13/4/09

समंदर में दफन हिंदुस्तान का अतीत!

अटलांटिक की गोद में चिरनिद्रा में लीन उस जहाज पर कुछ लिखा है. समंदर में समाने के बाद भी वो लिखावट एक पूरी सदी नहीं मिटा सकी.ये इबारत है उन डेढ़ हजार जिंदगियों की, जो टाइटेनिक के साथ फना हो गईं. बहुत कम लोग जानते हैं कि इनमें कुछ जिंदगी ऐसी भी थीं जिनकी कहानी हिंदुस्तान की मिट्टी से जुड़ी थी.

दुनिया का सबसे बड़ा और ताकतवर स्टीमशिप टाइटेनिक 10 अप्रैल 1912 को साउथहैंपटन से न्यूयॉर्क के लिए निकल रहा था. मैरी डनबार लखनऊ से आ रही थीं और अपने बेटे फ्रांसिस से मिलने साउथ डकोटा जा रही थीं. मैरी तब 56 साल की थीं. जब उन्होंने टाइटेनिक में कदम रखा तो किसी को भी इल्म न था कि वो अब
 कभी वापस लौटने वाला नहीं था. ब्रिस्टल में पैदा हुईं मैरी डनबार के पति
 रैडरिक रुफोर्ड हैवलेट की मौत हो चुकी थी. भारत से उनका एक खास रिश्ता था. उनका एक लड़का रोजगार के साथ भारत आ गया था. लखनऊ को उसने अपना घर बनाया था. मैरी भी उसी के साथ लखनऊ में रह रही थीं. 1912 में मैरी डनबार ने अमेरिका की यात्रा शुरू की. भारत से वह पहले इंग्लैंड पहुंचीं. हैंपशायर इलाके में उनकी बेटी ई विलियर्स रहती थी. उससे मिलकर मैरी साउथहैंपटन गईं और वहां से टाइटेनिक में सेकेंड क्लास का टिकट खरीदा. यहीं से टाइटेनिक अपनी पहली और आखिरी यात्रा पर निकल रहा था. मैरी के टिकट का नंबर था 248706 और उन्होंने इसकी कीमत चुकाई थी 16 पॉन्ड. टाइटेनिक पर उनकी यात्रा मानो एक सपने के पूरा होने जैसी थी. लेकिन जल्द ही ये सपना टूटने वाला था. जहाज के डूबते वक्त कैप्टेन और क्रियु ने महिलाओं और बच्चों को पहले लाइफबोटों में बैठाया था. हैवलेट डेक पर मौजूद थीं और उन्हें भी लाइफबोट नंबर 13 में बैठा दिया गया. कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि उनके सामने ही दुनिया का सबसे खूबसूरत जहाज समंदर में समा रहा था. खौफजदा हैवलेट और लाइफबोट पर मौजूद बाकी यात्रियों को चार घंटे बाद मौके पर पहुंचे कार्पेथिया जहाज ने बचाया. कार्पेथिया पर पहुंचते ही उन्होंने 18 अप्रैल को लंदन में अपने घर टेलीग्राम भेजा - सुरक्षित कार्पेथिया पर. डनबार की किस्मत अच्छी थी, उन्हें अपने बेटे से मिलना बाकी था. फ्रांसिस से मिलकर वह फिर लौटीं और हमेशा के लिए भारत चली गईं. लेकिन टाइटेनिक जैसे खतरनाक हादसे में सुरक्षित बच गईं मैरी डनबार को सैप्टीसीमिया हो गया था. पांच साल बाद 9 मई 1917 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उनके बेटे ने मां की इच्छा के तहत उन्हें 10 मई को नैनीताल में दफना दिया. कालाधुंगी रोड पर हिमालय के चरणों में वह आज भी आराम कर रही हैं. 

14-15 अप्रैल 1912 की सर्द रात को टाइटेनिक हादसे में बची मैरी डनबार की तरह बाकी डेढ़ हजार लोग खुशकिस्मत नहीं थे जो अपनी जिंदगी को आगे जी पाते. ऐसी ही एक 
बदकिस्मत थी ऐनी क्लैमर फंक. ऐनी पैदा तो हुई थी पेंसिलवेनिया में, पर उसकी कर्मभूमि थी भारत. माता-पिता मैनोनाइट थे और 18वीं सदी में जर्मनी में बस गए थे. फंक ने मैसाचुसेट्स में मैनोनाइट ट्रेनिंग स्कूल में पढ़ाई की थी. उसका एक ही सपना था मिशनरी बनकर दुनिया की सैर. ये सपना पूरा हुआ जब 1906 में उसे भारत भेजा गया. वो भारत में पहली मैनोनाइट मिशनरी महिला थी. भारत पहुंचकर उसने काम करने के लिए जगह चुनी जांजगीर, आज के छत्तीसगढ़ का एक जिला. यही जगह उसकी जिंदगी के बचे हुए सालों की कर्मभूमि होने वाली थी. जुलाई 1907 में उसने जांजगीर के एक घर के एक कमरे में लड़कियों का स्कूल खोला. शुरुआती दिनों में सिर्फ 17 बच्चियां ही पढ़ने जाती थीं. फंक ने बच्चों से बात करने के लिए धीरे-धीरे हिंदी सीखी. अचानक 1912 में उसे पेंसिलवेनिया से एक टेलीग्राम मिला - जल्द जाओ, मां बहुत बीमार है. मां से मिलने की तड़प में उसने तुरंत जांजगीर से बॉम्बे के लिए ट्रेन पकड़ी और वहां से पर्शियन जहाज के जरिए फ्रांस में मार्सेल पहुंची. यहां से वो ट्रेन और बोट के जरिए इंग्लैंड आई. लिवरपूल पहुंचकर उसे पता चला कि कोयला कामगारों ने हड़ताल कर रखी थी और उसका जहाज हैवरफोर्ड आगे नहीं बढ़ सकता था. थॉमस कुक एंड संस के दफ्तर में उसे कहा गया कि वो चाहे तो कुछ और रुपए चुकाकर टाइटेनिक की टिकट ले सकती थी. ऐनी फंक ने तुरंत टाइटेनिक का सेकेंड क्लास का टिकट खरीद लिया. उसके टिकट का नंबर था 237671 और इसके लिए उसने कीमत चुकाई थी 13 पॉन्ड. 10 अप्रैल 1912 को साउथहैंपटन से उसने टाइटेनिक पर कदम रखा. जहाज पर ही 12 अप्रैल को उसकी 38वीं सालगिरह थी, लेकिन जल्द ही अभिशप्त रात आनी थी, जिसके बाद कोई अगला जन्मदिन नहीं था. 

14-15 अप्रैल की रात ऐनी फंक अपने केबिन में सोई थी कि उसे स्टीवार्ड ने आकर जगाया और तैयार होकर डेक पर पहुंचने को कहा. ऐनी जैसे ही एक लाइफबोट में बैठने लगी, एक महिला पीछे से चिल्लाती हुई आई और उसे धकेलकर बोली - मेरे बच्चे, मेरे बच्चे. अब आखिरी सीट भी भर चुकी थी. ऐनी ने खुशी-खुशी वो सीट उस महिला के लिए छोड़ दी. कुछ ही देर में टाइटेनिक अपने साथ अभागों को समंदर की अतल गहराइयों में लेकर चला गया. इन्हीं में ऐनी फंक भी थी. उसकी लाश कभी नहीं मिली. हादसे की खबर से घबराया ऐनी का भाई होरेस फंक न्यूयॉर्क पहुंचा और अपनी बहन के बारे में खोज-खबर पाने की कोशिश की. भारत जाने के बाद पांच साल में पहली बार ऐनी किसी यात्रा पर निकली थी. होरेस अभी भी सोचता था कि उसकी बहन टाइटेनिक पर नहीं थी. लेकिन भाई गलत था. उसकी बहन तो कब की समुद्री कब्रगाह में पहुंच चुकी थी. ऐनी फंक की याद में छत्तीसगढ़ में आज भी वो स्कूल चल रहा है. अब उसका नाम है ऐनी फंक मैमोरियल स्कूल. पेंसिलवेनिया में भी ऐनी की याद में हैयरफोर्ड मैनोनाइट चर्च सिमिट्री में एक यादगार मौजूद है. 

