25/2/11

मिलिटेंट इस्लाम को चुनौती!

मिस्री क्रांति का मतलब है मुस्लिम ब्रदरहुड की ताकत में इज़ाफ़ा जो मध्यपूर्व में अल कायदा के लिए मुसीबत का सबब होने वाला है..
18 दिन की जद्दोजहद के बाद तहरीर स्क्वेयर पर एक तहरीर लिखी गई- मुबारक के रुख़्सतनामे की। ट्यूनीशिया में एक बेरोजगार की ख़ुदकुशी ने राष्ट्रपति ज़िने अल आबेदीन बेन अली को इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें 14 जनवरी को गद्दी छोड़नी पड़ी। ट्यूनीशिया में 23 साल की तानाशाही का अंत मिस्री अवाम को इतनी ताकत दे गया कि राष्ट्रपति होसनी मुबारक को 30 साल की हुकूमत को बेमन से ही सही, अलविदा कहना पड़ा।

अरब मुमालिक में मिस्र का ढहना पूरे अरब में लोकतंत्र के नाम पर चल रही राजशाहियों के लिए ख़तरे की घंटी है। नई दुनिया में और वो भी अरब में जम्हूरी तौर-तरीकों के ज़रिये तख़्तापलट ताज्जुब से कम नहीं, लेकिन यही हक़ीक़त है। सवाल ये है कि दुनिया के लिए मिस्री बग़ावत के मतलब क्या हैं। एक तो यह कि खून बहाए बिना भी अवाम हक की आवाज बुलंद कर सकती है और अगर चाहे तो टैंकों की नालें झंडे फहराने के काम में लाई जा सकती हैं। दूसरे, अब बम और गोलियां नहीं, फेसबुक, ट्विटर और सोशल नेटवर्किंग इन्किलाब का हथियार हैं। तीसरे, अरब दुनिया में बैठे तानाशाह अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं। चौथे, अब अमेरिका को अरबों का दिल जीतने में एक सदी लग जाएगी। पांचवें, पैट्रो डॉलर की सियासत और कारोबार अब अमेरिका तय नहीं कर पाएगा। छठे, अरब दुनिया में लोकतंत्र की बुनियाद राजनीतिक इस्लाम के साथ डाली जाएगी। सातवेंअरब का सबसे पुराना सियासी संगठन अल इख्वान अल मुस्लिमीन यानी मुस्लिम ब्रदरहुड पूरी ताकत के साथ खड़ा होगा और आठवीं अहम बात, अल कायदा के मिलिटेंट इस्लाम को चुनौती देगा ख़ुद अल क़ायदा का मादरेवतन, उसकी अपनी ज़मीन।

अगर मिस्री बग़ावत को पेशेनज़र रखें तो इसकी शुरुआत महज़ एक इंटरनेट बिगुल से हुई थी, जो बाद में काहिरा, इस्कंदरिया और स्वेज से आगे बढ़कर पूरे मिस्र में बजने लगा। काहिरा की तहरीर स्क्वेयर इसका सेंटरस्टेज बनी, जिस पर लड़ी गई 18 दिन की जंग ने मुबारक से उनका ताज छीन लिया। मगर, असल में तहरीर की जंग में अवाम के साथ था एक ऐसा संगठन जिसे 30 साल से मुबारक ने दबा-कुचल रखा था। ये है- अल इख्वान अल मुस्लिमीन यानी मुस्लिम ब्रदरहुड। इख्वान ने पर्दे के पीछे रहकर मिस्री अवाम को हौसला दिया और एक प्लेटफॉर्म पर खड़े होने की ताकत दी। यहां तक कि वह वक्त भी आया जब होसनी मुबारक ने अपनी गद्दी बचाने की आखिरी कोशिश में अल इख्वान अल मुस्लिमीन को बातचीत की टेबल पर बुलाया। मगर तब तक देर हो चुकी थी।

होसनी मुबारक की हुकूमत ने मुल्क को निचोड़कर रख दिया था। मिडिल ईस्ट में अमन का वास्ता देकर वह शाहों की तरह बर्ताव करता रहा। लेकिन मुस्लिम ब्रदरहुड का दामन भी पाक नहीं था। उस पर एक प्रधानमंत्री और एक राष्ट्रपति के खून का दाग़ था। राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या के बाद मुबारक ने सत्ता हासिल की और आते ही पहला काम किया मुस्लिम ब्रदरहुड पर पाबंदी। इख्वान से जुड़ा शख्स जब और जहां मिला, कैद में डाल दिया गया। बहुतों का सफाया कर दिया गया और बड़ी तादाद में ब्रदर्स मिस्र छोड़कर भाग गए। कुछ अंडरग्राउंड हो गए। 30 साल बाद वो होसनी मुबारक को चुनौती देने के लिए फिर पूरी ताकत से उठे और उन्हें साथ मिला आम मिस्री का। दोनों का मकसद एक था और दुश्मन एक।

1928 में एक एलीमेंट्री टीचर हसन अल बन्ना के दिमाग की उपज था अल इख्वान अल मुस्लिमीन। खिलाफत के खात्मे के बाद पैदा हुए निर्वात को भरने के लिए ऐसे निज़ाम की ज़रूरत थी- जो पूरी दुनिया के मुसलमानों को एक झंडे के नीचे खड़ा कर सके और खलीफा जैसी मरकज़ी ताकत और अहमियत हासिल कर सके। मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा था- इस्लाम इज़ सॉल्यूशन.. यानी इस्लाम ही अकेला हल है। अल इख्वान को मुसलमानों की मज़हबी, समाजी और सियासी जरूरतों के लिए लाइटहाउस के बतौर देखा गया। जिसकी चाहत थी दुनिया में सुन्ना और शरिया का राज। सिर्फ 20 साल में ही मुस्लिम ब्रदरहुड पूरे मध्यपूर्व में फैल गया। ये कोई संगठन नहीं बल्कि एक आंदोलन था। मज़हब और एजुकेशन के साथ-साथ सियासत में भी उन्होंने पैठ बना ली।

मिस्र पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अल इख्वान ने जंग छेड़ दी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इनके संबंध नाज़ियों से भी रहे, जिसका पता काफी दस्तावेज़ों से चलता है। यहां तक कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने हिटलर की आत्मकथा का अरबी में तर्जुमा कर बंटवाया था जिसने यहूदियों और पश्चिमी दुनिया के देशों के खिलाफ मुसलमानों के मन में ज़हर भरने का काम किया 1948 में अरब-इज़रायल युद्ध में हार से भी अल इख्वान तिलमिला गया। उसने मिस्री सरकार पर आरोप लगाया कि वो इज़रायल से हाथ मिला चुकी है। खुद मुस्लिम ब्रदरहुड ने इज़रायल के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया और पूरे मिस्र में दहशतगर्दी कायम कर दी। मिस्री सरकार ने अल इख्वान पर पाबंदी लगा दी। दिसंबर 1948 में मिस्री प्रधानमंत्री महमूद फहमी नूकराशी की हत्या कर दी गई। फिर खुद इख्वान का जन्मदाता बन्ना 1949 में सरकारी एजेंट्स के हाथों मारा गया। अपने जन्म के वक्त हिंसा के खिलाफ रहे अल इख्वान अल मुस्लिमीन के जन्मदाता की मौत ख़ुद गोली से हुई।

मिस्र में 1952 की क्रांति के बाद नासिर ने सत्ता हाथ में ली। मुस्लिम ब्रदरहुड ने इस क्रांति का समर्थन किया क्योंकि उसे लगा कि राजशाही ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पिट्ठू थी। मुस्लिम ब्रदरहुड को यकीन था कि अब मिस्र में इस्लामी राज कायम होगा.. लेकिन राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर ने साफ इनकार कर दिया। इसके बाद 1954 में नासिर की हत्या की कोशिश की गई। नतीजतन 1954 से लेकर 1970 तक नासिर सरकार ने मुस्लिम ब्रदरहुड को पूरी तरह बिखेर दिया। इसके सदस्यों के खिलाफ बाकायदा दमन का सिलसिला चला। फांसी और गिरफ्तारियों के दौरान बहुत से ब्रदरहुड सदस्य जॉर्डन, सीरिया, सऊदी अरब और लेबनन भाग गए। नासिरी दमनचक्र में सैयद कुत्ब भी गिरफ्तार हुआ, जो अल इख्वान के अख़बार का संपादक था। जेल में रहते हुए कुत्ब ने मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए इंटेलेक्चुअल आधार तैयार किया- 30 खंडों में कुरान पर कमेंट्री फी ज़िलाल अल कुरान और माइलस्टोंस यानी मआलिम फी अल तारीक। कुत्ब को इराक के प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की वजह से रिहा कर दिया गया लेकिन अपनी किताब माइलस्टोंस की वजह से उसके खिलाफ फिर मुकदमा दर्ज हुआ और उसे मौत की सजा सुना दी गई। माइलस्टोंस वो किताब है जिसमें नासिर सरकार को इस्लामी चरमपंथ की बू रही थी।

