) से अमेरिका जा रही थी, जहां उसका पति इंग्लिश ऑयल कंपनी में सुपरिंटेंडेंट था. मेरी की भी ये आखिरी यात्रा थी. दोनों सहेलियां एकसाथ इस दुनिया से रुखसत हुईं.

24 साल का हैनरी रैलेंड डायर भी टाइटेनिक का वो अभागा यात्री था जो अपने आखिरी सफर पर निकला था. डायर झांसी में पैदा हुआ था और भारत में ही पढ़ा-लिखा था. इसके बाद वो इंग्लैंड चला गया था. पेशे से इंजीनियर रैलेंड डायर व्हाइट स्टार लाइन कंपनी के साथ साउथहैंपटन में ही तैनात था. ये वही कंपनी थी जिसने टाइटेनिक जैसे ऐतिहासिक ख्याति के जहाज को तैयार किया था. हैनरी टाइटेनिक पर अपनी ड्यूटी देते हुए इस संसार से चला गया.

लंकाशायर, इंग्लैंड का रहने वाला चार्ल्स हर्बर्ट लाइटॉलर टाइटेनिक की शायद सबसे विवादास्पद शख्सियतों में से एक है. जो किस्मत से टाइटेनिक हादसे में बच गया. बाद में चली जांच के दौरान उसकी गवाही अहम साबित हुई. उसी ने हादसे के दौरान पूरे क्रियु की भूमिका का खुलासा किया था. 
खास बात ये है कि चार्ल्स लाइटॉलर ने कलकत्ता से कार्गो पर काम करने के लिए जरूरी सेकेंड मेट सर्टिफिकेट पास किया था. 1900 में उसने व्हाइट स्टार लाइन कंपनी में नौकरी पाई और टाइटेनिक की ऐतिहासिक यात्रा से दो हफ्ते पहले उस पर कदम रखा. 14-15 अप्रैल की काली रात घटी घटनाओं के इस साक्षी की गवाही ने अंतिम क्षणों में जहाज के कैप्टेन की भूमिका का खुलासा किया था. 

इनके अलावा टाइटेनिक पर सवार कई यात्री ऐसे भी थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश आर्मी के लिए काम किया था. टाइटेनिक की आखिरी प्रामाणिक फोटो खींचने वाला मॉरोग भी भारत आया था. टाइटेनिक से जुड़े 29 लोग ऐसे थे, जिनका भारत से कोई न कोई रिश्ता रहा. कुछ ने यहां जन्म लिया तो कुछ ने भारत को कर्मभूमि बनाया और कुछ इसी मिट्टी में समा गए. कुछ इतने अभागे थे कि भारत में पैदा होने के बाद मौत उन्हें टाइटेनिक के साथ समंदर में खींच ले गई.

12/4/09

मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया...

बूट अहमद ने बनाया, मैंने मज़मून लिखा
मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया 

जी हां, ये जूता चलाने का वक्त है...क्योंकि कलम बेदम है...बेजार है...जर्नेलिज्म का वक्त है क्योंकि जर्नलिज्म थक गया है...टूट गया है... और देखिए न, आपमें और हममें अब मजमून पढ़ने और लिखने का माद्दा भी कहां है, इसलिए जूता चलाइए पूरी तरह बेखौफ होकर.. हां एक बात का ख्याल जरूर रखें कि आपका जूता चुनाव के मौसम में ही चले...क्योंकि इन दिनों इस देश के सफेदपोश सबसे कमजोर होते हैं...उनकी संवेदनशीलता अपने उफान पर होती है...बेहद सहनशील...बिल्कुल प्रसूता गाय की तरह...वो सींग नहीं चला सकते इस दौरान...इसलिए उनसे डरने-घबराने की जरूरत नहीं... हां, एक बात का ख्याल रहे...मतदान के आखिरी दिन शाम तक ही आप जूता चला पाएंगे...क्योंकि इसके बाद आपका जूता आप पर ही उल्टा पड़ सकता है... 