मैरी डनबार और ऐनी फंक के अलावा एक साल का बच्चा रिचर्ड एफ बेकर भी टाइटेनिक पर था. कोडइकनाल में पैदा हुआ रिचर्ड अपनी मां नैली और बहनों मैरियन और रूथ के साथ अमेरिका यात्रा पर था. रिचर्ड को उसकी मां और बहन मैरियन के साथ लाइफबोट नंबर 11 के जरिए बचाया गया. भारत छोड़ते वक्त रिचर्ड का परिवार आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर में अपने पिता एलेन ओलिवर बेकर के साथ रहता था, जो गुंटूर में मिशनरी थे. इसी गुंटूर में ही टाइटेनिक का एक और यात्री भी पैदा हुआ था. वो थी रूथ बेकर ब्लैंचार्ड. हादसे के वक्त वो अपने नन्हे भाई रिचर्ड और मां से अलग हो गई थी. उसे भी कार्पेथिया जहाज ने बचा लिया था. जे फ्रैंक कार्नेस उर्फ क्लेयर बैनेट 22 साल की एक नई नवेली दुल्हन थी जो भारत से अमेरिका जा रही थी. शादी के बाद वह पति के साथ भारत आ गई थी. साउथहैंपटन से वो मेरी कोरे के साथ टाइटेनिक में सवार हुई थी. टिकट का नंबर था 13534 और उसने अमेरिका पहुंचने के लिए 21 पॉन्ड कीमत अदा की थी. क्लेयर ने 14 अप्रैल की दोपहर जहाज की सेकेंड क्लास लाइब्रेरी में गुजारी थी. कार्नेस को पता नहीं था कि कुछ दिन पहले चेचक से उनके पति की मौत हो चुकी थी. पति को भी अपने आखिरी वक्त तक ये गुमान न था कि वो अपनी पत्नी से हमेशा के लिए अलग हो रहा था. टाइटेनिक के साथ ही कार्नेस भी समंदर में समा गई. उसकी भी लाश नहीं मिल सकी. कार्नेस की सहेली मेरी पर्सी कोरे भी अपर बर्मा (तब भारत में) से अमेरिका जा रही थी, जहां उसका पति इंग्लिश ऑयल कंपनी में सुपरिंटेंडेंट था. मेरी की भी ये आखिरी यात्रा थी. दोनों सहेलियां एकसाथ इस दुनिया से रुखसत हुईं.

24 साल का हैनरी रैलेंड डायर भी टाइटेनिक का वो अभागा यात्री था जो अपने आखिरी सफर पर निकला था. डायर झांसी में पैदा हुआ था और भारत में ही पढ़ा-लिखा था. इसके बाद वो इंग्लैंड चला गया था. पेशे से इंजीनियर रैलेंड डायर व्हाइट स्टार लाइन कंपनी के साथ साउथहैंपटन में ही तैनात था. ये वही कंपनी थी जिसने टाइटेनिक जैसे ऐतिहासिक ख्याति के जहाज को तैयार किया था. हैनरी टाइटेनिक पर अपनी ड्यूटी देते हुए इस संसार से चला गया.

लंकाशायर, इंग्लैंड का रहने वाला चार्ल्स हर्बर्ट लाइटॉलर टाइटेनिक की शायद सबसे विवादास्पद शख्सियतों में से एक है. जो किस्मत से टाइटेनिक हादसे में बच गया. बाद में चली जांच के दौरान उसकी गवाही अहम साबित हुई. उसी ने हादसे के दौरान पूरे क्रियु की भूमिका का खुलासा किया था. 
खास बात ये है कि चार्ल्स लाइटॉलर ने कलकत्ता से कार्गो पर काम करने के लिए जरूरी सेकेंड मेट सर्टिफिकेट पास किया था. 1900 में उसने व्हाइट स्टार लाइन कंपनी में नौकरी पाई और टाइटेनिक की ऐतिहासिक यात्रा से दो हफ्ते पहले उस पर कदम रखा. 14-15 अप्रैल की काली रात घटी घटनाओं के इस साक्षी की गवाही ने अंतिम क्षणों में जहाज के कैप्टेन की भूमिका का खुलासा किया था. 

इनके अलावा टाइटेनिक पर सवार कई यात्री ऐसे भी थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश आर्मी के लिए काम किया था. टाइटेनिक की आखिरी प्रामाणिक फोटो खींचने वाला मॉरोग भी भारत आया था. टाइटेनिक से जुड़े 29 लोग ऐसे थे, जिनका भारत से कोई न कोई रिश्ता रहा. कुछ ने यहां जन्म लिया तो कुछ ने भारत को कर्मभूमि बनाया और कुछ इसी मिट्टी में समा गए. कुछ इतने अभागे थे कि भारत में पैदा होने के बाद मौत उन्हें टाइटेनिक के साथ समंदर में खींच ले गई.

12/4/09

मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया...

बूट अहमद ने बनाया, मैंने मज़मून लिखा
मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया 

जी हां, ये जूता चलाने का वक्त है...क्योंकि कलम बेदम है...बेजार है...जर्नेलिज्म का वक्त है क्योंकि जर्नलिज्म थक गया है...टूट गया है... और देखिए न, आपमें और हममें अब मजमून पढ़ने और लिखने का माद्दा भी कहां है, इसलिए जूता चलाइए पूरी तरह बेखौफ होकर.. हां एक बात का ख्याल जरूर रखें कि आपका जूता चुनाव के मौसम में ही चले...क्योंकि इन दिनों इस देश के सफेदपोश सबसे कमजोर होते हैं...उनकी संवेदनशीलता अपने उफान पर होती है...बेहद सहनशील...बिल्कुल प्रसूता गाय की तरह...वो सींग नहीं चला सकते इस दौरान...इसलिए उनसे डरने-घबराने की जरूरत नहीं... हां, एक बात का ख्याल रहे...मतदान के आखिरी दिन शाम तक ही आप जूता चला पाएंगे...क्योंकि इसके बाद आपका जूता आप पर ही उल्टा पड़ सकता है... 

अगर आप खीझे हुए हैं...और धैर्य ने साथ छोड़ दिया है...अगर 25 साल तक आप देश के कानून को बदमाशों के हाथों की कठपुतली बने रहते देखने के बाद नफरत करने लगे हैं...अगर न्यायपालिका और कार्यपालिका से आप ऊब गए हैं...तो जनाब यही वक्त है, चला दें जूता...क्योंकि क्या पता आपका जूता भी जरनैल के जूते की तरह निशाने पर बैठे... 

आप कह रहे हैं कि जरनैल ने जो संदेश दिया है वो कई पत्रकार अपने पूरे कैरियर में नहीं दे पाते...ठीक ही कह रहे हैं आप...क्योंकि जिंदगी भर कलम के सिपाही के रूप में आप बहुरुपिए ही थे...आपको तो बस एक मौके की तलाश थी...यकीनन अगर सभी पत्रकार जरनैल बन जाएं तो इस देश की किस्मत 'संवर' जाएगी... आपमें से कुछ की नजर में जरनैल भारत के छिपे हुए रत्न हैं और हमें उन पर गर्व होना चाहिए...बिल्कुल ठीक...भाड़ में जाए जर्नलिज्म...वो तो वैसे भी नपुंसकों का काम है...बाहुबल न हो तो कलमबल किस काम का... 

आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं जनाब शिरोमणि पत्रकार, जरनैल के जूते ने वह कर दिखाया जो 25 साल तक विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन नहीं कर सके...एक पत्रकार को अपनी कलम से ज्यादा अपने जूते पर भरोसा होना चाहिए...जब इतना जूताबल दिखा ही रहे हैं तो मेरी एक सलाह है...क्यों न जूते के नीचे लोहे की कीलें भी ठुकवा लें...और नेता के पास पहुंचने से पहले ही उतारकर भी रख लें...पता नहीं कौन से पल आपको अपना चोला उतारकर फेंकना पड़े...

9/4/09

उन दिनों विश्वविद्यालय हुआ करते थे...

अखबार मर रहे हैं... क्या अगला नंबर यूनिवर्सिटी का है... ये सवाल भारत में भारतीयों के लिए अहमियत बेशक न रखता हो... लेकिन वो वक्त दूर नहीं जब जल्द ही ये हमारे दरपेश भी होगा... पश्चिमी दुनिया अखबारों की मौत को नहीं रोक पा रही...लेकिन इससे बहुत परेशान तो है ही...(क्योंकि अभी भी कागज से रोमांस बाकी है...) तो क्या पश्चिम में यूनिवर्सिटीज भी अखबारों के रास्ते पर हैं...शायद... 