नासिर के बाद अनवर अल सादात ने मिस्र की हुकूमत संभाली और शरिया लागू करने का आश्वासन देकर मुस्लिम ब्रदरहुड सदस्यों को रिहा कर दिया। मगर अनवर अल सादात के साथ अल इख्वान अल मुस्लिमीन के रिश्ते बार-बार बन-बिगड़ रहे थे क्योंकि 1979 में सादात ने इजरायल के साथ अमन का करार कर लिया। अल इख्वान अल मुस्लिमीन का भरोसा डोल गया और 1981 में अनवर अल सादात की हत्या कर दी गई।

इख्वान अल मुस्लिमीन का मकसद कभी उसकी आंखों से ओझल नहीं हुआ। जरूरत के मुताबिक वो दहशतगर्दी को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा। साथ-साथ मिस्र की सियासी ज़मीन पर वह अपने लिए मक़बूलियत तैयार करता रहा। जब होसनी मुबारक ने मुल्क की बागडोर संभाली तो मुस्लिम ब्रदरहुड को उनसे कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गई थी।
मुबारक के सत्ता संभालते ही अल इख्वान ने सियासत के गलियारों में पहुंचने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। चूंकि मिस्र में धार्मिक पार्टियों के चुनाव लड़ने पर रोक है इसलिए उसने निर्दलीयों के बतौर पार्लियामेंट में जगह बनाई। जाहिर है इस ऐसे में ब्रदरहुड को संसदीय सुरक्षा हासिल हो गई और मीडिया तक उनकी पहुंच आसान हो गई। तकनीकी तौर पर पाबंद होने के बावजूद अल इख्वान अल मुस्लिमीन संसद में एक ताकत बनकर होसनी मुबारक के सामने खड़ा हो गया। इस वजह से सरकार कभी उससे निपटने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकी। 2005 के चुनावों में उनकी ताकत देखकर खुद मुबारक सरकार इतना चौंकी कि उसने उनके खिलाफ दमन का नया चक्र चला दिया क्योंकि ब्रदरहुड ने देश की पार्लियामेंट में 20 फीसदी जगह हासिल कर ली थी।

मुस्लिम ब्रदरहुड से डरने की जरूरत!
दुनियाभर में लाखों समर्थकों और हमदर्दों को समेटे इख्वान अमेरिका को दूसरे शिया ईरान की तरह डराता है। अमेरिकी नीति निर्माताओं और सियासी जानकारों ने मिस्री क्रांति के पीछे लोकतंत्र विरोधी ताकतों के हाथ होने की भविष्यवाणी की थी। उनका कहना था कि मिस्र में थियोक्रेसी यानी धर्मराज्य दूर नहीं है। फिलहाल अल इख्वान अल मुस्लिमीन ने सत्ता में भागीदारी से इनकार किया है लेकिन मध्यपूर्व में सत्ता संतुलन कायम रखने वाले अमेरिका के सामने सवाल है कि वो ऐसी लोकतांत्रिक क्रांति को कैसे देखे जिसके पीछे थियोक्रेसी के हिमायती मुस्लिम ब्रदरहुड का हाथ रहा है।

हालांकि घरेलू और विदेश नीतियों को लेकर इख्वान की पोजीशन काफी हद तक जायज़ है। मुस्लिम ब्रदरहुड ने भी पिछले कुछ वक्त से अपने ऐतिहासिक नज़रिए से पीछा छुड़ाने की कोशिश की है। एक वक्त था जब इख्वान के नेता ततबीक-अल-शरिया यानी शरिया लागू करने की वकालत करते रहते थे। लेकिन आज उनकी शब्दावली बदल गई है। अब वो थियोक्रेसी नहीं बल्कि इस्लामिक आदर्शों की रोशनी में खड़े होने वाले नागरिक और लोकतांत्रिक राज्य के समर्थक बन चुके हैं।

ये भी सच है कि ब्रदरहुड कभी भी उदारवादी नहीं होगा। अल इख्वान अल मुस्लिमीन का नजरिया काफी हद तक ऐसा है, जिससे अमेरिका ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों को परेशानी महसूस होती है। चाहे वो औरतों के हक की बात हो या लिंगभेद की। हालांकि अमेरिकी दिक्कत सिर्फ ये सोच नहीं है बल्कि ये है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका की सैन्य सोच कमज़ोर पड़ जाएगी। सवाल ये है कि क्या मुस्लिम ब्रदरहुड अमेरिका के क्षेत्रीय हितों के खिलाफ काम करेगा। क्या मिस्र और इज़रायल के बीच चला रहा अमन का करार उलट जाएगा। क्या अल इख्वान अल मुस्लिमीन को अपने सियासी स्टैंड की कीमत पर मिस्र को मिल रहे बिलियंस डॉलरों का नुकसान मंज़ूर है।

मिस्र में जम्हूरियत की तस्वीर अभी साफ नहीं है और इसकी कोई गारंटी भी नहीं। क्योंकि मिस्र में अल इख्वान अल मुस्लिमीन को दरकिनार कर जम्हूरियत की बात सोचना मुमकिन नहीं। वैसे भी अरब दुनिया में जम्हूरियत और सियासी इस्लाम एक दूसरे में गुंथे सवाल हैं। दोनों जुदा नहीं किए जाते और किए जा सकते हैं। मिस्र में बनने वाली कोई भी सरकार, जिसमें इस्लामिस्ट नहीं हैं मिस्रियों की नुमाइंदगी नहीं करेगी और उनकी नज़र में ग़ैरक़ानूनी होगी। दूसरी तरफ मिस्र को एकजुट रखने के काम में मुस्लिम ब्रदरहुड का रोल कितना है, वह साबित कर चुका है।

अल-कायदा को फायदा या नुकसान?
तहरीर स्क्वेयर में मिस्रियों की बहादुरी से भरी तस्वीरें ओसामा के लिए ख़तरे का सबब हैं तो मौका भी हैं। अल कायदा के दिल में मिस्र की खास जगह रही है क्योंकि उसके कई मास्टरमाइंड उसे इसी ज़मीन से मिले हैं। इनमें से कई ने ओसामा की टीम में जगह पाने से पहले मुबारक की हुकूमत से दो-दो हाथ किए हैं। बिन लादेन का दाहिना हाथ आयमन अल जवाहिरी इस्लामिक ग्रुप के साथ साथ ईजिप्शियन इस्लामिक जिहाद जैसे ऑर्गनाइज़ेशन इसी जमीन से चलाता रहा है। जवाहिरी के जिहादियों ने 1990 में मुबारक को एक निरंकुश शासक का खिताब दिया था और ईसाइयों, धर्मनिरपेक्ष मिस्रियों और विदेशी सैलानियों के साथ-साथ सरकारी फौजों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया था। ये बात अलग है कि दशक का अंत होते-होते मुबारक ने बेरहमी से इन्हें कुचल दिया था। कुछ बाद में जाकर ओसामा के लड़ाकों से मिल गए। आइडियोलॉजी के स्तर पर इस्लामिक जिहाद, इस्लामिक ग्रुप और अल कायदा के बीच मतभेद रहे लेकिन जिहादी हमलों का सिलसिला चलता रहा। मसलन, शर्म अल शेख में 2005 का हमला, जिसमें 88 लोगों की मौत हुई थी।

मुबारक के जाने के बाद अब अल कायदा के सामने कुछ मुश्किलें दरपेश हैं। इनमें पहली है मुस्लिम ब्रदरहुड। अलकायदा के कई नेता इसी की उपज रहे हैं लेकिन आज दोनों एकदूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते। अल कायदा 1978 से 82 के बीच सीरिया के खिलाफ चले मुस्लिम ब्रदरहुड के खूनी संघर्ष का विरोध करता रहा है। दूसरी तरफ ब्रदरहुड के थियोलॉजियन सैयद कुत्ब जैसे लोग अल जवाहिरी के आदर्श रहे हैं। अपनी किताब ' बिटर हार्वेस्ट' में जवाहिरी ने मुस्लिम ब्रदरहुड की इस बात के लिए मज़म्मत की है कि उसने होसनी मुबारक के निरंकुश शासन के खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल नहीं किया और मुख्यधारा की राजनीति में हिस्सा लेने की कोशिश की। इज़रायल के खिलाफ लड़ रहा फिलिस्तीनी ग्रुप हमास भी मुस्लिम ब्रदरहुड से ही उपजा है, जिसने गाज़ा में अल कायदा को काफी नुकसान पहुंचाया है और बदले में अल कायदा के कोप का भाजन बना है।

अलकायदा के सामने दूसरी चुनौती हैं वो मिस्री जो इस्लाम के नाम पर नहीं बल्कि मुबारक के अत्याचारी शासन के खिलाफ तहरीर स्क्वेयर में इकट्ठे हुए। लोकतंत्र विरोधी और बंदूक़ की बदौलत सत्ता हासिल करने के हिमायती अल कायदा के इंटेलीजेंसिया को डर है कि ऐसे लोगों पर खड़ी सरकारें असल में इंसान की इच्छा को ख़ुदा की इच्छा से ऊपर रखने वाली होंगी और आखिर में गैरइस्लामी कानून-कायदों को जन्म देंगी।