अगर आप खीझे हुए हैं...और धैर्य ने साथ छोड़ दिया है...अगर 25 साल तक आप देश के कानून को बदमाशों के हाथों की कठपुतली बने रहते देखने के बाद नफरत करने लगे हैं...अगर न्यायपालिका और कार्यपालिका से आप ऊब गए हैं...तो जनाब यही वक्त है, चला दें जूता...क्योंकि क्या पता आपका जूता भी जरनैल के जूते की तरह निशाने पर बैठे... 

आप कह रहे हैं कि जरनैल ने जो संदेश दिया है वो कई पत्रकार अपने पूरे कैरियर में नहीं दे पाते...ठीक ही कह रहे हैं आप...क्योंकि जिंदगी भर कलम के सिपाही के रूप में आप बहुरुपिए ही थे...आपको तो बस एक मौके की तलाश थी...यकीनन अगर सभी पत्रकार जरनैल बन जाएं तो इस देश की किस्मत 'संवर' जाएगी... आपमें से कुछ की नजर में जरनैल भारत के छिपे हुए रत्न हैं और हमें उन पर गर्व होना चाहिए...बिल्कुल ठीक...भाड़ में जाए जर्नलिज्म...वो तो वैसे भी नपुंसकों का काम है...बाहुबल न हो तो कलमबल किस काम का... 

आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं जनाब शिरोमणि पत्रकार, जरनैल के जूते ने वह कर दिखाया जो 25 साल तक विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन नहीं कर सके...एक पत्रकार को अपनी कलम से ज्यादा अपने जूते पर भरोसा होना चाहिए...जब इतना जूताबल दिखा ही रहे हैं तो मेरी एक सलाह है...क्यों न जूते के नीचे लोहे की कीलें भी ठुकवा लें...और नेता के पास पहुंचने से पहले ही उतारकर भी रख लें...पता नहीं कौन से पल आपको अपना चोला उतारकर फेंकना पड़े...

9/4/09

उन दिनों विश्वविद्यालय हुआ करते थे...

अखबार मर रहे हैं... क्या अगला नंबर यूनिवर्सिटी का है... ये सवाल भारत में भारतीयों के लिए अहमियत बेशक न रखता हो... लेकिन वो वक्त दूर नहीं जब जल्द ही ये हमारे दरपेश भी होगा... पश्चिमी दुनिया अखबारों की मौत को नहीं रोक पा रही...लेकिन इससे बहुत परेशान तो है ही...(क्योंकि अभी भी कागज से रोमांस बाकी है...) तो क्या पश्चिम में यूनिवर्सिटीज भी अखबारों के रास्ते पर हैं...शायद... 

लॉस एंजेलेस टाइम्स और शिकागो ट्रिब्यून की मालिक कंपनी ट्रिब्यून दिवालिया हो चुकी है...यही हाल फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर का है... रॉकी माउंटेन न्यूज डेढ़ सौ साल के सफर के बाद हाल ही में मर गया... सिएटल पोस्ट इंटेलीजेंसर भी असल दुनिया से साइबर दुनिया में शिफ्ट हो चुका है... सेन फ्रैंसिस्को क्रॉनिकल शायद साल का अंत न देख सके... न्यूयॉर्क टाइम्स का कर्ज इतना बढ़ चुका है कि वो उसके नीचे कराह रहा है... हमारी अर्थव्यवस्था तकरीबन इसी ढांचे पर है तो बहुत मुमकिन है कि किसी अगली मंदी या बाजार की गिरावट में आप भारत में भी किसी सौ साल के उम्रदराज अखबार को दम तोड़ता देखें... ये तो साफ ही है कि भारत में भी अखबार अब घाटे के सौदे में तब्दील हो रहा है...

लेकिन ये तो बात हुई अखबारों की... उन्हें कौन मार रहा है ये आप भी जानते हैं...हम बात कर रहे हैं सालाना लाखों पढ़े लिखे लोगों की फौज तैयार करने वाली यूनिवर्सिटीज की...हाल ही में इसकी चर्चा देखने को मिली...वाशिंगटन के एक थिंकटैंक ने ये सवाल उठाया है... उसका कहना है कि दोनों ही इंडस्ट्री इन्फॉर्मेशन यानी सूचना के निर्माण और संचार में जुटी हैं... 