लॉस एंजेलेस टाइम्स और शिकागो ट्रिब्यून की मालिक कंपनी ट्रिब्यून दिवालिया हो चुकी है...यही हाल फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर का है... रॉकी माउंटेन न्यूज डेढ़ सौ साल के सफर के बाद हाल ही में मर गया... सिएटल पोस्ट इंटेलीजेंसर भी असल दुनिया से साइबर दुनिया में शिफ्ट हो चुका है... सेन फ्रैंसिस्को क्रॉनिकल शायद साल का अंत न देख सके... न्यूयॉर्क टाइम्स का कर्ज इतना बढ़ चुका है कि वो उसके नीचे कराह रहा है... हमारी अर्थव्यवस्था तकरीबन इसी ढांचे पर है तो बहुत मुमकिन है कि किसी अगली मंदी या बाजार की गिरावट में आप भारत में भी किसी सौ साल के उम्रदराज अखबार को दम तोड़ता देखें... ये तो साफ ही है कि भारत में भी अखबार अब घाटे के सौदे में तब्दील हो रहा है...

लेकिन ये तो बात हुई अखबारों की... उन्हें कौन मार रहा है ये आप भी जानते हैं...हम बात कर रहे हैं सालाना लाखों पढ़े लिखे लोगों की फौज तैयार करने वाली यूनिवर्सिटीज की...हाल ही में इसकी चर्चा देखने को मिली...वाशिंगटन के एक थिंकटैंक ने ये सवाल उठाया है... उसका कहना है कि दोनों ही इंडस्ट्री इन्फॉर्मेशन यानी सूचना के निर्माण और संचार में जुटी हैं... 

मगर पढ़ाने का काम पीआर और एडवर्टाइजिंग के मुकाबले ज्यादा जटिल है...वहां दिमाग को तराशने-संवारने का काम होता रहा है...इसलिए थोड़ी दिक्कतें हैं...इसके अलावा ज्यादातर विश्वविद्यालय अभी तक सरकारी मदद और सरकारी ढांचे के सहयोग से ही चलते हैं...अभी तक विश्वविद्यालय किसी खुले बाजार की प्रतियोगिता में नहीं उतरे हैं...उनके पास राष्ट्रीय कमीशनों की जो मान्यताएं हैं, वो उस आजादी को भोग रहे हैं...तो उन्हें खतरा कहां से है...विश्वविद्यालयों को कौन मार सकता है...

कुछ बातों पर गौर करें...जो शख्स इंटरनेट पर क्लासीफाइड विज्ञापन बेच सकता है, विचारों के कॉलम चला सकता है, खबरों का विश्लेषण कर सकता है, वो इंटरनेट पर मान्यता प्राप्त डिग्री भी बेच सकता है... बाकायदा आपके यूनिवर्सिटी जाए बिना आपको घर बैठे कोर्स करा सकता है... करा रहा है...और सब चीजें सिर्फ क्रैडिट या डेबिट कार्ड के जरिए...भरोसेमंद ढंग से...बेशक आज विश्वविद्यालय खुद पर उतना ही नाज कर सकते हैं और कर रहे हैं जितना 10 साल पहले तक अखबारों को अपने ऊपर था...ये यकीन कई मायनों में ठीक भी था...क्योंकि उनकी जरूरतें पूरी करने के तरीके को सीधे कोई चुनौती नहीं थी... मगर अब है... 

अगर विश्वविद्यालयों को जिंदा रहना है और फलना-फूलना है तो उन्हें टैक्नोलॉजी और शिक्षण को इस तरह बुनना पड़ेगा कि सीखने-जानने का अनुभव उसके छात्रों पर बोझ की तरह न लद जाए...जो अभी हर जगह देखने में आ रहा है...उन्हें अपनी ट्यूशन फी भी घटानी ही होंगी...इसलिए क्योंकि अब सबसे तेज और जहीन छात्र भी एक भी बोरिंग लैक्चर अटैंड किए बगैर सबसे ज्यादा नंबर पाने की ख्वाहिश रखता है...वो सीखने के और तरीके जानता है... जिसमें एकतरफा तौर पर पैसिव ढंग से सिर्फ मूर्खों की तरह सुनने से ज्यादा इंटरेक्टिव तरीके शामिल हैं...जहां उसे भी सुनने वाले हैं...

सीखने के बारे में अभी तक यूनिवर्सिटी मानती रही हैं कि एक ही पाजामा सभी को पहनाया जा सकता है... ऐसी शिक्षण पद्धति जिसमें शिक्षक केंद्र में होता है और हाशिए पर होते हैं छात्र, जिनके लिए वो यूनिवर्सिटी चल रही है... जो साल दर साल जमाने का उच्छिष्ट बांट रही हैं... और लाखों-करोड़ों बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रही हैं... जिनके पास इस फौज को उम्मीद की एक किरण भी देने के लिए नहीं है... इसलिए ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि अगर पूरी की पूरी पीढ़ी ही इस मॉडल का बायकॉट कर दे...ताज्जुब नहीं कि एक दिन विश्वविद्यालयों की बातें आत्मकथाओं का हिस्सा बन जाएं...कुछ इस तरह... उन दिनों विश्वविद्यालय हुआ करते थे...

23/3/09

जेड की मौत का इंतजार था हमें!

क्या जेड गुडी की मौत में कुछ ऐसा अनूठा है, जो उसे दूसरी मौतों से अलग करता है... मौत तो मौत है...एक ही ढंग से दबोचती है...वजह चाहे जो हो... शायद कुछ ऐसा जरूर था जेड की मौत में... ये अनोखापन था उसकी मौत का इंतजार... जेड के जाने के बाद ये इंतजार खत्म हो गया है... जेड ने मौत के इस ऑब्सेशन को अलविदा कह दी है... हमें किसी नए इंतजार के लिए छोड़ दिया है... 
पहली बार जब जेड को पता चला कि उसे ऐसा कैंसर है जो उसकी जान लेकर छोड़ेगा... तब उसने डॉक्टरों से यूथेनेसिया की अपील की थी.. लेकिन एक मां इस तरह अपने दोनों मासूम बच्चों को अलविदा नहीं कह सकती थी... इसलिए वो लड़ी...ये जानते हुए भी कि ये लड़ाई कुछ हफ्ते ही चलेगी...
जेड के बेटे बॉबी और फ्रेडी अभी ये नहीं समझ सकते कि उनकी मां किस हादसे की शिकार हुई है... उन्हें ये भी पता नहीं कि कैमरे के सामने जिंदगी जीने की आदी उनकी मां ने अपनी मौत से पहले उनके लिए जिंदगी का सामान इकट्ठा कर दिया है...
हर दूसरे घंटे दर्द से निपटने के लिए जेड को पेनकिलर्स लेनी पड़ती थीं... जैक ट्वीड के साथ शादी की रात जेड के घर के बाहर हर वक्त एक एंबुलेंस तैयार थी... जेड हर चीज के लिए तैयार थी... इस हद तक कि अगर उसकी मौत उससे बेवफाई करती तो शायद उसे मुंह दिखाने लायक न छोड़ती...
जेड ने अपनी मौत से पहले सभी अधिकार बेच दिए थे... 22 फरवरी को हुई उसकी शादी को टीवी चैनल लिविंग ने दो हिस्सों में दिखाया... टीवी पर होने वाली दुल्हन ने कुछ शो भी किए...ओके मैग्जीन को उसने अपनी मौत से पहले श्रद्धांजलि इश्यू छापने की इजाजत दी...अपने आखिरी शब्दों के साथ...
डायना की मौत में भी हमने मौत को दबे पांव आते देखा था...हमें इंतजार था उसका... लेकिन तब वक्त बेहद कम था...इसलिए रोमांच भी कम था... इस बार रोमांच ज्यादा था क्योंकि अभी वक्त था...
लेकिन मौत का ये ऑब्सेशन बिल्कुल वैसा ही था जैसे  मध्यकालीन यूरोप में गिलोटीन के जरिए इंसानी सिर को हवा में लहराते देखने भीड़ इकट्ठी होती थी...गिलोटीन पर मौजूद अपराधियों का भीड़ से नफरत का ही रिश्ता होता था... लेकिन दोनों एकदूसरे की मौजूदगी चाहते थे... इस बार गिलोटीन पर मौजूद शख्स ने भीड़ को अपनी मौत देखने की इजाजत दे दी थी... जेड जानती थी कि वो क्या कर रही थी...वो भीड़ की उसी भूख को शांत कर रही थी...क्योंकि उसकी जिंदगी उसे जितना न दे सकी, मौत उसे दे सकती थी...उसके बच्चों के लिए... शायद यही वजह है कि वो अपने बच्चों के लिए इतना छोड़ गई है कि वो अपनी उम्र के 16वें साल तक आराम से पढ़ सकेंगे... 
टीवी चैनलों के लिए ये दिन-रात के क्रिकेट मैच जैसा मौका था... जीतेजी जेड को श्रद्धांजलि... इससे भी ज्यादा खुद जेड का पब्लिसिटी मैनेजर मैक्स क्लिफोर्ड जेड की मौत का बेसब्री से इंतजार कर रहा था... नई स्टोरी पका रहा था कि कैसे मीडिया का पेट भरा जाए... आसन्न मृत्यु से पहले जेड की जिंदगी का हर पल कीमती था... जेड की तमन्ना के बावजूद उसकी मौत का सीधा प्रसारण मुमकिन नहीं हो सका...क्योंकि कुछ सिरफिरों ने उसे ऐसा न करने के लिए मना लिया था...फिर भी ओके मैग्जीन के साथ करार के एवज में मौत के धागे से लटकती जेड ने 1.4 मिलियन पॉन्ड तो कमा ही लिए थे...
कैंसर से जूझ रही जेड गुडी की कुछ तस्वीरें विचलित करने वाली थीं...इस बात का अहसास कि उसके दो बेहद छोटे बच्चे उससे जल्द ही जुदा हो जाएंगे...लोगों को कचोटती थी... लेकिन मौत की पदचाप सुन रही जवान लड़की के पीछे लगे कैमरों की चाहत क्या बस इतनी ही थी...कि लोग किसी ऐसे शख्स के बारे में जानें, जो इतनी बेबस है...
नहीं... बस इतना नहीं था...और भी कुछ था... जेड गुडी मिडिल क्लास एंटरटेनमेंट बन चुकी थी...लगातार शरीर को क्षीण होते दिखाने वाली जेड की तस्वीरें मौत की घोषणा कर रही थीं...मौत के बाजार में... और टेलीविजन ये तस्वीरें खरीदने को तैयार था...
अगर 27 साल की गुड़ी बेवक्त छीनी गई है तो गुडी ने भी इसका भरपूर बदला लिया है...अपनी मौत बेचकर...हमारा इंतजार भी खत्म हुआ क्योंकि हम इस टेलिवाइज्ड मौत को नहीं गंवाना चाहते थे...