फिर भी मुबारक विरोधी बग़ावत अल कायदा के लिए कुछ मौके भी लाई है। मसलन मुबारक की विदाई के दौरान जिस फौज ने मुल्क की सीमाओं से जिहादियों की घुसपैठ रोकी थी, अब उसकी पकड़ ढीली पड़ गई है। फौज खुद जनता के गुस्से का शिकार बनेगी क्योंकि उसने प्रदर्शनकारियों पर ज़ोर-ज़बर किया था। जाहिर है अल कायदा अराजकता का फायदा उठाने की कोशिश करेगा। अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान और सोमालिया में अल कायदा ऐसे मौकों का फायदा उठा चुका है।
दूसरी तरफ अगर मुस्लिम ब्रदरहुड सरकार का हिस्सा बनी तो वह कमोबेश मिस्र के इस्लामीकरण की आवाज उठाएगी जो एक तरह से अल कायदा के मिशन को पूरा करेगा। अगर मुस्लिम ब्रदरहुड सेना और नई सरकार की आंख में किरकिरी बनी तो वो मिस्री नौजवानों में रेडिकल आवाज का काम करेगी और उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काएगी।

इसलिए मुबारक के बाद मिस्र में सत्ता का सफर कांटों भरा है क्योंकि अल कायदा को एक लोकतांत्रिक और स्थिर मिस्र से खतरा है। तहरीर स्क्वेयर में खड़े मिस्रियों की तस्वीरें आम मुसलमानों को उम्मीद देती हैं कि केवल जिहाद नहीं स्थिर लोकतांत्रिक सरकारें भी उन्हें अच्छी जिंदगी दे सकती हैं।

3/12/10

नाम के गांधी..

गांधी ने 1947 में कहा था कि कांग्रेस का काम पूरा हो चुका है, उसे भंग कर देना चाहिए। इसकी जगह लोकसेवक संघ बनना चाहिए। मगर नेहरू समेत दूसरे कांग्रेसियों को लगा कि गांधीजी सठिया गए हैं। जिस पार्टी ने उन्हें गुलामी के समंदर में नैया बनकर आजादी के तट पर उतारा, उसी को त्याग दें। उधर, गांधी की हत्या हुई और इधर, कांग्रेस गांधी के नाम पर कुंडली मारकर बैठ गई, ताकि उससे संजीवनी हासिल कर सके। पार्टी अब सत्ता सुख भोगना चाहती थी।

अगर कांग्रेस का मकसद सिर्फ जनसेवा होता, तो शायद उसे और 63 साल की जिंदगी हासिल न होती। विभिन्नताओं से भरे इस देश की जनता का ध्रुवीकरण कर उसे आजादी के रास्ते पर लाने वाले गांधी की सोच साफ थी। उनकी दृष्टि साफ थी कि अगर कांग्रेस बची, तो सत्ता उसे गंदे तालाब में बदल देगी। इसीलिए उन्होंने इसका रिप्लेसमेंट सोच लिया था।

कांग्रेस का लक्ष्य तो 1907 में ही तय हो गया था, जब वो नरम और गरम दल में टूटी थी। 1947 में वह वयोवृद्ध थी। इसलिए आज जिसे हम कांग्रेस के नाम से जानते हैं, वो सवा सौ साल का ऐसा संगठन है, जिसकी आत्मा निकल चुकी है और जिसे उसके कर्णधार आज तक ढो रहे हैं। यह वही कांग्रेस नहीं, जिसे एओ ह्यूम ने 1885 में इसलिए जन्म दिया था ताकि वह हिंदुस्तानियों के बीच प्रैशर कुकर का काम करे। उनके अंदर पनपने वाले गुस्से को बाहर निकलने का रास्ता दे। गोखले, तिलक और जिन्ना जैसे नेताओं ने इसका इस्तेमाल ब्रिटिशविरोधी भावनाओं के लिए किया था, जिसमें गांधी और बाद में नेहरू जैसे नेताओं ने अपनी आहुतियां डालीं।

आखिर यह वही पार्टी थी जिसने दो देशों की आजादी में अपनी भूमिका निभाई। अगर आप मौलाना अबुल कलाम आजाद की किताब इंडिया विंस फ्रीडम का हवाला लें, तो पता चलेगा कि आजादी के सेनानी इतने थके, अधीर और मायूस हो चुके थे कि अब वो इसका तुरंत प्रतिफल चाहते थे। उन्हें जल्द से जल्द सत्ता पर काबिज होने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। चाहे जिस कीमत पर मिले उन्हें फिरंगियों से मुक्ति पानी थी और फिरंगी हुकूमत भी इस बात को समझती थी। सत्ता की बागडोर ज्यादा वक्त तक थामे रखना उसके लिए भारी हो चुका था। इसलिए जब फिरंगी हुकूमत ने अपनी न्यायप्रियता का सबूत दो देशों को बांटकर दिया, तो अधीर कांग्रेसियों ने उसे भी मंजूर कर लिया, 35 करोड़ की आबादी के प्रतिनिधि के बतौर (ये विवाद का विषय है कि क्या कांग्रेस ही आजादी पाने की अकेली उत्तराधिकारी थी?)। 

कांग्रेसी मानते थे कि वही सत्ता के असल वारिस हैं। भरमाई जनता ने उस कांग्रेस को जनादेश दिया, जिसने आजादी की लड़ाई में भागीदारी की थी। उसे नहीं, जिसने देश का बंटवारा मंजूर कर लिया था। कोई विकल्प या रास्ता भी नहीं था। पार्टी के कर्णधार अच्छी तरह जानते थे कि वो इस विरासत को अगले कई सालों तक भुनाने में कामयाब रहेंगे और यही हुआ भी। 


कांग्रेस का चरित्र शुरू से ही मेट्रोपॉलिटन रहा। उसका सरोकार शहरी मध्यवर्ग था क्योंकि खुद कांग्रेस के पितामह नेहरू विदेशों में पले-बढ़े। हिंदुस्तान की मिट्टी से उनका कोई नाता न था। आजादी के बाद नेहरू का परिचय जिस हिंदुस्तान से हुआ, उसके लिए उनके पास शासन का कोई मॉडल नहीं था। मोहनदास करमचंद गांधी के सत्ताविकेंद्रित और खुदमुख्तारी के मॉडल पर वह देश को ले जाना नहीं चाहते थे। मगर गुलाम देश में गांधी कांग्रेस के लिए मजबूरी थे क्योंकि उनकी पकड़ हिंदुस्तान के ग्रामीण और शहरी समाज दोनों पर थी। लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस आजादी की तरफ बढ़ी, गांधी उसके लिए असंगत होते गए। क्योंकि वो कांग्रेस में पैदा हो रही सत्ताकेंद्रित सोच का समर्थन नहीं करते थे। फलत: आजादी से ऐन पहले पार्टी ने अपने नायक को बिसरा दिया। 

मगर गांधी नाम में बड़ा जादू था और कांग्रेस इसे नहीं बिसराना चाहती थी। इसलिए आजाद भारत में कांग्रेस ने गांधी को मंत्र बना लिया। हिंदुस्तानी कांग्रेस को गांधी की पार्टी की बतौर देखते थे। हालांकि ये बात अलग है कि गांधी कांग्रेस पार्टी की सदस्यता से 1934 में ही इस्तीफा दे चुके थे। इसी गांधी नाम के साथ राष्ट्रीयता और धर्मनिरपेक्षता का हवाला देकर कांग्रेस सफाई के साथ क्षेत्रीय आवाजें दबाने में कामयाब रही। इसलिए दशकों तक क्षेत्रीय सियासी पार्टियों का वजूद सिमटा रहा या न के बराबर रहा। कांग्रेस बहुमत एन्ज्वाय करती रही। सो, क्षेत्रीय दल काफी वक्त बाद नई दिल्ली के सियासी गलियारों में पहुंच सके। कांग्रेस की इसी चाल की वजह से क्षेत्रीय राजनीति जब केंद्र और राज्यों में पहुंची तो अपने वीभत्स रूप में, क्योंकि पहले उसका प्रतिनिधित्व नकार दिया गया था। इसीलिए आज क्षेत्रीयता राष्ट्रीयता से बदला चुका रही है, वो भी सिर्फ कांग्रेस की वजह से।

कांग्रेस नामक सत्तालोलुपों के गिरोह ने गांधी नाम का जमकर इस्तेमाल किया। बेशक ओरिजिनल गांधी से इस कांग्रेस का कोई ताल्लुक नहीं, लेकिन सिर्फ नाम का जादू देश को 40 साल तक घसीटता रहा। एक परिवार गांधी का नाम लेकर आगे खड़ा था और उसके पीछे थी पूरी पार्टी। इस परिवार की नींव में थे जवाहरलाल नेहरू जो उसी बरतानिया में पढ़े थे, जिसने देश को गुलाम बना रखा था। फिरंगियों से आजादी की सौदेबाजी में वो आगे रहे थे। इसीलिए जनता उन्हें आजादी के नायक के बतौर देखती आई थी।