मगर पढ़ाने का काम पीआर और एडवर्टाइजिंग के मुकाबले ज्यादा जटिल है...वहां दिमाग को तराशने-संवारने का काम होता रहा है...इसलिए थोड़ी दिक्कतें हैं...इसके अलावा ज्यादातर विश्वविद्यालय अभी तक सरकारी मदद और सरकारी ढांचे के सहयोग से ही चलते हैं...अभी तक विश्वविद्यालय किसी खुले बाजार की प्रतियोगिता में नहीं उतरे हैं...उनके पास राष्ट्रीय कमीशनों की जो मान्यताएं हैं, वो उस आजादी को भोग रहे हैं...तो उन्हें खतरा कहां से है...विश्वविद्यालयों को कौन मार सकता है...

कुछ बातों पर गौर करें...जो शख्स इंटरनेट पर क्लासीफाइड विज्ञापन बेच सकता है, विचारों के कॉलम चला सकता है, खबरों का विश्लेषण कर सकता है, वो इंटरनेट पर मान्यता प्राप्त डिग्री भी बेच सकता है... बाकायदा आपके यूनिवर्सिटी जाए बिना आपको घर बैठे कोर्स करा सकता है... करा रहा है...और सब चीजें सिर्फ क्रैडिट या डेबिट कार्ड के जरिए...भरोसेमंद ढंग से...बेशक आज विश्वविद्यालय खुद पर उतना ही नाज कर सकते हैं और कर रहे हैं जितना 10 साल पहले तक अखबारों को अपने ऊपर था...ये यकीन कई मायनों में ठीक भी था...क्योंकि उनकी जरूरतें पूरी करने के तरीके को सीधे कोई चुनौती नहीं थी... मगर अब है... 

अगर विश्वविद्यालयों को जिंदा रहना है और फलना-फूलना है तो उन्हें टैक्नोलॉजी और शिक्षण को इस तरह बुनना पड़ेगा कि सीखने-जानने का अनुभव उसके छात्रों पर बोझ की तरह न लद जाए...जो अभी हर जगह देखने में आ रहा है...उन्हें अपनी ट्यूशन फी भी घटानी ही होंगी...इसलिए क्योंकि अब सबसे तेज और जहीन छात्र भी एक भी बोरिंग लैक्चर अटैंड किए बगैर सबसे ज्यादा नंबर पाने की ख्वाहिश रखता है...वो सीखने के और तरीके जानता है... जिसमें एकतरफा तौर पर पैसिव ढंग से सिर्फ मूर्खों की तरह सुनने से ज्यादा इंटरेक्टिव तरीके शामिल हैं...जहां उसे भी सुनने वाले हैं...

सीखने के बारे में अभी तक यूनिवर्सिटी मानती रही हैं कि एक ही पाजामा सभी को पहनाया जा सकता है... ऐसी शिक्षण पद्धति जिसमें शिक्षक केंद्र में होता है और हाशिए पर होते हैं छात्र, जिनके लिए वो यूनिवर्सिटी चल रही है... जो साल दर साल जमाने का उच्छिष्ट बांट रही हैं... और लाखों-करोड़ों बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रही हैं... जिनके पास इस फौज को उम्मीद की एक किरण भी देने के लिए नहीं है... इसलिए ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि अगर पूरी की पूरी पीढ़ी ही इस मॉडल का बायकॉट कर दे...ताज्जुब नहीं कि एक दिन विश्वविद्यालयों की बातें आत्मकथाओं का हिस्सा बन जाएं...कुछ इस तरह... उन दिनों विश्वविद्यालय हुआ करते थे...

23/3/09

जेड की मौत का इंतजार था हमें!