17/3/09

जुनून खौफ का!

मीडिया हमें संवेदनशील बनाता है या हमारी संवेदनाओं को कुंद करता है...पता नहीं...जहां तक मुझे पता है कि मीडिया अपनी कमेंट्री में, अपने संवाद में, अपने झुकाव में...आपको कहीं छूने की कोशिश करता है क्योंकि वो पशुओं से संवाद नहीं कर रहा... वो जानवरों को समझाने की कोशिश नहीं कर रहा बल्कि जीते-जागते सोचने वाले जीव इंसानों तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं... लेकिन ऐसा लगता नहीं है...

मौत का मासूम चेहरा, जुनून की खौफनाक दास्तान, पहली बार टीवी पर, इन तस्वीरों से बच्चों को दूर रखना... 4 फुट की मौत...

अगर आपको कुछ भी पता न हो तो इन लाइनों से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे...शायद कोई सनसनीखेज वारदात...जिसमें चार फुट लंबे शख्स ने किसी की जान ले ली है...जिसे देखकर बच्चे डर सकते हैं...शायद यही या कुछ ऐसा ही...

लेकिन जनाब आप पूरी तरह गलत साबित होंगे...क्योंकि ये वो खबर है जो अंतर्राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समुदाय ही नहीं पूरी मानवता के लिए परेशानी का खुलासा करने वाली है...ये आतंकवाद का वो घिनौना चेहरा है, जिसे देख और सुनकर रौंगटे खड़े हो सकते हैं...ये खबर है पूरी बेरहमी से बचपन को मौत के मुंह में धकेलने की.. बच्चों को बंदूक और बम बांधकर लोगों की जान से खेलने की...उनके जिस्म पर बम बांधकर बदला लेने की हवस...जो दुनियाभर के आतंकी संगठन कर रहे हैं...

और ये चेहरा है 2009 की हिंदी टीवी रिपोर्टिंग का...इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि आप यूट्यूब की फुटेज इस्तेमाल करके किसी मुद्दे को हथियार बना रहे हैं, अपनी बात कह रहे हैं...लेकिन आपत्ति उसके प्रस्तुतिकरण पर जरूर होनी चाहिए...जो बेहद खौफनाक, सस्ती, मुद्दे से कोसों दूर, सनसनी से भरपूर और डर के सिवाय कोई भी असर छोड़ने में नाकामयाब है...

हमास बच्चों को अपने ग्रुप में शामिल करके उन्हें बाकायदा जिहाद में दीक्षित कर रहा है...मणिपुर में कुछ उग्रवादी संगठन, लिट्टे, कश्मीर के कुछ संगठन, तालिबान, अल कायदा और सरकारों के खिलाफ जेहाद में जुटे कई संगठन बच्चों को कवच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं... लेकिन क्या इसे ऐसे पेश करना ठीक होगा कि ये आपका मनोरंजन करे एक हॉरर मूवी की तरह...इस बारे में आगे सोचने की कोई गुंजाइश ही न छोड़े...

लेकिन ऐसा ही हुआ... अगर इस मुद्दे को भारतीय हिंदी टेलीविजन या अखबार उठाते हैं तो यही संदेश समझ आता है...सिर्फ यही खास, बाकी सब बकवास...बिल्कुल यही मैसेज होता है उनका...

यूट्यूब की इस फुटेज में हमास के एक स्थानीय नेता और एक बच्चे अहमद से स्थानीय रिपोर्टर का इंटरव्यू है... रिपोर्टर आतंकी और बच्चे से सवाल करती है...आतंकी अपना मकसद बताता है कि उनकी लड़ाई इजरायल के खिलाफ है और ये बच्चा उनका भाई है जो उनके मिशन में बेहद उपयोगी है...वो ये भी बता रहा है कि उनके पास अहमद जैसे सैकड़ों-हजारों बच्चे हैं...अगर अहमद शहीद भी हो गया तो उसकी जगह लेने को हजारों अहमद तैयार हैं...अहमद भी शहादत का जज्बा रखता है...

हिंदी पत्रकारों का सवाल है कि क्यों वो बच्चे मारे जा रहे हैं और ये नकाबपोश बचे हुए हैं... क्यों नहीं ये खुद लड़ने जाते...वो बता रहा है एकबारगी तो अहमद भी सिहर जाएगा...जो खुद की मर्जी से शहीद होना चाहता है, वो भी रुआंसा हो जाएगा... जब उसके बड़े भाइयों यानी इन नकाबपोशों के कुछ शब्द उसके कानों में शीशों की तरह पिघलेंगे...(बेहद गैरजिम्मेदाराना सामान्यीकरण और हवा में महल)

क्या यही समझदारी है इस मुद्दे की...जिस सवाल को हिंदी मीडिया भारत में बैठकर उठा रहा है...वो उन जेहादियों के लिए पूरी तरह बेमानी है...और क्या उन्हें ये पता नहीं कि नकाबपोश भी लड़ने जाते हैं... सैकड़ों-हजारों फिलिस्तीनी नौजवान लगातार इजरायल के खिलाफ संघर्ष में मारे जा रहे हैं...क्या उन्हें पता है कि आखिर फिलिस्तीन की जमीन क्यों इजरायल के खिलाफ धधक रही है...क्यों ऐसी नौबत आई कि बच्चों के सिर पर कफन बांधना पड़ा...छोड़िए जाने दीजिए...हिंदी दर्शक इतना गरिष्ठ मानसिक भोजन नहीं कर पाएगा...ये उनका दर्शन है... इसलिए आपका मनोरंजन करने और आपकी संवेदनाएं छूने के लिए बस खौफ का ही आखिरी रास्ता बचा है हिंदी मीडिया के पास...दूसरे, इसमें खुद की नाजानकारी भी आसानी से छिप जाती है...

इसी फुटेज में आतंकी बता रहे हैं कि आखिर अहमद इतनी छोटी उम्र में ही उनके साथ क्यों है... क्योंकि उनसे उनका बचपन छीन लिया गया...लेकिन ताज्जुब ये कि पूरी कहानी में सबसे अहम इस बात की कोई व्याख्या ही नहीं है...क्योंकि खुद उसे इस मुद्दे का ही पता नहीं है कि आखिर वो बचपन कैसे गया...और कहां गया...किसकी वजह से गया...और इसे बगैर किसी तवज्जो के छोड़ दिया गया...

चलती-फिरती मौत, पैरों पर चलकर आती तबाही, पलक झपकते मचा सकता है तबाही का तांडव, सैकेंड्स में सबकुछ खत्म कर देगा ये, बारूद वाला बच्चा, बर्बादी का बवंडर...मौत का परवाना.......ये वो कुछ जुमले हैं जो हिंदी मीडिया ने आतंकवादियों के साथ शामिल बच्चों को दिए... बड़े-बड़े शब्द...बेमानी लेकिन सनसनीखेज...संवेदनाहीन...जो शायद अब किसी के कानों पर जूं की तरह भी नहीं रेंगते...क्योंकि हर दूसरी-तीसरी लाइन पर इन्हें सुन-सुनकर आपके रौंगटे भी बैठ चुके हैं...