नेहरू के बाद आननफानन में उनकी बेटी इंदिरा को नायकत्व सौंप दिया गया, क्योंकि नेहरू के बाद वही परिवार की सर्वेसर्वा थीं। उनके पिता ने अपने रहते उन्हें कुछ हद तक सियासत में दीक्षित किया था, लेकिन इंदिरा का भी सीधे जनता से कोई सरोकार नहीं था। उनके कार्यकाल को देखें तो लगता है कि मानो वो शासन के लिए ही पैदा हुई थीं। वही उन्होंने किया भी, इसीलिए 20वीं सदी की 100 सबसे ताकतवर नेताओं में उन्हें भी गिना जाता है। पिता के नाम और निरंकुशता की वजह से पूरी कांग्रेस उनके आगे पलक-पांवड़े बिछाए रही। मगर यही वो वक्त था, जब कांग्रेस की विरासत पर सवाल खड़े होने लगे थे। विकल्पों की मांग उठ रही थी, प्रयोग हो रहे थे, मगर तजुर्बा और रास्ता अब भी किसी के पास नहीं था। कांग्रेस यूं देश पर परिवार के शासन का हक छोड़ने को तैयार न थी और सत्ता छीनने की ताकत किसी में थी नहीं।

इंदिरा के बाद उनके दोनों बेटे गांधी के नाम और इस परिवार के करिश्मे को ज्यादा वक्त तक जिंदा नहीं रख सके। इसकी दो वजहें थीं। न तो वो अपने पूर्वजों की तरह उतने करिश्माई व्यक्तित्व के स्वामी थे और न वो क्षेत्रीयता का उभार रोकने में कामयाब थे। गांधी को गांधीवाद में बदलकर कोने में खिसका दिया गया। अपनी मां की मौत से मिली सहानुभूति लहर पर सवार होकर राजीव सत्ता में आए, मगर उन्हीं की पार्टी में परिवारविरोधी स्वर उठने लगे थे।

कांग्रेस का तिलिस्म बिखर गया था और नई दिल्ली की कुर्सी पर एक के बाद एक गैरकांग्रेसियों की ताजपोशी होने लगी। देश को पहली बार ये अहसास हुआ कि असल में उनके साथ धोखा हुआ था। एक परिवार और पार्टी को माई-बाप मानकर उसने भारी गलती की थी। सियासत की गंदगी गांधी नाम के कालीन के नीचे से बाहर निकल आई थी।

दुर्भाग्य इस परिवार को जकड़ चुका था। पहले नेहरू की बेटी, फिर नेहरू के दोनों पोते, नफरत और साजिशों के शिकार बन गए। पार्टी मातम में थी क्योंकि सत्ता के केंद्रों का विघटन हो चुका था। कोई सैकेंड लाइन नहीं थी। परिवार ने इसकी गुंजाइशें ही खत्म कर दी थीं (हालात आज भी वही हैं)। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह भी एक दिलचस्प हकीकत है कि ज्यों राजशाही में मुखिया के बाद उसके परिवार के सबसे बड़े सदस्य को सत्ता सौंपी जाती है, उसी तरह कांग्रेस में सत्ता का हस्तांतरण होता रहा। आखिर इंदिरा की बहू को राजसत्ता मिली, जिनका इस देश की भाषा और हिंदुस्तानी जनजीवन से कोई ताल्लुक नहीं रहा था। चूंकि पार्टी 1947 से लेकर आज तक राजवंशी ढांचे पर चली थी, इसलिए इस 'राजवंश' से बाहर किसी व्यक्ति पर भी पार्टी को भरोसा नहीं रहा। पार्टी को यहां तक भ्रम हो चुका है कि इस देश में जो कुछ अच्छा है, इस परिवार की बदौलत ही है। इसलिए परिवार और पार्टी एक दूसरे में इतना घुलमिल गए कि कांग्रेस का मतलब ही है गांधी परिवार (इसमें गांधी कितना फीसद है, ये आप जान ही गए होंगे)।


आज कांग्रेस सवा सौ साल की है। आजादी के बाद 63 साल और। तो कांग्रेस की विरासत क्या है? कैसे पहचानेंगे इसे आप? आजादी के बाद इस पार्टी ने देश को क्या दिया है? असल में, इस पार्टी ने देश को वो दिया है, जिसे शायद ही कोई नकार सके। मसलन.. एक नाम, 'नेता' जैसा जैनरिक और घृणित शब्द, सत्तालोलुपों का एक गिरोह, खुशामदपसंदों से घिरा एक परिवार, दो-तीन अदद पवित्र नाम (जिनमें से एक अब माता इंडिया कही जाती हैं) और इन नामों पर खड़ी इमारतें-सड़क-चौराहे, मुट्ठी में सत्ता दबोचकर रखने की हामी सोच, कुलीन-शहरी और अमीरी से भरपूर सियासत, जुर्म को पनाह देने वाला सियासी काडर, घोटालों से खोखला प्रशासन और इसे छिपाने के लिए नेहरू टोपी, खादी की जैकेट और सफेद कुर्ता-पाजामा। और चूंकि कांग्रेस आजाद भारत की तरक्की का सेहरा अपने सिर बांधती है, तो उसे ये सेहरा भी अपने सिर बांधना होगा कि उसका खमीर बाद में कांग्रेस से टूटी दूसरी पार्टियों ने जज्ब कर लिया।

इसीलिए व्यंग्यकार शरद जोशी जब कहते हैं कि असल में देश की हर पार्टी किसी न किसी रूप में कांग्रेस है, तो गलत नहीं कहते। सियासत के दांवपेच, सत्ता के औजार, उसकी खूबियां और खामियां इसी कांग्रेस ने आजाद हिंदुस्तान को दी हैं। इस मायने में सभी पार्टियां कांग्रेस की ऋणी हैं। अपने चरित्र में पूरी सियासत आज भी अंदर से कांग्रेसी है। इसीलिए उन्हें कांग्रेस का शुक्रगुजार होना चाहिए।

इस साल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 125 साल हो रहे हैं। सवा सौ साल की इस पार्टी से आज आपको क्या उम्मीदें हैं। शायद कोई नहीं। ज्यादा से ज्यादा आप ये तमन्ना करेंगे कि सत्तालोलुपों और चाटुकारों का ये संगठन जल्द से जल्द सियासत के रंगमंच से विदा हो जाए।
और सवा सौ साल की कांग्रेस को खुद से क्या उम्मीदें हैं। यही कि वो उस खोई हुई विरासत को वापस पा ले, जिसके अब कई दावेदार हैं। उस गांधी नाम का करिश्मा फिर हासिल कर सके, जिसमें अब गांधीवादी भी भरोसा नहीं रखते। उस परिवार को फिर प्रतिष्ठित कर पाए, जिसकी नींव नेहरू ने रखी थी और जिसमें आज खुद कांग्रेसियों को भरोसा नहीं। सवा सौ साल की कांग्रेस आज अखिल भारतीय सत्ता के उपभोग का स्वप्न देख रही है, पर वो नहीं जानती कि 21वीं सदी के हिंदुस्तान में 1947 का करिश्मा लौटना आसान नहीं रह गया है।

22/11/10

बंदूक़

(2003 में ये कविता मेरे दोस्त मुकुल और मेरे बीच एक बहस के बाद सवाल-जवाब की शक्ल में लिखी गई थी..ज्यों का त्यों प्रस्तुत..ऊपर मेरे मित्र की राय है और नीचे मेरी..कह नहीं सकता कि आज मैं अपनी ही राय से कितना सहमत हूं..)

तुम जो मानते हो
बंदूक़ को पहला और आखिरी हथियार
तुम जो समझते हो
बंदूक़ को सारे सवालों का जवाब
तुम जो कहते हो
बंदूक़ को सारी समस्याओं का हल
मुझे बताओ
मुझे चाहिए प्रेम
वो तुम्हारी बंदूक़ से
कैसे हासिल हो सकता है.............................................................(मुकुल)

तुम सच कहते अगर
तुम कहते
बंदूक़ से निकलती है मानवता
तुम सच कहते अगर
तुम्हें मालूम होता
बंदूक़ से सीखा है दुनिया ने जीना
तुम सही सोचते अगर
तुम सोचते कि
बंदूक़ के बल पर
ज़िंदा है शांति
अगर तुम सोच पाते
बंदूक़ की वजह से है
व्यापार और तकनीक
बंदूक़ ने तय की हैं
राष्ट्रों की सीमाएं
सिखाया है आचार
कि कैसे न झुका जाए
जब दुश्मन अपनी हर ग़लत बात को
मनवाने को हो आमादा
कि कैसे पैंतरा लिया जाए
जब ज़ुल्म के महलों के आगे
बनानी हो मेहनत की झोंपड़ी
शायद तुम नहीं समझोगे
क्योंकि तुम पीड़ित हो
शांति की लाइलाज बीमारी से
मैं बताता हूं
ये बंदूक़ से निकलने वाली गंध ही है
जिसने सदियों को
समझदार बनाया है
बंदूक ने बदला है इतिहास
बंदूक़ की वजह से खिले हैं
रेगिस्तानों में फूल
बंदूक़ ने किया है
जमीनों को सरसब्ज़ और ज़रखेज़
ये लहलहाती फसलें
और गुनगुनाती नदियां
सभी बंदूक़ के बनाए रास्तों पर हैं
माफ़ करना मेरे दोस्त
आज तुम भूल गए हो कि
वक्त हमेशा उनकी सुनता है
जो खुद अपने मुहाफ़िज़ होते हैं..................................................(मैं)

13/7/10

वाद के खिलाफ, विचार के हक में..