क्या जेड गुडी की मौत में कुछ ऐसा अनूठा है, जो उसे दूसरी मौतों से अलग करता है... मौत तो मौत है...एक ही ढंग से दबोचती है...वजह चाहे जो हो... शायद कुछ ऐसा जरूर था जेड की मौत में... ये अनोखापन था उसकी मौत का इंतजार... जेड के जाने के बाद ये इंतजार खत्म हो गया है... जेड ने मौत के इस ऑब्सेशन को अलविदा कह दी है... हमें किसी नए इंतजार के लिए छोड़ दिया है... 
पहली बार जब जेड को पता चला कि उसे ऐसा कैंसर है जो उसकी जान लेकर छोड़ेगा... तब उसने डॉक्टरों से यूथेनेसिया की अपील की थी.. लेकिन एक मां इस तरह अपने दोनों मासूम बच्चों को अलविदा नहीं कह सकती थी... इसलिए वो लड़ी...ये जानते हुए भी कि ये लड़ाई कुछ हफ्ते ही चलेगी...
जेड के बेटे बॉबी और फ्रेडी अभी ये नहीं समझ सकते कि उनकी मां किस हादसे की शिकार हुई है... उन्हें ये भी पता नहीं कि कैमरे के सामने जिंदगी जीने की आदी उनकी मां ने अपनी मौत से पहले उनके लिए जिंदगी का सामान इकट्ठा कर दिया है...
हर दूसरे घंटे दर्द से निपटने के लिए जेड को पेनकिलर्स लेनी पड़ती थीं... जैक ट्वीड के साथ शादी की रात जेड के घर के बाहर हर वक्त एक एंबुलेंस तैयार थी... जेड हर चीज के लिए तैयार थी... इस हद तक कि अगर उसकी मौत उससे बेवफाई करती तो शायद उसे मुंह दिखाने लायक न छोड़ती...
जेड ने अपनी मौत से पहले सभी अधिकार बेच दिए थे... 22 फरवरी को हुई उसकी शादी को टीवी चैनल लिविंग ने दो हिस्सों में दिखाया... टीवी पर होने वाली दुल्हन ने कुछ शो भी किए...ओके मैग्जीन को उसने अपनी मौत से पहले श्रद्धांजलि इश्यू छापने की इजाजत दी...अपने आखिरी शब्दों के साथ...
डायना की मौत में भी हमने मौत को दबे पांव आते देखा था...हमें इंतजार था उसका... लेकिन तब वक्त बेहद कम था...इसलिए रोमांच भी कम था... इस बार रोमांच ज्यादा था क्योंकि अभी वक्त था...
लेकिन मौत का ये ऑब्सेशन बिल्कुल वैसा ही था जैसे  मध्यकालीन यूरोप में गिलोटीन के जरिए इंसानी सिर को हवा में लहराते देखने भीड़ इकट्ठी होती थी...गिलोटीन पर मौजूद अपराधियों का भीड़ से नफरत का ही रिश्ता होता था... लेकिन दोनों एकदूसरे की मौजूदगी चाहते थे... इस बार गिलोटीन पर मौजूद शख्स ने भीड़ को अपनी मौत देखने की इजाजत दे दी थी... जेड जानती थी कि वो क्या कर रही थी...वो भीड़ की उसी भूख को शांत कर रही थी...क्योंकि उसकी जिंदगी उसे जितना न दे सकी, मौत उसे दे सकती थी...उसके बच्चों के लिए... शायद यही वजह है कि वो अपने बच्चों के लिए इतना छोड़ गई है कि वो अपनी उम्र के 16वें साल तक आराम से पढ़ सकेंगे... 
टीवी चैनलों के लिए ये दिन-रात के क्रिकेट मैच जैसा मौका था... जीतेजी जेड को श्रद्धांजलि... इससे भी ज्यादा खुद जेड का पब्लिसिटी मैनेजर मैक्स क्लिफोर्ड जेड की मौत का बेसब्री से इंतजार कर रहा था... नई स्टोरी पका रहा था कि कैसे मीडिया का पेट भरा जाए... आसन्न मृत्यु से पहले जेड की जिंदगी का हर पल कीमती था... जेड की तमन्ना के बावजूद उसकी मौत का सीधा प्रसारण मुमकिन नहीं हो सका...क्योंकि कुछ सिरफिरों ने उसे ऐसा न करने के लिए मना लिया था...फिर भी ओके मैग्जीन के साथ करार के एवज में मौत के धागे से लटकती जेड ने 1.4 मिलियन पॉन्ड तो कमा ही लिए थे...
कैंसर से जूझ रही जेड गुडी की कुछ तस्वीरें विचलित करने वाली थीं...इस बात का अहसास कि उसके दो बेहद छोटे बच्चे उससे जल्द ही जुदा हो जाएंगे...लोगों को कचोटती थी... लेकिन मौत की पदचाप सुन रही जवान लड़की के पीछे लगे कैमरों की चाहत क्या बस इतनी ही थी...कि लोग किसी ऐसे शख्स के बारे में जानें, जो इतनी बेबस है...
नहीं... बस इतना नहीं था...और भी कुछ था... जेड गुडी मिडिल क्लास एंटरटेनमेंट बन चुकी थी...लगातार शरीर को क्षीण होते दिखाने वाली जेड की तस्वीरें मौत की घोषणा कर रही थीं...मौत के बाजार में... और टेलीविजन ये तस्वीरें खरीदने को तैयार था...
अगर 27 साल की गुड़ी बेवक्त छीनी गई है तो गुडी ने भी इसका भरपूर बदला लिया है...अपनी मौत बेचकर...हमारा इंतजार भी खत्म हुआ क्योंकि हम इस टेलिवाइज्ड मौत को नहीं गंवाना चाहते थे...