तो क्या मीडिया ने हिंदीभाषियों-हिंदी दर्शकों-हिंदी पाठकों को निरा उजड्ड, गंवार और बेवकूफ समझ रखा है...लगता तो कुछ ऐसा ही है...क्योंकि आंकड़े भी (टीआरपी) उन्हीं के साथ हैं... वो आपकी संवेदनशीलता को चुनौती देते हैं रोज...वो आपका वक्त ज़ाया करते हैं रोज...वो आपको पूरे परिवार के बीच शर्मसार करते हैं रोज...वो आपको जिल्लत और जहालत से भरपूर बताते हैं हरपल...आपकी सेंसिबिलिटी को कुरेदते हैं वो...आपको निहायत तुच्छ समझते हैं...पूरी सीनाजोरी के साथ...क्योंकि उनके पास आंकड़े हैं...अपनी बात के समर्थन में...

और फिर...हिंदी मीडिया को लगता है...भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त के बाद हिंदी में कोई साहित्यकार पैदा ही नहीं हुआ है...जो आपकी समझ विकसित कर सकता...हिंदी पत्रकार ही वो है जिसने हर नौकरी के नाकाबिल होने के बाद इस प्रोफेशन में कदम रखा...जो अपने गांव-कस्बे से सीधे महानगर पहुंचा...पढ़ने-लिखने से उसका कोई वास्ता नहीं...जो आपने पढ़ा, वही आपके पिताजी और उनके पिताजी ने पढ़ा था...इसलिए सोचें कैसे और क्या नया...कहां से आए संवेदनशीलता...गंभीर है तो गरिष्ठ है उसके लिए...हजम नहीं होता...इसीलिए हिंदी में अब विचार नहीं होता...सिर्फ साहित्य चिंतन होता है या प्राचीन महान का महिमामंडन...या फिर बचते हैं खतरनाक की कोटि में आने वाले शब्दबाण...

मगर एक बात है...हिंदी मीडिया अपने अंग्रेज सामंतियों की तरह ये भलीभांति जानता है कि हिंदी बेल्ट आधुनिकताबोध से वंचित नहीं है...बेशक उधारी की ही क्यों न हो...इसलिए इस बेल्ट को बाजार के बतौर देखने में उन्हें कोई उज्र नहीं है...हां, वो ये भी जानते हैं कि माल खरीदने वाला हिंदी ग्राहक सिर्फ नारों पर जाता है... और हर चमकदार, जोरदार, चीखपुकार से बेची गई चीज तुरंत खरीद लेता है... इसलिए साहित्यचिंतन से मुक्त हिंदी पत्रकारिता अब खतरनाक शब्दबाण लेकर मैदान में है...24X7 वो यही शब्दबाण छोड़ रही है...बाकी सबकुछ चुक गया है...हिंदी स्टाइल में अंग्रेजी पत्रकारिता...अंग्रेजी स्टाइल में देसी चिंतन...

16/3/09

जब एक अखबार मरता है...

हाँ, जब एक अखबार मरता है तो सिर्फ अखबार ही नहीं मरता...
समय का वो टुकड़ा हमेशा के लिए मर जाता है...जिसे हम जानते आए हैं...
जब एक अखबार मरता है तो उस शहर की चेतना का एक हिस्सा भी उसके साथ खत्म हो जाता है
जब एक अखबार मरता है तो उस समाज और समुदाय का एक पक्ष विक्षत हो जाता है
जब एक अखबार मरता है तो किसी की जीत नहीं होती, पूरा शहर हार जाता है
जब एक अखबार मरता है तो उस समुदाय की कहानियां मर जाती हैं किस्सागो के साथ
जब एक अखबार मरता है तो उस शहर की स्मृति भी छिन्न-भिन्न हो जाती है
जब एक अखबार मरता है तो वो स्वर और प्रतीक गायब हो जाते हैं जो पूरे समुदाय के लिए अहमियत रखते थे

अमेरिका के डेढ़ सौ साल के उम्रदराज अखबार 
रॉकी माउंटेन न्यूज की 3 मार्च 2009 को मौत हो गई...रॉकी के साथ ही कोलोरैडो और डेनवर के ऐतिहासिक समय, स्मृतियों और चेतना का एक हिस्सा भी दफन हो गया... रॉकी अमेरिका का 21वां सबसे पुराना अखबार था...

इन डेढ़ सौ साल के वक्त में इस अखबार के कई संपादक अगवा हुए, उन्हें गोली मारी गई, उनको पीटा गया और उन्हें जलाया गया... उन्होंने कॉमनवेल्थ बनाए, विश्वविद्यालय खड़े किए, वो पहाड़ों पर चढ़े...उन्हें अपने दफ्तर पहुंचने से रोका गया...लेकिन वो कभी नहीं डरे, कभी झुके नहीं...तब भी नहीं जब शायद सिर्फ यही एक रास्ता बचा था...

तो ऐसा क्या हुआ कि इतने बेखौफ अखबार के डेढ़ सौ साल के सुनहरे अतीत पर एकदम झिलमिली पड़ गई... खुद अखबार के संपादक मानते हैं कि उन्हें बुरे लोगों और विरोधियों ने नहीं उनके ही पाठकों ने परास्त कर दिया... उन्हें इंटरनेट ने हरा दिया...क्योंकि लोग डेढ़ सौ साल से कागज पर छपते अखबार को पढ़कर ऊब गए थे...आप इसे दुखद कह सकते हैं...लेकिन रॉकी माउंटेन न्यूज ने अमेरिकी पूंजीवाद का वार भी झेल लिया था... उसे उन्हीं ने हरा दिया, जिनके लिए वो छपता रहा...

इस अखबार ने सिर्फ कोलोरैडो के इतिहास की गौरवगाथाएं ही दर्ज नहीं कीं... उसके पन्नों पर शहर की बर्बरता और उसका अत्याचार भी दर्ज हुए...सभी मील के पत्थरों की रिकॉर्डिंग और तकरीबन सभी मसलों पर बेबाक राय भी उसी स्याही से दर्ज की गई... लेकिन अब ये एक इतिहास हो चुका है... कुछ भी हो, कोलोरैडो का कोई भी बाशिंदा रॉकी माउंटेन न्यूज पर कभी ये आरोप नहीं लगा सकेगा कि उसने उनके हक के लिए जद्दोजहद छोड़ दी थीं...रॉकी के संपादकों का कहना है कि बेशक कई बार वो अपने झुकाव की वजह से जनहित में गलत भी साबित हुए लेकिन फिर भी ज्यादातर ऐसे मौके आए, जब अखबार और उसके रिपोर्टरों ने जो भी कदम उठाया, कोलोरैडो के हित में ही गया...

इस अखबार की मौत की खबर अखबार के लोगों को पहले ही मिल चुकी थी...जो भी अखबार से जुड़ा था, चपरासी से लेकर रिपोर्टर और एडिटर तक...सभी के लिए रॉकी माउंटेन न्यूज एक ऐसी संस्था थी, जिसके बगैर उनकी जिंदगी अधूरी थी...

कुछ लोग कहते हैं कि वो अखबारों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं... उन्हें दूसरे रास्तों से मिल रही सूचनाओं और खबरों की बाढ़ के बीच अब और ज्यादा अखबारों की जरूरत नहीं है... उनका ये भी कहना है कि वो खबरें खरीदें ही क्यों जब उन्हें वो मुफ्त में हासिल हैं...इन लोगों के लिए रॉकी के संपादकों का कहना था कि वो जनता के इन तर्कों को अच्छी तरह समझते हैं कि पिछले एक दशक में सूचना पाना कितना आसान और सस्ता हो गया है... और उन्होंने भी बतौर अखबार इसका फायदा उठाया है...जाहिर है अपनी खबरों के चुनाव और झुकाव में कोई अखबार गलती करता है और कर सकता है...लेकिन औसतन वो दूसरे माध्यमों जैसे टीवी के मुकाबले कम सेलेक्टिव और कम झुकाव रखने वाला होता है...और इस वक्त इस कमी को पूरा करने में कोई खबर माध्यम सक्षम नहीं है...