कहीं पढ़ा था और बाद में कई विद्वानों से सुना भी कि आदमी अपनी जवानी में साम्यवादी होता है.. और अगर आप साम्यवादी नहीं हैं तो वो जवानी बेकार समझिए.. मैं शायद अपनी जवानी से पहले ही साम्यवाद की चपेट में आ गया था.. इस हद तक कि एक जमाने में मुझे उसमें दुनिया की हर मुश्किल का हल नजर आता था..और इस आसन्न लगने वाली क्रांति की हवाएं आती थीं सोवियत संघ और हिंदुस्तान के बीच समझौते की वजह से हासिल होने वाले सस्ती किताबों के जरिए..जो पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, रादुगा और मीर प्रकाशनों की ओर से मेरी मातृभाषा में मुझे मिलती थीं, बेहद सस्ते दामों पर..तब मैंने जाना कि मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन का हमारी दुनिया को समझने में क्या योगदान रहा है..माओ के बारे में मैंने जाना जरूर था लेकिन कुछ पढ़ा नहीं था.. साम्यवाद को जानने की चाह ने मुझे खुद खोजने और पढ़ने में दिलचस्पी जगाई..लेकिन मुझे साम्यवाद के राजनीतिक दर्शन से ज्यादा रुचि उस औजार में थी, जिसकी वजह से दुनिया को देखने का नजरिया बदलता था..जाहिरन ये औजार सत्तान्मुखी नहीं था..

कोई एक विचार सारी दुनिया के सारे लोगों पर कैसे लागू हो सकता है, यह बात मुझे कमअक्ली के उस दौर-दौरे में भी समझ आती थी.. आज तो मैं इसके खिलाफ ही हूं.. और यहां तक मान चुका हूं कि विचार चाहे जितना अच्छा क्यों न लगे, उसे सार्वभौमिक तौर पर लागू करना न केवल बेवकूफी है बल्कि इंसान को जन्मजात तौर पर मिली आजादी के खिलाफ है..खैर, उस वक्त ये ख्याल नहीं था..
तभी पूर्वी योरोप में हलचल शुरू हुईं थीं..ईस्टर्न ब्लॉक के देशों पॉलेंड और हंगरी ने सबसे पहले साम्यवाद का जुआ उतार फेंका.. फिर 1989 में रोमानिया में सेसेस्क्यू सरकार गिरी..बर्लिन की दीवार गिरी, चेकोस्लोवाकिया और बल्गारिया में साम्यवाद के खंभे ढहने शुरू हो गए.. अल्बानिया और यूगोस्लाविया ने 1990-91 के बीच साम्यवाद का दामन छोड़ दिया.. और पांच नए देश अस्तित्व में आए.. चीन के थियानानमेन चौक पर दुनिया ने कत्लेआम देखा..मुक्त विचारों के समर्थक छात्रों और उनकी समर्थक जनता का..चीन एक प्रायद्वीप बन चुका था, यह उसके कम्यूनिस्ट शासक जानते थे लेकिन कुबूल करने को तैयार न थे..इस कत्लेआम ने साम्यवाद के क्रूर चेहरे से पर्दा उठाया..दुनिया भर ने इसकी लानत-मलामत की.. यही वो वक्त था जब सोवियत संघ टूटा और 14 नए देश दुनिया के नक्शे पर आए.. दुनियाभर में इसकी गूंज इतनी तेज थी कि कंबोडिया, इथियोपिया और मंगोलिया ने साम्यवाद को तिलांजलि दे दी..जब दुश्मन ही न रहा तो युद्ध कैसा.. सो अमेरिकी ब्लॉक की तरफ से पूर्वी योरोप और सोवियत संघ के खिलाफ बरसों से जारी शीतयुद्ध भी खत्म हो गया...

मुझे अच्छी तरह याद है कि मिखाइल गोर्बाचेव ने सोवियत संघ में दो नारे दिए थे पेरेस्त्रोइका (आर्थिक सुधार) और ग्लासनोस्त (खुलापन).. काफी चर्चा थी उस वक्त..साम्यवादी सरकार के इतिहास में पहली बार एक से ज्यादा उम्मीदवारों के साथ कम्यूनिस्ट पार्टी में चुनाव हुआ था.. मगर सोवियत संघ में ही गोर्बाचेव को भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा था..मिखाइल गोर्बाचेव अपने पूर्व योरोपियन साथी देशों को ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका अपनाने की सलाह दे रहे थे.. मगर उनके पूर्वी योरोपियन साथियों को यकीन था कि गोर्बाचेव की पेरेस्त्रोइका क्रांति कुछ ही दिन की मेहमान है..इसलिए वो सोवियत संघ स्टाइल के सर्वसत्तावादी तौर-तरीकों से ही शासन चला रहे थे.. लेकिन सोवियत संघ का साम्यवादी ढांचा अपने ही दबावों से टूट रहा था..इसी अफरातफरी में गोर्बाच्योव चले गए और उनके बाद आए उनके उत्तराधिकारी बोरिस येल्तसिन रूस को मुक्त बाजारवादी व्यवस्था देने का वायदा कर एक कदम आगे चले गए..रूस ने करीब 74 साल बाद दुनिया के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे..पर दुनिया ने जब इस घर के अंदर झांका तो वहां मिला टूटा-फूटा रूसी समाज.. ब्रेड के बदले जिस्म बेचती औरतें..झोलों में भरकर रूबल ले जाते और जेब में टमाटर लाते लोग.. मास्को की सड़कों पर लूटपाट और हत्याएं.. दूसरी तरफ धर्म की ताजपोशी.. सत्ताप्रहरी क्रैमलिन में कैथलिक चर्च का उद्घाटन..साम्यवादी लोहे के पंजे से अभी अभी मुक्त हुए समाज की तस्वीर थी ये..

पूर्वी योरोप और सोवियत संघ के बदले चेहरों ने दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया था.. ताकत के समीकरण बदल चुके थे..रूस और अमेरिका में केजीबी और सीआईए की कमानें बदल रही थीं.. दोनों तरफ के जासूस कुछ वक्त के लिए आराम करने भेज दिए गए थे.. पूंजीवाद जीत गया था और साम्यवाद बेमौत मरता दिख रहा था.. पूर्वी योरोप और रूस दोनों बाजार मांग रहे थे.. इसकी गूंज विकसित देशों के साथ विकासशील देशों तक जा पहुंची थी..जब सत्ता के इतने बड़े समीकरण बन-बिगड़ रहे हों तो हिंदुस्तान जैसे विकासशील देश की इनके सामने क्या अहमियत थी.. उदारीकरण अब मूलमंत्र बन चुका था..और वही सत्ता संचालकों की कामयाबी का सबसे बड़ा पैमाना था..साम्यवादी सत्ताओं का पतन जरूर हो गया था लेकिन अभी प्रतिरोध खत्म नहीं हुआ था..
साम्यवाद अपने मूल में ही अपनी कमजोरियां छिपाए बैठा था..इसलिए उसका पतन हुआ.. जर्मनी की जिस जमीन में वह बीज पड़ा था, वहां वह पौधा ही बना था कि उसे उखाड़कर रूस ले जाया गया.. बाद में जिस-जिस जमीन पर उसे बोया गया, हमेशा उसे अपनी मूल धरती की खाद की जरूरत पड़ती रही..किसी भी जगह वह प्राकृतिक रूप में विकसित नहीं हुआ..न वो पला, न बढ़ा..हां, जबरन इसकी कोशिशें की गईं, लेकिन वो सभी नाकाम रहीं... पिछले डेढ़ सौ साल का इतिहास इसका गवाह है.. इसलिए जब-जब विदेशी खाद-पानी की कमी हुई..साम्यवाद का पौधा मुरझा गया..चाहे वह रूस, चीन, क्यूबा, उत्तरी कोरिया, लाओस, वियेतनाम, कंबोडिया, अंगोला, मोज़ांबीक हों या फिर पूर्वी योरोप में बल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, पूर्वी जर्मनी, पॉलैंड, हंगरी और रूमानिया.. योरोप को छोड़कर साम्यवाद कहीं भी स्थानीय भाषा-संस्कृति, रहन-सहन से तालमेल नहीं बैठा सका..यही नहीं, हजारों साल से इंसान के नियामक और उसके सबसे बड़े अंतर्प्रवाह (अंडरकरेंट) धर्म का उसने न केवल खुला विरोध किया, बल्कि स्थानीय धर्मों का सबसे बड़ा दुश्मन बनकर उभरा..चाहे धर्म जितना कड़वा, झूठा, फरेबी और उबाऊ क्यों न रहा हो, इंसान को इस अफीम की जरूरत थी और आज और भी ज्यादा है.. इसलिए साम्यवादी दर्शन और राजनीति स्थानीय धर्मों से हार गए..