17/3/09

जुनून खौफ का!

मीडिया हमें संवेदनशील बनाता है या हमारी संवेदनाओं को कुंद करता है...पता नहीं...जहां तक मुझे पता है कि मीडिया अपनी कमेंट्री में, अपने संवाद में, अपने झुकाव में...आपको कहीं छूने की कोशिश करता है क्योंकि वो पशुओं से संवाद नहीं कर रहा... वो जानवरों को समझाने की कोशिश नहीं कर रहा बल्कि जीते-जागते सोचने वाले जीव इंसानों तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं... लेकिन ऐसा लगता नहीं है...

मौत का मासूम चेहरा, जुनून की खौफनाक दास्तान, पहली बार टीवी पर, इन तस्वीरों से बच्चों को दूर रखना... 4 फुट की मौत...

अगर आपको कुछ भी पता न हो तो इन लाइनों से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे...शायद कोई सनसनीखेज वारदात...जिसमें चार फुट लंबे शख्स ने किसी की जान ले ली है...जिसे देखकर बच्चे डर सकते हैं...शायद यही या कुछ ऐसा ही...

लेकिन जनाब आप पूरी तरह गलत साबित होंगे...क्योंकि ये वो खबर है जो अंतर्राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समुदाय ही नहीं पूरी मानवता के लिए परेशानी का खुलासा करने वाली है...ये आतंकवाद का वो घिनौना चेहरा है, जिसे देख और सुनकर रौंगटे खड़े हो सकते हैं...ये खबर है पूरी बेरहमी से बचपन को मौत के मुंह में धकेलने की.. बच्चों को बंदूक और बम बांधकर लोगों की जान से खेलने की...उनके जिस्म पर बम बांधकर बदला लेने की हवस...जो दुनियाभर के आतंकी संगठन कर रहे हैं...

और ये चेहरा है 2009 की हिंदी टीवी रिपोर्टिंग का...इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि आप यूट्यूब की फुटेज इस्तेमाल करके किसी मुद्दे को हथियार बना रहे हैं, अपनी बात कह रहे हैं...लेकिन आपत्ति उसके प्रस्तुतिकरण पर जरूर होनी चाहिए...जो बेहद खौफनाक, सस्ती, मुद्दे से कोसों दूर, सनसनी से भरपूर और डर के सिवाय कोई भी असर छोड़ने में नाकामयाब है...