इस अखबार के संपादकों की असल चिंता है स्थानीय पत्रकारिता... और उसका भविष्य...उन्हें रॉकी की मौत का इतना दुख नहीं जितना 
rocky_news.jpgशहर की जिंदगी को दर्ज करने वाली एक संस्था के बंद होने का है...और पूरे अमेरिका में लोग स्थानीय अखबारों को बंद होता देख रहे हैं... लेकिन ये सवाल क्यों उठा रहे हैं... उनकी राय में एक अखबार जिस तरह मेहनत के साथ छोटे-छोटे स्कूलो, जिलों, शहर प्रशासन, पुलिस एजेंसियों और कानूनी सवालों पर लोगों की  नजर में लाता है... वो दूसरे माध्यमों के लिए अभी भी काफी मुश्किल है...क्योंकि अच्छी रिपोर्टिंग ही वो चीज है जिस पर स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र काम करता है...

रॉकी को बनाने में उसके रिपोर्टरों और संपादकों ने अपना खून और पसीना दोनों लगाए... बेहद प्रतिस्पर्धा में रॉकी पर जबर्दस्त अनिश्चितता हावी रही लेकिन रॉकी को चलाना कोई रहस्य या जादू नहीं था, ये सब जानते थे...लोग अखबारों की प्रतिस्पर्धा को तो समझते हैं लेकिन वो नहीं जानते कि दो अखबारों की दुश्मनी की गहराई कितनी और कैसी होती है...रॉकी ने डेनवर में अपने प्रतिद्वंद्वियों से कुछ ऐसे युद्ध लड़े, जिन्हें आज भी अमेरिकी अखबारों के सबसे जुझारू संघर्षों के बतौर याद किया जाता है...कई बार उसने अस्तित्व के संकट का सामना किया और हर बार वो विजयी होकर निकला...खुद को उसने फिर से तराशा, संवारा और फिर से पाठकों के हाथ में पहुंचा नए कलेवर के साथ...

अखबार में लगातार घाटा बढ़ रहा था... जो 2008 में 1 अरब 50 करोड़ रुपए तक पहुंच गया... क्लासीफाइड रेवेन्यू लगातार घटती गई...पिछले एक दशक से सर्कुलेशन भी कम हो रहा था क्योंकि लोगों की आदतें बदल रही थीं...2007 में कोलोरैडो से ज्यादा सिर्फ 8 ऐसे राज्य थे जहाँ अखबारों का सर्कुलेशन ज्यादा दर्ज किया गया...खास बात ये थी कि डेढ़ सौ साल पहले जिन चीजों की वजह से रॉकी माउंटेन न्यूज में उसके मालिक विलियम बायर्स ने जान फूंकी थी, वही चीजें अब उसकी मौत की वजह बन गईं...

सब जानते हैं कि ये बुरा दौर है... बहुत से उद्योग बंद हो रहे हैं.. ऐसे वक्त में हम आपको बता दें कि अखबार बंद नहीं होते... वो बस मर जाते हैं.. दुनिया बाकी व्यवसायों के बगैर काम चला लेती है...लेकिन लोगों के जीवन को दर्ज करने वालों की जरूरत हर दिन होती है...यूं तो हर बिजनेस हाउस के पास तिमाही दर तिमाही अपनी कामयाबी दिखाने का मौका होता है लेकिन एक अखबार की कामयाबी का पैमाना होती हैं उसकी स्टोरीज, उसकी खबरें... हालांकि अखबार के पास इतिहास दर्ज करने के लिए इतिहासकारों जैसा नहीं होती... वो आपका भोगा हुआ इतिहास तुरंत आप तक पहुंचा देते हैं...चूंकि कोई भी अखबार कभी गलती मुक्त या परफेक्ट नहीं होता, लेकिन ये अखबार ही होता है जो हमेशा सही होने की कोशिश करता रहता है...इसके बावजूद कि उसे सही होने में 24 घंटे लगते हैं...

पाठक और रॉकी के विरोधियों दोनों को ही रॉकी की कमी खलेगी और बुरी तरह सालेगी...डेनवर शहर को अब सिर्फ एक अखबार से काम चलाना होगा, 100 साल में पहली बार...
(hindimedia.in पर 7 मार्च 2009 को प्रकाशित)

3/3/09

संतोषमय कष्ट के शहर में आपका स्वागत है!


धारावी जरायमपेशा है, धारावी सैलानियों की आंखों की किरकिरी है और धारावी गंदा है...अगर आपसिर्फ इन तीन बातों में यकीन रखते हैं तो इसे न पढ़ें...क्योंकि  धारावी के लिए इससे ज्यादा अपमानजनक और कुछ नहीं हो सकता...

सायन, माहीम और माटुंगा रेलवे स्टेशनों के बीच 100 बस्तियों का करीब 520 एकड़ का इलाका...जिन्होंने कभी धारावी में पैर नहीं रखाउन्हें ये टिन शेड्स के टैंटों का कबाड़खाना ही लगेगा...धारावी है भी मुंबई का छाया शहर...इस ग्रह की कुछ सबसे बुरी मलिन बस्तियों में एक...जहां एक वर्ग किलोमीटर में करीब 6 लाख जिंदा लोग रहते हों...उसे आप महानगरीय नर्क कहें या अछूत, कोई फर्क नहीं पड़ता...क्योंकि धारावी है और रहेगा...लेकिन इस संतोषमय कष्ट के शहर में आपका स्वागत है...

धारावी के ठीक उत्तरी तरफ है वो मुंबई जिसे आप भारत की आर्थिक राजधानी के बतौर जानते हैं...एक दूसरे के उलट दो सच्चाइयां...बस्ती से गुजरने वाले दो मीटर चौड़े दो पाइप दिन में बस दो घंटे पानी देते हैं...हर पंद्रह सौ इंसानों के लिए एक टॉयलेट....सड़क के दोनों तरफ बने फीकल लैटरीन...हर तीन मिनट पर धारावी की धमनियों से लोकल ट्रेनें गुजरते गुए उसमें जिंदगी फूंकती रहती हैं...

एशिया की दूसरी सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी की ये वो खूबियां हैं...जो आंकड़े बयान करते हैं...पर क्या आपको पता है कि लाखों जिंदगियों से भरपूर इस इलाके में दुनिया की बढ़ती शहरी आबादी को लंबे समय तक जिंदा रखने के तमाम पर्यावरणीय और सामाजिक गुण मौजूद हैं...धारावी को बाहरी दुनिया से कुछ नहीं चाहिए...पूरे धारावी में वहीं बनी चीजें इस्तेमाल होती हैं...अवैध ही सही पर 10 हजार से ज्यादा स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज करीब 10 लाख लोगों का पेट भरती हैं...प्लास्टिक, लकड़ी, पॉटरी, जींस और चमड़े के सामान से धारावी की सालाना कमाई होती है 665 मिलियन डॉलर...अगर प्रिंस चा‌र्ल्स कहते हैं कि धारावी मॉडल ज्यादा वक्त चलेंगे और ऐसी परंपरागत सामाजिक सिस्टम हमारे वक्त की क्रूर और असंवेदनशील व्यवस्था से कहीं ज्यादा अच्छी हैं...तो वो शायद गलत नहीं कह रहे...

इसी धारावी की एक और तस्वीर है जिसे अब ब्रिटिश कंपनियां विदेशियों को दिखाती हैं अपने छोटे-छोटे टुअर के जरिए...पुअरिज्म के नाम से...6.75 डॉलर देकर विदेशी एसी कार में बैठकर इस नर्क का दर्शन करते हैं...स्लमडॉग मिलियॉनेयर पर तूफान उठाने वालों की नजर अभी इस तरफ नहीं पड़ी है...


धारावी में घुसते ही आपके सामने होती है बमुश्किल एक मीटर चौड़ी गली...लेकिन अगर आप हिंदुस्तानी हैं तो वहां की जिंदगी से लबरेज रिदम से तुरंत वाकिफ हो जाएंगे...किसी चॉल से निकलते भक्ति संगीत के साथ-साथ पड़ोस की मस्जिद से अजान की आवाज दोनों सुनाई देंगी...आसपास स्कूल और पूरी यूनीफॉर्म में बच्चे...एक तरफ यहां पुराने कंप्यूटरों के कीबोर्ड तोड़फोड़ कर उनके कलपुर्जे अलग-अलग करते लोग मिल जाएंगे तो दूसरी तरफ बॉलपेन की नीली स्याही के बर्तनों पर काम करते कामगार...पॉलिएस्टर रेजिन के स्टील ड्रमों में कुछ बनाते कामगार दिखेंगे...इनमें से चंद के ही हाथों में दस्ताने होंगे...इंसान के जिस्म से निकली गंदगी से भरे गटर के पास आपको बच्चे खेलते मिल जाएंगे...घरों से दिखेगा उठता हुआ काला धुआं, गलियों के बीचोंबीच फैक्ट्रियों का गंदा पानी और पिघला हुआ वेस्ट...