साम्यवाद हार गया था लेकिन साम्यवादी नहीं.. आज भी नहीं हारे हैं..क्योंकि उन्हें यकीन है कि एक दिन मार्क्स-एंगेल्स-लैनिन-माओ के विचारों की ही सत्ता स्थापित होनी है..मगर मार्क्स का पूंजीवाद जिस खुले समाज और फैलती हुई दुनिया की तरफ हमें ले जा रहा है, वहां साम्यवाद के लिए गुंजाइशें कम होती जा रही हैं..अब साम्यवादी कोई ग्लोबल लड़ाई लड़ने के हक में नहीं है..अब वो बस छोटे-छोटे प्रतिरोधों में जीवित है.. इसका नमूना है हिंदुस्तान, नेपाल, म्यानमार जैसे तीसरी दुनिया के देश.. साम्यवाद की दूसरी शक्ल है सरकार प्रायोजित साम्यवादी बाजारवादी व्यवस्थाएं, जिनमें साम्यवाद को कम बाजार को ज्यादा पोषित किया जाता है..

साम्यवाद की सबसे बुरी बात थी..इसका राजनीतिक एजेंडा..मार्क्स ने पहले इसे आर्थिक विषमताओं के उन्मूलन के औजार की तरह देखा था.. बाद में उन्होंने इसका राजनीतिक दर्शन खड़ा किया..उनकी खुद की भविष्यवाणी भी गलत साबित हुई जब जर्मनी के बजाय रूस ने इसे लागू किया.. जाहिर है यह दमन से ही संभव हो सका था.. चीन ने भी इसी प्रयोग को दोहराया और वहां भी दमन को हथियार बनाया गया.. सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर चीन के समृद्ध इतिहास को मिटाया गया..यह एक महान विचार की हार थी.. क्योंकि इसे जबरन इंसान पर थोपा जा रहा था..

साम्यवाद के जन्म को 162 साल बीत चुके हैं और मृत्यु को 19 (अगर तकनीकी तौर पर सोवियत संघ के विघटन को आप प्रतीक की तरह देखें तो).. लेकिन दुनियाभर के साहित्य और मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर अभी तक साम्यवाद का मर्सिया पढ़ा जा रहा है.. साम्यवाद के रुदनगीत तकरीबन रोज हमारे कानों तक पहुंचते हैं.. नेपाल से लेकर भारत के अंदर तक माओवाद की छटपटाहट इसके जरिए सत्ता हासिल करने में है..न कि मानवता की मुश्किलों का हल ढूंढने में..होना तो ये चाहिए था कि मार्क्स-एंगेल्स के विचारों पर आगे काम होता और उन्हें शोधविषय की तरह देखा जाता.. उन्नत तकनीकी और ग्लोबलाइजेशन के वक्त में इसकी और सूक्ष्म मीमांसा होती.. इसकी उपादेयता की जांच-परख होती, इसे सामयिक बनाने की कोशिशें होतीं.. मगर ये हुआ नहीं... सत्ता के लालचियों ने इसे सियासी और अब आतंकी हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.. मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन के बाद माओ वाद की ईश्वरीय उवाच की तरह पूजा-अर्चना की जा रही है.. माओ के विचारों में उग्रता ज्यादा थी, इसलिए आतंकवाद के लिए इसका दामन थामना आसान था.. इसलिए अब साम्यवाद का दूसरा नाम है आतंकवाद..

मुझे उम्मीद है कि अब नौजवान साम्यवादी नहीं होते.. अब अगर वो जवानी में साम्यवाद के बारे में नहीं जानते तो उनकी जवानी ज़ाया नहीं मानी जाती..हां, अगर वो पूंजीवाद की कुचालों को नहीं समझते तो जरूर उनकी जवानी बेकार मानी जाती है.. इसलिए मेरे ख्याल में साम्यवादी होना कोई अच्छी बात नहीं..इसके लिए जवानी बर्बाद करना ठीक नहीं..फिर भी दर्शन का ये औजार भोंथरा नहीं है.. अगर चाहें तो इससे दुनिया को तराशा जाना मुमकिन है..

22/3/10

नरक को भी चाहिए नायक!!

जब आप द हर्ट लॉकर देख रहे हों तो ख्याल रहे कि ये कोई वॉर मूवी नहीं, न किसी आम युद्ध की कहानी है.. ये कहानी है दुनिया के तकरीबन सभी देशों में चल रहे छोटे-छोटे युद्धों की..जो रोज़ इराक, अफगानिस्तान और कश्मीर की डेटलाइनों से आपकी नजरों के सामने से गुजरती हैं..जहां शायद मौत और जिंदगी एक दूसरे के सबसे करीब हैं.. कैथरीन बिगेलो की कामयाबी ये है कि वो मौत के खिलाफ संघर्ष में डूबी इस जिंदगी का एक हिस्सा आप तक पहुंचा पाई हैं.. और शायद इसका सबसे बड़ा कारण है एक पत्रकार की आंख.. जो फिल्मकार की तरह सच को टेंटेड ग्लास से नहीं देखती.. यानी द हर्ट लॉकर दरअसल कैथरीन बिगेलो की नहीं जितनी मार्क बोआल की कामयाबी है..

पत्रकार से स्क्रिप्टराइटर बने मार्क बोआल कुछ साल पहले इराक में अमेरिकी सैनिकों के दस्ते के साथ गए थे.. यहां अपने खौफनाक तजुर्बे ने उन्हें इसे फिल्म स्क्रिप्ट में तब्दील करने की प्रेरणा दी..इसलिए मार्क बोआल का उगला सच काफी कच्चा है.. एकदम असली और काफी करीब से देखा गया..

द हर्ट लॉकर इराक में तैनात अमेरिकी सैनिकों के जरिए बदले हुए युद्धक्षेत्रों और इस लड़ाई को लड़ने वाले एक पक्ष की बदली हुई मानसिकता बताती है.. वो लोग जो इस दुनिया में सबसे खतरनाक काम को अंजाम दे रहे हैं.. इस गैररस्मी युद्ध के बीचोबीच वो मौत के परवाने बमों को खोज रहे हैं और उन्हें डिफ्यूज करने में जुटे हैं.. और खास बात ये सैनिक उस देश में लड़ रहे हैं, जहां उन्हें स्थानीय समर्थन हासिल नहीं.. इसीलिए द हर्ट लॉकर ऐसे आम इराकी चश्मदीदों की तस्वीर भी खींचती है, जिन्हें अपनी जमीन पर हो रहे मौत के नाच से कोई सरोकार नहीं लगता..वो आपको कई सीन में एकदम निर्लिप्त दिखेंगे, जिन्हें अमेरिकी बम निरोधक दस्ते से कोई हमदर्दी नहीं है..उनकी कार्रवाइयों को लेकर वो खामोश हैं या उनके खिलाफ खड़े नजर आते हैं.. वो महज तमाशबीन चेहरों की तरह पेश किए गए हैं या खौफजदा लोगों की तरह.. फिल्म के किरदार उनसे संवाद नहीं करते..

फिल्म में कोई सैनिक अपने मुंह से किसी तरह की राजनीतिक बयानबाजी नहीं करता..इस बात को प्रचारित भी किया गया है कि कैथरीन बिगेलो और मार्क बोआल ने कहीं भी किसी तरह के राजनीतिक झुकाव को फिल्म में नहीं आने दिया है.. हालांकि फिल्म के ट्रीटमेंट में ये चीजें झलक ही गई हैं..

बम निरोधक दस्ते का नया सार्जेंट जेम्स अपने काम के खतरों से बिल्कुल बेपरवाह है और ये बात उसके दोनों साथियों सैनबॉर्न और एलरिज को पचती नहीं.. जो बम डिफ्यूज करने के दौरान उसे कवर देते हैं.. जेम्स का एक और चेहरा भी है उसकी बीवी और बच्चा जिन्हें छोड़कर वो जंग के मैदान में खड़ा है.. लेकिन वो उनका ख्याल अपने ऊपर हावी नहीं होने देता.. जबकि खतरनाक स्नाइपर एलरिज के सब्र का बांध एक दिन टूट जाता है..