हमास बच्चों को अपने ग्रुप में शामिल करके उन्हें बाकायदा जिहाद में दीक्षित कर रहा है...मणिपुर में कुछ उग्रवादी संगठन, लिट्टे, कश्मीर के कुछ संगठन, तालिबान, अल कायदा और सरकारों के खिलाफ जेहाद में जुटे कई संगठन बच्चों को कवच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं... लेकिन क्या इसे ऐसे पेश करना ठीक होगा कि ये आपका मनोरंजन करे एक हॉरर मूवी की तरह...इस बारे में आगे सोचने की कोई गुंजाइश ही न छोड़े...

लेकिन ऐसा ही हुआ... अगर इस मुद्दे को भारतीय हिंदी टेलीविजन या अखबार उठाते हैं तो यही संदेश समझ आता है...सिर्फ यही खास, बाकी सब बकवास...बिल्कुल यही मैसेज होता है उनका...

यूट्यूब की इस फुटेज में हमास के एक स्थानीय नेता और एक बच्चे अहमद से स्थानीय रिपोर्टर का इंटरव्यू है... रिपोर्टर आतंकी और बच्चे से सवाल करती है...आतंकी अपना मकसद बताता है कि उनकी लड़ाई इजरायल के खिलाफ है और ये बच्चा उनका भाई है जो उनके मिशन में बेहद उपयोगी है...वो ये भी बता रहा है कि उनके पास अहमद जैसे सैकड़ों-हजारों बच्चे हैं...अगर अहमद शहीद भी हो गया तो उसकी जगह लेने को हजारों अहमद तैयार हैं...अहमद भी शहादत का जज्बा रखता है...

हिंदी पत्रकारों का सवाल है कि क्यों वो बच्चे मारे जा रहे हैं और ये नकाबपोश बचे हुए हैं... क्यों नहीं ये खुद लड़ने जाते...वो बता रहा है एकबारगी तो अहमद भी सिहर जाएगा...जो खुद की मर्जी से शहीद होना चाहता है, वो भी रुआंसा हो जाएगा... जब उसके बड़े भाइयों यानी इन नकाबपोशों के कुछ शब्द उसके कानों में शीशों की तरह पिघलेंगे...(बेहद गैरजिम्मेदाराना सामान्यीकरण और हवा में महल)

क्या यही समझदारी है इस मुद्दे की...जिस सवाल को हिंदी मीडिया भारत में बैठकर उठा रहा है...वो उन जेहादियों के लिए पूरी तरह बेमानी है...और क्या उन्हें ये पता नहीं कि नकाबपोश भी लड़ने जाते हैं... सैकड़ों-हजारों फिलिस्तीनी नौजवान लगातार इजरायल के खिलाफ संघर्ष में मारे जा रहे हैं...क्या उन्हें पता है कि आखिर फिलिस्तीन की जमीन क्यों इजरायल के खिलाफ धधक रही है...क्यों ऐसी नौबत आई कि बच्चों के सिर पर कफन बांधना पड़ा...छोड़िए जाने दीजिए...हिंदी दर्शक इतना गरिष्ठ मानसिक भोजन नहीं कर पाएगा...ये उनका दर्शन है... इसलिए आपका मनोरंजन करने और आपकी संवेदनाएं छूने के लिए बस खौफ का ही आखिरी रास्ता बचा है हिंदी मीडिया के पास...दूसरे, इसमें खुद की नाजानकारी भी आसानी से छिप जाती है...

इसी फुटेज में आतंकी बता रहे हैं कि आखिर अहमद इतनी छोटी उम्र में ही उनके साथ क्यों है... क्योंकि उनसे उनका बचपन छीन लिया गया...लेकिन ताज्जुब ये कि पूरी कहानी में सबसे अहम इस बात की कोई व्याख्या ही नहीं है...क्योंकि खुद उसे इस मुद्दे का ही पता नहीं है कि आखिर वो बचपन कैसे गया...और कहां गया...किसकी वजह से गया...और इसे बगैर किसी तवज्जो के छोड़ दिया गया...