धारावी के ज्यादातर लोगों के लिए अपना टॉयलेट होना एक सपने जैसा ही होता है...क्योंकि ब्रहन्नमुंबई महानगरपालिका समझती है कि इतनी बड़ी आबादी में सभी के लिए अलग-अलग टॉयलेट बनाकर देना पानी की बर्बादी है...पानी के लिए मारामारी है...औसतन दो किलोमीटर दूर से लाइनों में खड़े होकर पानी भरती महिलाएं दिखेंगी ताकि चॉल में चूल्हा-बासन कर सकें...इसके लिए भी उन्हें गुंडों को हफ्ता देना होता है...धारावी का कामकाज अक्सर लैंड माफिया और गुंडों के कंधों पर ही चल पाता है...बात चाहे पानी की हो या बिजली की...वही मुहैया कराते हैं...प्रशासन के पास धारावी के लिए कुछ नहीं है...

ब्रिटिश पीरियड में गुजरात और महाराष्ट्र की निचली मानी जाने वाली जातियों से बसा धारावी बाद में मुंबई की मिलों की बंदी के बाद बेरोजगार हुए कारीगरों, उत्तर प्रदेश, बिहार से गए लोगों, टैक्सी ड्राइवरों से बसा...

सवाल ये है कि एशिया के दूसरे सबसे बड़े स्लम का तमगा धारावी के लिए फख्र की बात है या शर्म की...अगर आप धारावी में एक दिन बिताएं तो शायद आपको लगे कि दोनों ही सच हैं...एक साथ सबकुछ घट रहा है...एक जिंदादिल शहर का सक्रिय स्लम...धारावी आलसियों, खुदगर्ज और दिन भर रोते रहने वालों को पसंद नहीं करता...सिर्फ कड़ी जद्दोजहद ही यहां बचा सकती है...एक ताकत यहां हरदम काम करती रहती है जो आपको मजबूर करती है कि आप क्या हो सकते हैं... कदम कदम पर धड़कती जिंदगी...अपनी तमाम दुश्वारियों के बावजूद...

धारावी शर्म भी है...60 साल के बुड्ढे और आजाद देश के लिए...धारावी में रफ्तार कायम रखने को मजबूर हिंदुस्तान की कुछ बेहद गंदी बुराइयां भी शामिल हैं...बेवकूफाना कानूनी नुक्तों, गलत-सलत नीतियों और गंदे राजनेताओं के मिश्रण का एक जीता-जागता नमूना है ये...दरअसल धारावी आपको उसतरफ देखने को मजबूर करता है जो भारत को पीछे खींच रहा है...दुनिया के लिए उसका रुख और वोचीजें जो हम बाहर वालों से छिपाना चाहते हैं...धारावी को देखकर आप समझ सकते हैं कि हिंदुस्तान क्या हो सकता है...ही वो जगह भी है जहां हर एक वर्ग मीटर जमीन का खाली हिस्सा तरक्की के एक मौके को जन्म देता है और यही वो जगह भी है जहां बिहार के किसी बेहद दूरदराज के गांव सेआया बच्चा सॉफ्टवेयर की पढ़ाई पढ़ता मिलता है...कहीं ये हिंदुस्तान का भविष्य तो नहीं...जिसे आप अभी देखना-दिखाना नहीं चाहते...

हॉलीवुड को धारावी पसंद आई है...उसे स्लमडॉग पसंद आया है...लेकिन ये उसका अपराध नहीं है...इस फिल्म ने तो उसकी समझ बढ़ाई हैओह! ऐसा भी हो सकता है...हिंदुस्तान अगर सॉफ्टवेयर जीनियस देता है, तो वही स्लमडॉग भी पैदा करता है...बेशक स्लमडॉग मिलियॉनेयर गरीबी की बात करती है...गरीबी को नंगेपन के साथ उजागर करती है...जाहिर है ये फीलगुड फिल्म नहीं है...जिसकी हम हमेशा से उम्मीद करते आए हैं...ये फिल्म बेचैन करती है...मुंबई का छाया शहर धारावी भी बेचैन करने वाला शहर है...(सभी तस्वीरें:अयान खासनबीस)

1/3/09

स्लमडॉग की पिटाई की जांच न कराएं रेणुकाजी...

आदरणीय रेणुका जी, 
मुझे बहुत अच्छा लगा कि आपने स्लमडॉग अजहर की पिटाई की जांच कराने का कदम उठाने का फैसला किया है...ये वाकई कोई बेहद संवेदनशील मनुष्य ही कर सकता था...

पर आपकी और ज्यादा प्रशंसा से पहले कुछ सवाल करना चाहता हूं... रिपोर्टर की आदत है न छूटती नहीं... क्या आपको पता है कि इस देश में स्लमडॉग रोज पिटते हैं... ढाबों पर, चाय के खोखों में, आपके घर में काम ठीक से न करने पर, चौराहों पर ऑटो गैराज में...और आप इसे नहीं रोक सकतीं... आप आज तक नहीं रोक पाए... जी हां, आप स्लमडॉग को पिटने से नहीं रोक सकतीं रेणुका जी...

माफी चाहूंगा, अगर कुछ ऐसे सवाल कर लूं, जिन्हें सुनने पर आपको बुरा लगे... मेरा पहला सवाल ये है कि क्या इस स्लमडॉग का पिटना आपको बुरा लगा... क्या ये स्लमडॉग कुछ खास है... क्योंकि उसने एक ऐसी फिल्म में काम किया है जिसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी है... क्या ये स्लमडॉग ऑस्कर विनर है... इसलिए आपको बुरा लग रहा है...क्योंकि स्लमडॉग तो रोज ही पिटते हैं जिनकी चीखें आप तक नहीं पहुंचतीं... जब राजपथ से आपकी गाड़ी गुजर रही होती है और रेडलाइट पर किताबें या खिलौने, हिंदुस्तान का झंडा बेचने वाला एक स्लमडॉग आपकी गाड़ी के शीशों को हाथ लगाता है, तो आप घृणा से मुंह फेर लेती हैं...हालांकि शायद ही आपको पता हो कि वो कुछ ही देर पहले पिटकर आया होता है... लेकिन आपको उस स्लमडॉग की पिटाई नहीं कचोटती... क्यों?

स्लमडॉग अजहरुद्दीन की पिटाई तो उसके ही बाप ने की है... लेकिन जिन स्लमडॉग्स को आप और हम रोज देखते हैं, उन्हें पीटने वाले उन्हें जन्म देने वाले नहीं, उनका बचपन छीनने वाले होते हैं...क्या उन स्लमडॉग्स को आप स्लमडॉग नहीं मानतीं? 

क्या किसी स्लमडॉग का धारावी स्लम में जाकर रहना ही जरूरी है... क्या दिल्ली या दूसरे किसी शहर के स्लम में पिट रहे अजहर को ऑस्कर अर्जित करने वाली फिल्म में काम करना जरूरी है... तभी उसे पिटने से बचाया जा सकता है... क्या सरकारी ओहदेदारों की नजर में वो अभी स्लमडॉग की श्रेणी में नहीं हैं?

मेरा अगला सवाल ये है कि क्या दिल्ली, आगरा, बैंगलोर, नोएडा और मुंबई में भी धारावी से बाहर किसी स्लमडॉग के साथ कुत्ते का सुलूक नहीं हो रहा है... आप पूरी तरह सुनिश्चित हैं?

क्या इन स्लमडॉग्स के साथ हो रहे सुलूक के खिलाफ आपने और आपकी सरकार ने सारे जरूरी कदम उठा लिए हैं और सिर्फ अजहर का मामला ही बचा है जिसे राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग जांच करने जा रहा है...?

एक और जरूरी सवाल कि क्या फिजिकल यानी शारीरिक मारपीट ही स्लमडॉग के अधिकारों का उत्पीड़न कहा जा सकता है... क्या इन स्लमडॉग्स के दिलो-दिमाग को चीरकर रख देने वाली गाली-गुफ्तार करने वाले माफ किए जा सकते हैं... क्योंकि उन्होंने उनका शारीरिक उत्पीड़न नहीं किया है?

रेणुका जी, आप बेहतर जानती हैं कि देश में कितने स्लमडॉग हैं और उनके साथ क्या सुलूक हो रहा है... लेकिन शायद ही किसी की तवज्जो उधर जाती हो... भई और भी जरूरी काम हैं...बचपन का ठेका ले रखा है क्या सरकार ने... मैं समझता हूं रेणुका जी

तो फिर इस स्लमडॉग पर कैसे नजर पड़ गई आपकी... क्या इसलिए कि वो इस वक्त मीडिया कंपास में है और आप भी इस मौके को नहीं चूकना चाहतीं...क्रुसेडर की अपनी छवि को और चमकाने का इससे बढ़िया और क्या मौका हो सकता है...हां, मैं समझता हूं...इसमें सदाशयता इतनी नहीं जितनी स्लमडॉग के साथ नाम जोड़ने की तमन्ना है... और जनता इसे जानती है...