हो सकता है कि द हर्ट लॉकर कुछ साल बाद एक दस्तावेज की तरह देखी जाए..जो शायद ये बात सबसे अच्छे ढंग से बता सकेगी कि इराक में अमेरिकी मौजूदगी कितनी खतरनाक साबित हुई थी..लेकिन अगर कोई इसमें आइडियोलॉजी खोजना चाहे तो वो नहीं मिलेगी..दूसरी बात, ये फिल्म जंग की मौजूदा शक्ल पर पहले दर्जे का अध्ययन मैटीरियल उपलब्ध कराएगी. आप ये भी कह सकते हैं िक द हर्ट लॉकर में उन कई सालों का परिप्रेक्ष्य शामिल है, जिन्हें अभी अमेरिका और दुनिया के लिए गुजरना बाकी है.. शायद सच को वक्त से पहले दर्ज करा पाने में फिल्म कामयाब मानी जा सकती है..

हॉलीवुड के इराक से वहां मौजूद सैनिकों की रोजमर्रा जिंदगी, उनकी तनावपूर्ण हकीकत और मुश्किलें अब तक सामने नहीं आई थीं, लेकिन द हर्ट लॉकर इन्हें एकदम केंद्र में ले आई है..इसलिए अगर फिल्म का मूड आपको बेहद खराब लगता है, तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि युद्ध हमेशा ही ऐसा होता है..एक नरक की तरह.. लगातार तनाव से भरे 130 मिनट में हो सकता है कि आप पूरी फिल्म न देखना चाहें..लेकिन यही इसकी कामयाबी भी है.. दुनिया के बहुत से देश जहां अब आमने सामने की लड़ाई नहीं होती..हमले घात लगाकर िकए जाते हैं, वहां कोई दूसरा विकल्प नहीं है..आप जंग के इस माहौल के बीच जश्न नहीं मना सकते, आराम नहीं कर सकते..

द हर्ट लॉकर के साथ एक दिक्कत भी है.. फिल्म अपने हर सीन में काफी परफेक्ट लगती है.. खूबसूरती से बुने गए मूवमेंट्स, लेकिन पूरी फिल्म आपको अचानक अधूरेपन के साथ छोड़ देती है.. कैथरीन बिगेलो शायद जानती हैं कि इस लड़ाई का कोई अंत नहीं, इसलिए एक बटालियन से दूसरी बटालियन तक जेम्स आते रहेंगे और अपना काम करके इराक से वापस जाते रहेंगे.. चाहे अपने कदमों पर या ताबूत में..

फिल्म शुरू होती है स्क्रीन पर आने वाली एक लाइन से - "The rush of battle is a potent and often lethal addiction, for war is a drug.".. और कैथरीन बिगेलो ने फिल्म के अंत में इस लाइन को सार्थक कर दिया है.. पूरी फिल्म एक बटालियन के इर्दगिर्द घूमती है.. कुछ मौकों को छोड़कर फिल्म बटालियन के सैनिकों की मानसिक अवस्था से भी ज्यादा नहीं जूझती.. कैथरीन ने इस बात का ख्याल रखा है कि वो बटालियन की कार्रवाइयों तक ही सीमित रहें..उनका मकसद है कि बम निरोधी दस्ते को जो काम मिला है, वह उसे बखूबी अंजाम दे रहा है..बम खोजना और उन्हें डिफ्यूज करना उसका नशा है..उसके िलए वॉर इज़ अ ड्रग.. यही बात फिल्म डायरेक्टर का मिशन स्टेटमेंट भी है - इराक में अमेरिकी सैनिक अपना काम बखूबी अंजाम दे रहे हैं, क्योंकि उनके लिए वहां लड़ना उनका एक काम है..कुछ हद तक मशीनी अंदाज़ में.. वो मानवता, राजनीति, समाज और युद्ध के गंभीर सवालों से जानबूझकर कन्नी काट गई हैं..

इराक के राजनीतिक पक्ष, आम जिंदगी और समाज को पूरी तरह दूसरी फिल्मों के लिए छोड़ दिया गया है.. इस नजरिए से ये फिल्म अधूरी लगती है.. तो क्या ऑस्कर में इतनी अधूरी फिल्म को सबसे बेहतरीन फिल्म का दर्जा मिलना उचित लगता है.. मुमकिन है कि कैथरीन बिगेलो के पूर्व पति जेम्स कैमरॉन की फिल्म अवतार समेत इस साल कोई इतनी ताकतवर फिल्म न हो, जो एकेडमी की जूरी को जंची हो..ज़ाहिर है ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रवाद के अंश को नवाज़ना उसे आसान लगा होगा.. खुद जेम्स कैमरॉन ने भी यही बात कही थी..

जेरेमी रेनर एक दशक तक सहायक किरदार करते रहे हैं, लेकिन द हर्ट लॉकर में उनके लीड किरदार ने उन्हें एकदम सबसे अलग खड़ा कर दिया है..अब तक उनकी छवि गंदे किरदार करने वाले अभिनेता की रही थी.. द हर्ट लॉकर के शूट पर ४९ डिग्री की गर्मी में ८५ पाउंड का बॉम्ब िडफ्यूजल सूट पहनना कोई आसान काम नहीं था.. रेनर का कहना था कि इस किरदार ने उन्हें अंदर तक बदलकर रख दिया है..

२००७ में फिल्म की शूटिंग हुई और २००८ में इसे इटली के थियेटरों में रिलीज किया गया..जून २००९ में ये अमेरिका पहुंची और इसके बाद २०१० में इसने ऑस्कर के लिए अपनी दावेदारी पेश की..९ अकेडमी अवॉर्ड्स में नामित होने के बाद इसे इस साल ६ अवॉर्ड्स मिले..और इसने अरबों डॉलर से बनी तकनीकी तौर से बेहद उन्नत फिल्म अवतार को पछाड़ दिया..एक रिकॉर्ड ये भी बना कि पहली बार एक महिला डायरेक्टर को ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ डायरेक्टर का सम्मान मिला.. किसी महिला ने पहली बार वॉर मूवी जॉनर में कदम रखा था..

अगर साफ कहें तो मार्क बोआल की कलम से निकली ये फिल्म दरअसल एक डॉक्यूड्रामा है, जो महज एक बटालियन की कहानी होने के बावजूद अपने थ्रिलिंग अनुभवों की वजह से आपको बांध लेने में कामयाब रहेगी.. और ये फिल्म देखने से लगता है कि अगर जंग इतनी खतरनाक और क्रूर है, नरक के बराबर है, तो दरअसल वहां भी नायकों की जरूरत है..

26/2/10

फिल्म है या ये ढोलक है..

ओमकारा की दूर की रिश्तेदार इश्किया आपको याद रहेगी पर फिल्म के बतौर नहीं, कुछ सीनों में, गुलजार के लिखे एक गाने में। यकीनन अभिषेक चौबे के लिए अपने गुरु विशाल भारद्वाज के सामने उत्तर प्रदेश की सैटिंग्स वाले इलाके को बैकग्राउंड बनाना चुनौती रही होगी। अभिषेक ने एक तेज रफ्तार के लाइट कॉमेडी थ्रिलर के साथ फिल्म इंडस्ट्री में कदम तो रखा, मगर विशाल की ओमकारा का नया अवतार पैदा करने में नाकामयाब रहे।

इश्किया में फिल्मी ड्रामा है, पर अर्थहीन, जिसका न कोई ओर है और न छोर। चुटीले संवाद हैं, मगर इन संवादों को पृष्ठभूमि का सपोर्ट हासिल नहीं है। तेज रफ्तार घटनाएं एक के बाद एक आपकी आंखों के सामने से गुजरती दिखती हैं, लेकिन आपको पकड़ती नहीं। हर घटना एक कहानी कहती लगती है, मगर पूरी फिल्म खुद में कोई मुकम्मल कहानी नहीं कहती। हां, अगर अब किसी फिल्म में कहानी की जरूरत नहीं तो फिर इसे आप दूसरे नजरिए से देख सकते हैं।

इश्किया की कोई मंजिल नहीं, उसी तरह जैसे फिल्म की हीरोइन विद्या बालन की पूरी फिल्म में कोई मंजिल नहीं। दरअसल, फिल्म का कोई किरदार अपने सफर पर भी नहीं दिखता यानी वह पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। लगता है कि फिल्म विद्या बालन के ग्लैमर को स्थापित करने और उनकी परिणीता इमेज को तोड़ने के लिए तैयार की गई है। डायरेक्टर ने विद्या की खूबसूरती फिल्माने के लिए कैमरे को जितनी जुंबिश दी है, उससे कृष्णा का चरित्र कतई छाप नहीं छोड़ पाता। न तो वह गॉड मदर बन पाईं और न विद्याधर वर्मा की बीवी कृष्णा। कृष्णा सिर्फ आवेगों के आधार पर काम कर रही है। उसकी मन:स्थिति क्या है और वह असल में क्या चाहती है, इसका आप आखिर तक पता नहीं लगा सकेंगे। एक अधूरा किरदार।

फिल्म का कोई नायक नहीं है। खैर, जरूरी नहीं कि फिल्म में नायक हो ही। मगर इसकी जरूरत वहां जरूर दिखती है जहां नायिका भी न हो। नसीर और अरशद वारसी के जो किरदार हैं, वह नायक की जरूरत पूरी करने को नहीं रखे गए हैं, हालांकि हैं काफी सशक्त। नसीर को जो किरदार मिला है, वह उसे बेहद कम वक्त में भी खोलकर रखने में कामयाब रहे हैं लेकिन अरशद का किरदार कहीं भी पूरी तरह विकसित नहीं हो सका। हालांकि अरशद को जो समय मिला, उसमें उन्होंने इसकी भरसक कोशिश की।