चलती-फिरती मौत, पैरों पर चलकर आती तबाही, पलक झपकते मचा सकता है तबाही का तांडव, सैकेंड्स में सबकुछ खत्म कर देगा ये, बारूद वाला बच्चा, बर्बादी का बवंडर...मौत का परवाना.......ये वो कुछ जुमले हैं जो हिंदी मीडिया ने आतंकवादियों के साथ शामिल बच्चों को दिए... बड़े-बड़े शब्द...बेमानी लेकिन सनसनीखेज...संवेदनाहीन...जो शायद अब किसी के कानों पर जूं की तरह भी नहीं रेंगते...क्योंकि हर दूसरी-तीसरी लाइन पर इन्हें सुन-सुनकर आपके रौंगटे भी बैठ चुके हैं...

तो क्या मीडिया ने हिंदीभाषियों-हिंदी दर्शकों-हिंदी पाठकों को निरा उजड्ड, गंवार और बेवकूफ समझ रखा है...लगता तो कुछ ऐसा ही है...क्योंकि आंकड़े भी (टीआरपी) उन्हीं के साथ हैं... वो आपकी संवेदनशीलता को चुनौती देते हैं रोज...वो आपका वक्त ज़ाया करते हैं रोज...वो आपको पूरे परिवार के बीच शर्मसार करते हैं रोज...वो आपको जिल्लत और जहालत से भरपूर बताते हैं हरपल...आपकी सेंसिबिलिटी को कुरेदते हैं वो...आपको निहायत तुच्छ समझते हैं...पूरी सीनाजोरी के साथ...क्योंकि उनके पास आंकड़े हैं...अपनी बात के समर्थन में...

और फिर...हिंदी मीडिया को लगता है...भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त के बाद हिंदी में कोई साहित्यकार पैदा ही नहीं हुआ है...जो आपकी समझ विकसित कर सकता...हिंदी पत्रकार ही वो है जिसने हर नौकरी के नाकाबिल होने के बाद इस प्रोफेशन में कदम रखा...जो अपने गांव-कस्बे से सीधे महानगर पहुंचा...पढ़ने-लिखने से उसका कोई वास्ता नहीं...जो आपने पढ़ा, वही आपके पिताजी और उनके पिताजी ने पढ़ा था...इसलिए सोचें कैसे और क्या नया...कहां से आए संवेदनशीलता...गंभीर है तो गरिष्ठ है उसके लिए...हजम नहीं होता...इसीलिए हिंदी में अब विचार नहीं होता...सिर्फ साहित्य चिंतन होता है या प्राचीन महान का महिमामंडन...या फिर बचते हैं खतरनाक की कोटि में आने वाले शब्दबाण...

मगर एक बात है...हिंदी मीडिया अपने अंग्रेज सामंतियों की तरह ये भलीभांति जानता है कि हिंदी बेल्ट आधुनिकताबोध से वंचित नहीं है...बेशक उधारी की ही क्यों न हो...इसलिए इस बेल्ट को बाजार के बतौर देखने में उन्हें कोई उज्र नहीं है...हां, वो ये भी जानते हैं कि माल खरीदने वाला हिंदी ग्राहक सिर्फ नारों पर जाता है... और हर चमकदार, जोरदार, चीखपुकार से बेची गई चीज तुरंत खरीद लेता है... इसलिए साहित्यचिंतन से मुक्त हिंदी पत्रकारिता अब खतरनाक शब्दबाण लेकर मैदान में है...24X7 वो यही शब्दबाण छोड़ रही है...बाकी सबकुछ चुक गया है...हिंदी स्टाइल में अंग्रेजी पत्रकारिता...अंग्रेजी स्टाइल में देसी चिंतन...

नदी

क्या नदी बहती है  या समय का है प्रवाह हममें से होकर  या नदी स्थिर है  पर हमारा मन  खिसक रहा है  क्या नदी और समय वहीं हैं  उस क्षैतिज रेखा पर...