लेकिन इसमें आपकी गलती नहीं है...अब बच्चों के चाचा नेहरू तो हैं नहीं जो उनके लिए संवेदनशीलता दिखाएंगे... दीयासलाई के कारखानों, होटलों-ढाबों और ऑटो गैराजों में जिंदगी खर्च रहे स्लमडॉग का अब इस देश में कोई नहीं है...सरकार के पास इतनी संवेदनशीलता बची नहीं कि वो अपने चुनावी गणित से ही बाहर आ सके...

मगर मेरा एक सुझाव है, कृपया आप स्लमडॉग अजहर की पिटाई की जांच-वांच न कराएं... इतना भी कष्ट न उठाएं क्योंकि इससे आपकी छवि खराब होगी...हां बयान जरूर देती रहें...ताकि देशवासी आपको समाज सुधारक के बतौर जानते रहें...स्लमडॉग तो पिटते रहते हैं, पिटते रहेंगे...

इस चुनाव में आपकी फतेह का आकांक्षी
खाली दिमाग

28/2/09

बांग्लादेश: जम्हूरियत को लगी नजर

सारी दुनिया पिछले तीन दिन से बांग्लादेश राइफल्स के विद्रोह की तस्वीरें और ढाका में चल रही हलचल को देख रही है... लेकिन अभी तक पूरी तरह साफ नहीं कि आखिर वो क्या बात थी जिसने बांग्लादेश राइफल्स में इतने बड़े विद्रोह को हवा दे दी...क्या ये सिर्फ बांग्लादेश का आंतरिक मामला है... और क्या वास्तव में विद्रोह खत्म हो चुका है... ये कुछ सवाल हैं जिनसे दक्षिण एशियाई थिंक टैंक दोचार है... बांग्लादेश आर्मी बेशक सरकारी नियंत्रण में रही है, लेकिन बांग्लादेश राइफल्स ने 1971 से ही अपनी पहचान बनाए रखने पर जोर दिया है... वो सेना के साथ कभी नहीं मिली... इसके पीछे है एक लंबा इतिहास... हालांकि बांग्लादेश राइफल्स में समय-समय पर सेना के ही अफसर नियुक्त होते रहे हैं...

ईस्ट इंडिया कंपनी की फ्रंटियर प्रोटेक्शन फोर्स का नाम 1795 में रामगढ़ लोकल बटालियन पड़ा...1861 में इसे फिर से गठित कर नाम दिया गया फ्रंटियर गार्ड्स, 1891 में इन्हें नया नाम मिला बंगाल मिलिट्री पुलिस और 1920 में ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स और 1947 में ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स... इसके बाद 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के साथ ही इन्हें वो नाम मिला जो आज तक इनके साथ है...  

सेना और बीडीआर दोनों में काफी वक्त से वेतन, काम करने की परिस्थितियों, रैंक, लाभों और करियर में मौकों को लेकर ऊंच-नीच रहा है... बीडीआर अफसरों काफी वक्त से इसे लेकर गुस्से में हैं... बीडीआर जवानों ने कई बार अपनी मांगें रखी भीं, लेकिन उन्हें अनसुना कर दिया गया... डायरेक्टर जनरल ने प्रधानमंत्री के सामने उनकी मांगें रखने का वायदा भी किया लेकिन जब प्रधानमंत्री शेख हसीना बीडीआर के कार्यक्रम में गईं तो डायरेक्टर जनरल अपना वायदा भूल गए... पूरी रात बीडीआर जवानों को नींद नहीं आई... अगली सुबह सभी 168 सेक्टर कमांडर दरबार हॉल में इकट्ठे थे...तभी वहां बीडीआर जवानों और उनके अफसरों में जमकर तकरार हुई... कहा जाता है कि इसी दौरान खुद एक ऑफिसर ने अपनी रायफल से फायर झोंक दिया... और इसके बाद तो जैसे ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका रख दिया गया...गुस्साए बीडीआर जवानों ने कैंटोनमेंट एरिया में निकलकर एक के बाद एक अफसरों को भूनना शुरू कर दिया...विद्रोह के 10 मिनट में ही डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल शकील अहमद को गोलियों से छलनी कर दिया गया...जो रास्ते में आया बीडीआर जवानों ने गोलियां दाग दीं... खबरें यहां तक हैं कि खुद बीडीआर चीफ ने एक जवान के साथ नोकझोंक के बाद अपनी बंदूक निकाली और उस पर फायर कर दिया... इसके बाद हालात बिगड़ गए.. बीडीआर जवानों ने मीडिया के सामने झूठ भी बोला और सिर्फ एक अफसर की मौत का खुलासा किया था...जबकि तब तक वो करीब 70 अफसरों को मौत के घाट उतार चुके थे...यही नहीं जिन्हें गोली मारी गईं, उन्हें संगीनें भी घुसाकर उनके जिस्म क्षतविक्षत कर दिए गए...बंधक बनाए गए कुछ अफसरों ने क्रूरता के जो हालात बयान किए हैं... उनसे इस विद्रोह के स्केल का पता चलता है... बीडीआर में कैप्टन रैंक से ऊपर के सारे अफसर मारे जा चुके हैं... 

हालात को देखें तो तय है कि ये सिर्फ अचानक हुआ विद्रोह नहीं है... लेकिन क्या एक लोकतंत्र में जवानों की परेशानियों की इस कदर अनदेखी करना ठीक है कि वो अपने ही लोगों के खिलाफ विद्रोह पर उतर आएं...शायद शुद शेख हसीना सरकार को भी इसका इल्म न था कि ऐसा हो जाएगा... इसका पता इस बात से भी चलता है कि तुरंत सरकार ने विद्रोही बीडीआर जवानों के सामने घुटने टेक दिए और उन्हें आम माफी की घोषणा कर दी... 

बहुत से सवाल हैं और उनके जवाब कोई नहीं... आखिर विद्रोह क्या वेतन-भत्तों की मांग को लेकर हुआ... या फिर इसके पीछे कोई सोची समझी तैयारी थी... बांग्लादेश की इंटेलीजेंस एजेंसी तब क्या कर रही थीं... अपने अफसरों को इतनी बड़ी तादाद में मौत के घाट उतारने वाले जवानों को तुरंत आम माफी कैसे देने का ऐलान कर दिया गया.. क्या शेख हसीना सरकार का उनके साथ कोई समझौता हुआ है... विद्रोह के पहले राउंड में मीडिया के सामने बीडीआर ने आत्मसमर्पण का जो ऐलान किया था क्या वो महज सहानुभूति हासिल करने का तरीका था... क्या ये सच है कि जवानों और उनकी महिलाओं के साथ भी अफसर बुरा बर्ताव करते रहे हैं...बांग्लादेश सरकार ने पहले राउंड में विद्रोह के दौरान ही बंधकों को छुड़ाना अपनी प्राथमिकता नहीं समझी, क्यों... क्या बीडीआर के डीजी ने ही खुद सबसे पहले फायर किया था...  

खूनी विद्रोह डेढ़ अरब आबादी वाले भुखमरी से जूझते बांग्लादेश की राजनीति का एक हिस्सा रहे हैं... 1971 में ये देश खुद एक विद्रोह से जन्मा, जब बांग्ला बोलने वाले पूर्वी पाकिस्तानियों ने पाकिस्तान से अपना नाता तोड़ने का ऐलान कर दिया... 1982 में आर्मी चीफ लै जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद ने सैनिक तख्तापलट में सत्ता हथिया ली और 1990 में लोकतंत्र की वापसी तक काबिज रहा...2007 में एक बार फिर सेना सड़कों पर उतरी, जब देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के बीच आपसी संघर्ष ने सैकड़ों-हजारों को तबाह कर दिया... दो साल बाद फिर से लोकतंत्र की वापसी हुई है लेकिन पुरानी आग अभी भी धधक रही है... इस बार बीडीआर ने विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया है... तो क्या ये बांग्लादेश में एक बार फिर लोकतंत्र के अंत का संकेत है...

नदी

क्या नदी बहती है  या समय का है प्रवाह हममें से होकर  या नदी स्थिर है  पर हमारा मन  खिसक रहा है  क्या नदी और समय वहीं हैं  उस क्षैतिज रेखा पर...