फिल्म आपको किसी भी किरदार का अतीत जानने का मौका नहीं देगी। इन चरित्रों के बारे में आप उतना ही जानते हैं जितना खुद फिल्म का स्क्रिप्टराइटर। ये सभी किरदार क्यों हैं और क्यों वही सब करते दिखाए गए हैं, इसका मतलब ढूंढने की कतई कोशिश न करें। वो बस हैं, क्योंकि उन्हें इस फिल्म के उन कुछ खास प्लॉट्स में होना ही था। हालांकि इस बात को इश्किया के चाहने वाले कुछ यूं पेश करते हैं कि जितना करेक्टर को खोलने की जरूरत है, उतना ही उसे दिखाया किया गया है। बेवजह उसके इतिहास-भूगोल की पड़ताल नहीं की गई है। तो क्या किसी खास चरित्र के होने के लिए किसी रेफरेंस की जरूरत भी नहीं। हो सकता है कि अभिषेक चौबे मंडली को इसकी जरूरत न महसूस हुई हो।

फिल्म में न तो उत्तर प्रदेश का गोरखपुर इलाका इस्टेब्लिश होता है, न सेनाएं बनाने की वजह, न हथियारों की सप्लाई के पीछे कारण पता चलते हैं। भोपाली-गोरखपुरी अंदाज के संवाद डालकर पूर्वी उत्तर प्रदेश को छूने की कोशिश जरूर की गई है।

डायरेक्टर अभिषेक चौबे ने अपनी डायरेक्टोरियल पारी की शुरुआत के लिए एक मजबूत फिल्म चुनी, पर अपने तमाम इंटेलेक्चुअलिज्म में फिल्म ही मिस हो गई। उनके पास कथ्य तो था पर कथानक नहीं, मध्य है लेकिन कोई सुनिश्चित अंत नहीं। हॉलीवुड फिल्मों के अनप्रिडेक्टेबल सीक्वेंस को ओढ़ने का प्रयास भी आपको दिखेगा। मगर पूरी फिल्म अपने दर्शकों से क्या कहना चाहती है, उन्हें कहां ले जाना चाहती है, समझना कुछ मुश्किल होगा। सीन तेजी से उलटते-पलटते हैं, इसलिए उनमें रफ्तार तो है लेकिन उनका मकसद दर्शकों को चौंकाना भर है। इसलिए फिल्म एक किस्म की असंतुष्टि का अहसास कराती है अंत में। हां, तकनीकी तौर पर फिल्म काफी मजबूत है। कैमरा ऐंगिल्स की आपको तारीफ करनी पड़ेगी।

इश्किया को देखें तो एक बात जरूर महसूस होगी, अगर आप सिर्फ तमाशा देखने गए हैं तो समझिए पैसे वसूल। रफ्तार, सुंदर कैमरा, अरशद-विद्या लवमेकिंग सीन, दो अच्छे गाने..ये सारी चीजें वहां हैं। बस नहीं है तो वजह कि ये फिल्म बनाई क्यों गई (इसका जवाब आपको खुद पाना है)।

10/2/10

एक भाषा की मौत!


जिस दिन हिंदुस्तान गणतंत्र की 60वीं सालगिरह मना रहा था, उसी दिन दुनिया की एक बेहद दुर्लभ भाषा दम तोड़ रही थी, हिंदुस्तान में - बो। बो भाषा की आखिरी जानकार की मौत हो गई। 85 साल की बोआ सीनियर अंडमान द्वीप समूह में रहती थी और उसी के साथ वह भाषा भी खत्म हो गई, जिसे दुनिया की ऐसी ढाई हजार भाषाओं में से एक गिना जा रहा था, जो खत्म होने के कगार पर हैं।

इंसानी तरक्की और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए बोआ सीनियर की मौत काफी दुखद है। अब इस भाषा का आखिरी सबूत अगर बचा है तो वह बीबीसी और सीएनएन के पास है- एक ऑडियो फाइल के रूप में, जिसमें इस भाषा के कुछ शब्दों का मतलब और संवाद अदायगी के स्टाइल का पता चलता है।

बोआ सीनियर अंडमानीज जनजातियों में काफी बूढ़ी महिला थी, जिनके जिंदा होने से यह भाषा भी जिंदा थी। करीब 30 से 40 साल पहले बोआ के माता-पिता की मौत हो गई थी, और उनके बाद वह दुनियाभर में अकेली थीं जो इस भाषा को जानती थीं। बोआ सीनियर अकेली रहा करती थीं और चूंकि उनकी भाषा कोई नहीं समझता था, इसलिए उन्होंने अपने आसपास लोगों से बात करने के लिए अंडमानीज हिंदी की एक बोली सीख ली थी। बोआ सीनियर ने दिसंबर 2004 की सुनामी भी झेली थी। लोग उन्हें एक हंसमुख और बेहद खुशमिजाज महिला के बतौर जानते थे, लेकिन अब न बोआ सीनियर हैं और न वो जुबान जिसे वह अपने साथ ले गईं।

भाषा वैज्ञानिकों की राय में अंडमान की ज्यादातर बोलियों और भाषाओं का ताल्लुक अफ्रीका से है। और बो भाषा भी अफ्रीका से संबंधित है। सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक बो जनजाति अंडमान में पिछले 65 हजार साल से रह रही थी। बोआ सीनियर के बाद अब इस जनजाति का कोई सदस्य नहीं बचा है। अगर देखें तो बोआ सीनियर की मौत ने 60 हजार साल पुरानी एक संस्कृति की कड़ी तोड़ दी है। ओरांव समुदाय की मधु बागानियार ने बो भाषा की मौत को हिंदुस्तान की दूसरी आदिवासी भाषाओं के लिए खतरे की घंटी बताया है। बोआ सीनियर और उनकी ज़बान बो की मौत से लगता है कि इंसान की सामूहिक स्मृति के एक अंश का लोप हो गया है।

बो भाषा की मौत ने कुछ भविष्यवाणियों को एक बार फिर ताजा किया है। 1992 में एक अमेरिकी भाषाशास्त्री ने कहा था कि 2100 तक दुनियाभर की 90 फीसदी भाषाएं समाप्त हो जाएंगी और साढ़े 6 हजार भाषाओं में से तकरीबन 3000 केवल 100 सालों में मर जाएंगी।

समाजशास्त्रियों को लगता है कि अगर संस्कृति के हिस्सों को जिंदा रहना है तो भाषाओं को जिंदा रखना होगा। अगर 19वीं सदी के आखिर में तकरीबन मर चुकी हिब्रू भाषा को आम बोलचाल की भाषा बनाने के लिए इजरायल के यहूदियों ने पूरी ताकत झोंक दी, अगर इंग्लैंड में वैल्श और न्यूजीलैंड में माओरी का पुनर्जागरण हो सकता है तो मरने के कगार पर जा रही दूसरी भाषाओं का क्यों नहीं। क्या हिंदुस्तान की आदिवासी जनभाषाएं ज़िंदा रहेंगी? बहुत मुश्किल नजर आती है ये बात क्योंकि अंग्रेजों की तरह हिंदुस्तान की सरकार भी आदिवासियों को 'सभ्य' बनाने में जुटी है।

एक ज़बान की मौत एक नस्ल की मौत की तरह है, ग्लोबल गांव बन रही दुनिया में क्या हमें उन्हें जिंदा रखने में उतनी ही दिलचस्पी है जितनी अपनी नस्ल को। शायद नहीं। कुछ लोग कहेंगे कि अगर एक ज़बान मर भी जाएगी तो क्या हुआ..इतिहास ही तो खत्म होगा..और फिर इंसान जब सूरज और चांद पर बस्तियां बसाएगा तो वहां हम अलग-अलग भाषाएं तो बोलेंगे नहीं। ऐसे में अगर एक भाषा खत्म भी हो गई तो क्या फर्क पड़ता है। तो क्या हम अब शॉर्ट मैसेज टैक्स्ट से आपस में बात करेंगे? हो सकता है। बहुत मुमकिन है कि बो ज़बान की मौत से हम कोई सबक न लें। क्योंकि संकेतों में बात कहने से लेकर भाषा का विकास करने के बाद एक बार फिर इंसान संकेतों में बात करना सीख रहा है। बाइनरी दुनिया में सुसंस्कृत भाषा संवाद के लिए जरूरी औज़ार नहीं है। और बो अगर मरी है तो इसलिए क्योंकि वह बाजार की भाषा नहीं थी।

नदी

क्या नदी बहती है  या समय का है प्रवाह हममें से होकर  या नदी स्थिर है  पर हमारा मन  खिसक रहा है  क्या नदी और समय वहीं हैं  उस क्षैतिज रेखा पर...